भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

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४३८ वेदान्त-दर्शन [पाद २ अतश्चायनेऽपि दक्षिणे ॥ ४।२।२०॥ अतः = इस पूर्वमें कहे हुए कारणसे; च = ही; दक्षिणे = दक्षिण; अयने = अयनमें; अपि = (मरनेवालेका) भी (ब्रह्मलोकमें गमन हो जाता है)। व्याख्या - पूर्वसूत्रके कथनानुसार जिस प्रकार रात्रिके समय सूर्यकी रश्मियोंसे सम्बन्ध हो जानेमें कोई बाधा नहीं होती, उसी प्रकार दक्षिणायन कालमें भी कोई बाधा न होनेसे वह विद्वान् सूर्यलोकके मार्गसे जा सकता है। इसलिये यही समझना चाहिये कि दक्षिणायनके समय शरीर छोड़कर जानेवाला महापुरुष भी ब्रह्मविद्याके प्रभावसे सूर्यलोकके द्वारसे तत्काल ब्रह्मलोकमें पहुँच जाता है। भीष्म आदि महापुरुषोंके विषयमें जो उत्तरायणकालकी प्रतीक्षाका वर्णन आता है उसका आशय यह हो सकता है कि भीष्मजी वसु देवता थे, उनको देवलोकमें जाना था और दक्षिणायनके समय देवलोकमें रात्रि रहती है। इसलिये वे कुछ दिनोंतक प्रतीक्षा करते रहे। सम्बन्ध - यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि 'हे अर्जुन! जिस कालमें शरीर त्यागकर गये हुए योगीलोग पीछे न लौटनेवाली और पीछे लौटनेवाली गतिको प्राप्त होते हैं, वह काल मैं तुझे बतलाता हूँ' (गीता ८।२३)- इस प्रकार प्रकरण आरम्भ करके दिन, शुक्लपक्ष और उत्तरायण आदि कालको तो अपुनरावृत्तिकारक बताया गया है तथा रात्रि और दक्षिणायन आदिको पुनरावृत्तिका काल नियत किया गया है; फिर यहाँ कैसे कहा गया कि रात्रि और दक्षिणायनमें भी देहत्याग करनेवाला विद्वान् ब्रह्मलोकमें जा सकता है? इसपर कहते हैं- योगिनः प्रति च स्मर्यते स्मार्ते चैते ॥ ४।२।२१॥ च = इसके सिवा; योगिनः = योगीके; प्रति = लिये (यह कालविशेषका नियम); स्मर्यते = स्मृतिमें कहा जाता है; च = तथा; एते = (वहाँ कहे हुए) ये अपुनरावृत्ति और पुनरावृत्तिरूप दोनों मार्ग; स्मार्ते = स्मार्त हैं। व्याख्या - गीतामें जिन दो गतियोंका वर्णन है, वे स्मार्त अर्थात्