वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४६४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ वास्तविक रूपसे सम्पन्न हो जाता है। यह आत्मा है, यही अमृत एवं अभय है और यही ब्रह्म है।' (छा० उ० ८।३।४) ब्रह्मलोक अन्य लोकोंकी भाँति विकारी नहीं है। श्रुतिमें उसे नित्य (छा० उ० ८।१३।१), सब पापोंसे रहित (छा० उ० ८।४।१) तथा रजोगुण आदिसे शून्य—विशुद्ध (प्र० उ० १।१६) कहा गया है। गीतामें भी कहा है कि 'इस ज्ञानकी उपासना करके मेरे सदृश धर्मोंको अर्थात् निर्लेपता आदि दिव्य कल्याणमय भावोंको प्राप्त हो जाते हैं, अतः वे न तो जगत्की रचनाके कालमें उत्पन्न होते हैं और न प्रलयकालमें मरनेका दुःख ही भोगते हैं।'* इस प्रकार श्रुतियों और स्मृतियोंमें जगह- जगह मुक्तात्माकी वैसी स्थिति दिखायी गयी है। उसका जो उन-उन अधिकारिवर्गोंके लोकोंमें जाना-आना और वहाँके भोगोंका उपभोग करना है, वह लीलामात्रा है, बन्धनकारक या पुनर्जन्मका हेतु नहीं है। सम्बन्ध—ब्रह्मलोकमें जानेवाले मुक्तात्माका जगत्की उत्पत्ति आदिमें अधिकार या सामर्थ्य नहीं है, इस पूर्वोक्त बातको इस प्रकरणके अन्तमें पुनः सिद्ध करते हैं— भोगमात्रसाम्यलिङ्गाच्च ॥ ४।४।२१ ॥ भोगमात्रसाम्यलिङ्गात् = भोगमात्रमें समतारूप लक्षणसे; च = भी (यही सिद्ध होता है कि उसका जगत्की रचना आदिमें अधिकार नहीं होता)। व्याख्या—जिस प्रकार वह ब्रह्मा समस्त दिव्य कल्याणमय भोगोंका उपभोग करता हुआ भी उनसे लिप्त नहीं होता, उसी प्रकार यह मुक्तात्मा भी उस ब्रह्मलोकमें रहते समय, उपासनाकालमें की हुई भावनाके अनुसार प्राप्त हुए वहाँके दिव्य भोगोंका बिना शरीरके स्वप्नकी भाँति केवल संकल्पसे या शरीर-धारणपूर्वक जाग्रत्की भाँति उपभोग करके भी उनसे लिप्त नहीं होता। इस प्रकार भोगमात्रमें उस ब्रह्माके साथ उसकी समानता है। इस लक्षणसे भी
- इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः। सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च॥ (गीता १४। २)