वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४३६ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ शरीरसे जाते समय अन्य नाडियाँ इधर-उधरके मार्गसे नाना योनियोंमें ले जानेवाली होती है',१ (छा० उ० ८। ६। ६) इन श्रुतिप्रमाणोंसे यही निश्चय होता है कि मरणकालमें वह महापुरुष हृदयके अग्रभागमें होनेवाले प्रकाशसे प्रकाशित ब्रह्मरन्ध्रके मार्गसे इस स्थूल शरीरके बाहर निकलता है और ब्रह्मविद्याके प्रभावसे उसके फलस्वरूप ब्रह्मलोककी प्राप्तिके संस्कारकी स्मृतिसे युक्त हो हृदयस्थित सर्वसुहृद् परब्रह्म परमेश्वरसे अनुगृहीत हुआ सूर्यकी रश्मियोंमें चला जाता है। सम्बन्ध—उसके बाद क्या होता है? इस जिज्ञासापर कहते हैं— रश्म्यनुसारी ॥ ४।२।१८ ॥ रश्म्यनुसारी = सूर्यकी रश्मियोंमें स्थित हो उन्हींका अवलम्बन करके (वह सूर्यलोकके द्वारसे ब्रह्मलोकमें चला जाता है)। व्याख्या—'इस स्थूल शरीरसे बाहर निकलकर वह जीवात्मा इन सूर्यकी रश्मियोंद्वारा ऊपर चढ़ता है, वहाँ 'ॐ' ऐसा कहता हुआ जितनी देरमें मन जाता है, उतने ही समयमें सूर्यलोकमें पहुँच जाता है, यह सूर्य ही विद्वानोंके लिये ब्रह्मलोकमें जानेका द्वार है, यह अविद्वानोंके लिये बंद रहता है; इसलिये वे नीचेके लोकोंमें जाते हैं',२ (छा० उ० ८।६।५)। इस श्रुतिके कथनसे यह सिद्ध होता है कि ब्रह्मरन्ध्रके मार्गद्वारा स्थूल शरीरसे बाहर निकलकर ब्रह्मवेत्ता सूर्यकी रश्मियोंमें स्थित होकर उन्हींका आश्रय ले सूर्यलोकके द्वारसे ब्रह्मलोकमें चला जाता है; उसमें उसको विलम्ब नहीं होता। सम्बन्ध—रात्रिके समय तो सूर्यकी रश्मियाँ नहीं रहतीं, अतः यदि १-यह मन्त्र ४।२।९ की व्याख्यामें अर्थसहित आ गया है। २-'अथ यत्रैतदस्माच्छरीरादुत्क्रामत्यथैतैरेव रश्मिभिरूर्ध्वमाक्रमते स ओमिति वा होद् वा मीयते स यावत् क्षिप्येन्मनस्तावदादित्यं गच्छत्येतद् वै खलु लोकद्वारं विदुषां प्रपदनं निरोधोऽविदुषाम्॥'