भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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प्रकृतिखण्ड १७९

लिया। नारद! शङ्खचूड़ मायावियोंका शिरोमणि था। उसने मायासे उस युद्धभूमिमें बाणोंका जाल बिछा दिया और उसके द्वारा कार्तिकेयको ढककर सैकड़ों सूर्योंके समान प्रकाशित होनेवाली एक अमोघ शक्ति हाथमें ली। भगवान् विष्णुके तेजसे व्याप्त हुई वह शक्ति प्रलयाग्निकी शिखाके समान जान पड़ती थी। दानवराजने उसे क्रोधपूर्वक कार्तिकेयके ऊपर बड़े वेगसे दे मारा। वह शक्ति उनके शरीरपर प्रज्वलित अग्निकी राशिके समान गिरी। महाबली कार्तिकेय उस शक्तिसे आहत हो मूर्च्छित हो गये। तब काली उन्हें गोदमें उठाकर भगवान् शिवके पास ले गयी।

शिवने लीलापूर्वक ज्ञान-बलसे उन्हें जीवित कर दिया। साथ ही असीम बल प्रदान किया। प्रतापी वीर कार्तिकेय तत्काल उठकर खड़े हो गये। उसी क्षण भगवान् शंकरने अपनी सेना तथा देवताओंको युद्धके लिये प्रेरित किया। सेनासहित दानवराजोंके साथ देवताओंका युद्ध पुनः प्रारम्भ हुआ। स्वयं देवराज इन्द्र वृषपर्वाके साथ युद्ध करने लगे। सूर्यदेवने विप्रचित्तिके साथ युद्ध छेड़ दिया। चन्द्रमा दम्भके साथ भिड़ गये और बड़ा भारी युद्ध करने लगे। कालने कालेश्वरके साथ और अग्निदेवने गोकर्णके साथ जूझना आरम्भ किया। कालकेयसे कुबेर और मयासुरसे विश्वकर्मा लड़ने लगे। मृत्युदेवता भयंकर नामक दानवसे और यम संहारके साथ भिड़ गये। कलविङ्क और वरुणमें, चञ्चल और वायुमें, बुध और घृतपृष्ठमें तथा रक्ताक्ष और शनैश्चरमें युद्ध होने लगा। जयन्तने रत्नसारका सामना किया। वसुगण और वर्चोगण परस्पर जूझने लगे। दीप्तिमान्‌के साथ अश्विनीकुमार और धूम्रके साथ नलकूबरका युद्ध आरम्भ हुआ। धर्म और धनुर्धर, मङ्गल और मण्डूकाक्ष, शोभाकर और ईशान तथा पीठर और मन्मथ एक-दूसरेका सामना करने लगे। उल्कामुख, धूम्र, खड्गध्वज, काञ्चीमुख, पिण्ड, धूम्र, नन्दी, विश्व और पलाश—इन सबके साथ आदित्यगण घोर युद्ध करने लगे। ग्यारह महारुद्रगण ग्यारह भयंकर दानवोंके साथ भिड़ गये। उग्रदण्डा आदि और महामारीमें युद्ध होने लगा। नन्दीश्वर आदि समस्त रुद्रगण दानवगणोंके साथ लड़ने लगे। वह महान् युद्ध प्रलयकालके समान भयंकर जान पड़ता था। उस समय भगवान् शंकर काली और पुत्रके साथ वटवृक्षके नीचे ठहरे हुए थे। मुने! शेष समस्त सैन्यसमुदाय निरन्तर युद्धमें तत्पर थे। शङ्खचूड़ रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित हो करोड़ों दानवोंके साथ रमणीय रत्नमय सिंहासनपर विराजमान था। उस युद्धमें भगवान् शंकरके समस्त योद्धा पराजित हो गये। समस्त देवता क्षत-विक्षत हो भयके मारे भाग चले।

यह देख भगवान् स्कन्दको बड़ा क्रोध हुआ। उन्होंने देवताओंको अभय दान दिया और अपने तेजसे आत्मीय गणोंका बल बढ़ाया। वे स्वयं भी दानवगणोंके साथ युद्ध करने लगे। उन्होंने समराङ्गणमें दानवोंकी सौ अक्षौहिणी सेनाका संहार कर डाला। कमलोचना कालीने कुपित हो खप्पर गिराना आरम्भ किया। वे दानवोंके सौ-सौ खप्पर खून एक साथ पी जाती थीं। लाखों हाथी और घोड़ोंको एक ही हाथसे समेटकर लीलापूर्वक लील जाती थीं। मुने! समरभूमिमें सहस्रों कबन्ध (बिना सिरके धड़) नृत्य करने लगे। स्कन्दके बाण-समूहोंसे क्षत-विक्षत हुए महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न सभी दानव भयके मारे भाग चले। वृषपर्वा, विप्रचित्ति, दम्भ और विकङ्कन—ये सब बारी-बारीसे स्कन्दके साथ युद्ध करने लगे। अब कालीने समराङ्गणमें प्रवेश किया। भगवान् शिव कार्तिकेयकी रक्षा करने लगे। नन्दीश्वर आदि वीर कालीके ही पीछे-पीछे गये। समस्त देवता, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, किन्नर, बहुत-से राज्यभाण्ड और करोड़ों मेघ भी उन्हींके साथ थे। संग्राममें पहुँचकर