वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 46, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र २८ ] अध्याय १ ४३
नामसे वर्णित ब्रह्मको उस दिव्यलोकसे परे बताया है। इस प्रकार पूर्वापरके वर्णनमें भेद होनेके कारण गायत्रीको ब्रह्मका वाचक बताना संगत नहीं है, तो यह कथन ठीक नहीं है; क्योंकि दोनों जगहके वर्णनकी शैलीमें किंचित् भेद होनेपर भी वास्तवमें कोई विरोध नहीं है। दोनों स्थलोंमें श्रुतिका उद्देश्य गायत्रीशब्दवाच्य तथा ज्योतिःशब्दवाच्य ब्रह्मको सर्वोपरि परम धाममें स्थित बतलाना ही है। सम्बन्ध — 'अत एव प्राणः' (१।१।२३) इस सूत्रमें यह सिद्ध किया गया है कि उस श्रुतिमें 'प्राण' नामसे ब्रह्मका ही वर्णन है; किंतु कौषीतकि- उपनिषद् (३।२)-में प्रतर्दनके प्रति इन्द्रने कहा है कि 'मैं ज्ञानस्वरूप प्राण हूँ, तू आयु तथा अमृतरूपसे मेरी उपासना कर।' इसलिये यह जिज्ञासा होती है कि इस प्रकरणमें आया हुआ 'प्राण' शब्द किसका वाचक है? इन्द्रका? प्राणवायुका? जीवात्माका? अथवा ब्रह्मका? इसपर कहते हैं— प्राणस्तथानुगमात् ॥ १।१।२८॥ प्राणः = प्राणशब्द (यहाँ भी ब्रह्मका ही वाचक है); तथानुगमात् = क्योंकि पूर्वापरके प्रसंगपर विचार करनेसे ऐसा ही ज्ञात होता है। व्याख्या — इस प्रकरणमें पूर्वापर प्रसंगपर भलीभाँति विचार करनेसे 'प्राण' शब्द ब्रह्मका ही वाचक सिद्ध होता है, अन्य किसीका नहीं; क्योंकि आरम्भमें प्रतर्दनने परम पुरुषार्थरूप वर माँगा है। उसके लिये परम हितपूर्ण इन्द्रके उपदेशमें कहा हुआ 'प्राण', 'ब्रह्म' ही होना चाहिये। ब्रह्मज्ञानसे बढ़कर दूसरा कोई हितपूर्ण उपदेश नहीं हो सकता। इसके अतिरिक्त उक्त प्राणको वहाँ प्रज्ञान-स्वरूप बतलाया गया है जो कि ब्रह्मके ही अनुरूप है तथा अन्तमें उसीको आनन्दस्वरूप अजर एवं अमर कहा गया है। फिर उसीको समस्त लोकोंका पालक, अधिपति एवं सर्वेश्वर बताया गया है।* ये सब बातें
- कौषीतकि-उपनिषद्में यह प्रसंग इस प्रकार है—