ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण नारदजीने पूछा-मुने ! दक्षिणाहीन कर्मके फलको कौन भोगता है ? साथ ही यज्ञपुरुषने भगवती दक्षिणाकी किस प्रकार पूजा की थी; यह भी बतलाइये। भगवान् नारायण कहते हैं- मुने ! दक्षिणाहीन कर्ममें फल ही कैसे लग सकता है; क्योंकि फल प्रसव करनेकी योग्यता तो दक्षिणावाले कर्ममें ही है। मुने ! बिना दक्षिणाका कर्म तो बलिके पेटमें चला जाता है। पूर्वसमयमें भगवान् वामन बलिके लिये आहाररूपमें इसे अर्पण कर चुके हैं। नारद ! अश्रोत्रिय और श्रद्धाहीन व्यक्तिके द्वारा श्राद्धमें दी हुई वस्तुको बलि भोजनरूपसे प्राप्त करते हैं। शूद्रोंसे सम्बन्ध रखनेवाले ब्राह्मणोंके पूजासम्बन्धी द्रव्य, निषिद्ध एवं आचरणहीन ब्राह्मणोंद्वारा किया हुआ पूजन तथा गुरुमें भक्ति न रखनेवाले पुरुषका कर्म-ये सब बलिके आहार हो जाते हैं, इसमें कोई संशय नहीं है। मुने ! भगवती दक्षिणाके ध्यान, स्तोत्र और पूजाकी विधिके क्रम कण्वशाखामें वर्णित हैं। वह सब मैं कहता हूँ, सुनो। यज्ञपुरुषने कहा-महाभागे ! तुम पूर्वसमयमें गोलोककी एक गोपी थी। गोपियोंमें तुम्हारा प्रमुख स्थान था। राधाके समान ही तुम उनकी सखी थीं। भगवान् श्रीकृष्ण तुमसे प्रेम करते थे। कार्तिकी पूर्णिमाके अवसरपर राधा-महोत्सव मनाया जा रहा था। कुछ कार्यानन्तर उपस्थित हो जानेके कारण तुम भगवान् श्रीकृष्णके दक्षिण कंधेसे प्रकट हुई थीं। अतएव तुम्हारा नाम 'दक्षिणा' पड़ गया। शोभने ! तुम इससे पहले परम शीलवती होनेके कारण 'सुशीला' कहलाती थीं। तुम ऐसी सुयोग्या देवी श्रीराधाके शापसे गोलोकसे च्युत होकर दक्षिणा नामसे सम्पन्न हो मुझे सौभाग्यवश प्राप्त हुई हो। सुभगे ! तुम मुझे अपना स्वामी बनानेकी कृपा करो ! तुम्हीं यज्ञशाली पुरुषोंके कर्मका फल प्रदान करनेवाली आदरणीया देवी हो। तुम्हारे बिना सम्पूर्ण प्राणियोंके सभी कर्म निष्फल हो जाते हैं। तुम्हारी अनुपस्थितिमें कर्मियोंका कर्म भी शोभा नहीं पाता। ब्रह्मा, विष्णु, महेश तथा दिक्पाल प्रभृति सभी देवता तुम्हारे न रहनेसे कर्मोंका फल देनेमें असमर्थ रहते हैं। ब्रह्मा स्वयं कर्मरूप हैं। शंकरको फलरूप बतलाया गया है। मैं विष्णु स्वयं यज्ञरूपसे प्रकट हूँ। इन सबमें साररूपा तुम्हीं हो। साक्षात् परब्रह्म परमात्मा श्रीकृष्ण, जो प्राकृत गुणोंसे रहित तथा प्रकृतिसे परे हैं, समस्त फलोंके दाता हैं, परंतु वे श्रीकृष्ण भी तुम्हारे बिना कुछ करनेमें समर्थ नहीं हैं। कान्ते ! सदा जन्म-जन्ममें तुम्हीं मेरी शक्ति हो। वरानने ! तुम्हारे साथ रहकर ही मैं समस्त कर्मोंमें समर्थ हूँ। ऐसा कहकर यज्ञके अधिष्ठाता देवता दक्षिणाके सामने खड़े हो गये। तब कमलाकी कलास्वरूपा उस देवीने संतुष्ट होकर यज्ञपुरुषका वरण किया। यह भगवती दक्षिणाका स्तोत्र है। जो पुरुष यज्ञके अवसरपर इसका पाठ करता है, उसे सम्पूर्ण यज्ञोंके फल सुलभ हो जाते हैं, इसमें संशय नहीं। सभी प्रकारके यज्ञोंके आरम्भमें जो पुरुष इस स्तोत्रका पाठ करता है, उसके वे सभी यज्ञ निर्विघ्न सम्पन्न हो जाते हैं, यह ध्रुव सत्य है।