भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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गणपतिखण्ड ३३१

उन्होंने उन उमारहित दिगम्बर शिवको प्रसन्नचित्तवाली पार्वतीको लौटा दिया। फिर तो विश्वको आनन्दित करनेवाली दुर्गाने ब्राह्मणोंको अनेक प्रकारके रत्न तथा भिक्षुओं और वन्दियोंको सुवर्ण दान किये। ब्राह्मणों, देवताओं तथा पर्वतोंको भोजन कराया। सर्वोत्तम उपहारोंद्वारा शंकरजीकी पूजा की, बाजा बजवाया, माङ्गलिक कार्य कराये और श्रीहरिसे सम्बन्ध रखनेवाले सुन्दर गीत गवाये। इस प्रकार दुर्गाने व्रतको समाप्त करके परम उल्लासके साथ दान देकर सबको भोजन कराया। तत्पश्चात् अपने स्वामी शिवजीके साथ स्वयं भी भोजन किया। इसके बाद उत्तम पानके सुन्दर बीड़े, जो कपूर आदिसे सुवासित थे, क्रमशः सबको देकर कौतुकवश शिवजीके साथ स्वयं भी खाया। तदनन्तर पार्वतीदेवी एकान्तमें भगवान् शंकरके साथ विहार करने लगीं। इसी बीचमें एक ब्राह्मण दरवाजेपर आया। मुने! उस भिक्षुक ब्राह्मणका रूप तैलाभावके कारण रूखा था, शरीर मैले वस्त्रसे आच्छादित था, उसके दाँत अत्यन्त स्वच्छ थे, वह तृष्णासे पूर्णतया पीड़ित था, उसका शरीर कृश था, वह उज्ज्वल वर्णका तिलक धारण किये हुए था, उसका स्वर बहुत दीन था और दीनताके कारण उसकी मूर्ति कुत्सित थी। इस प्रकारके उस अत्यन्त वृद्ध तथा दुर्बल ब्राह्मणने अन्नकी याचना करनेके लिये दरवाजेपर डंडेके सहारे खड़े होकर महादेवजीको पुकारा।

ब्राह्मणने कहा—महादेव! आप क्या कर रहे हैं? मैं सात राततक चलनेवाले व्रतके समाप्त होनेपर भूखसे व्याकुल होकर भोजनकी इच्छासे आपकी शरणमें आया हूँ, मेरी रक्षा कीजिये। हे तात! आप तो करुणाके सागर हैं, अतः मुझ जराग्रस्त तथा तृष्णासे अत्यन्त पीड़ित वृद्धकी ओर दृष्टि डालिये। अरे ओ महादेव! आप क्या कर रहे हैं ? माता पार्वती! उठो और मुझे सुवासित जल तथा अन्न प्रदान करो। गिरिराजकुमारी! मुझ शरणागतकी रक्षा करो। माता! ओ माता! तुम तो जगत्की माता हो, फिर मैं जगत्से बाहर थोड़े ही हूँ; अतः शीघ्र आओ। भला, अपनी माताके रहते हुए मैं किस कारण तृष्णासे पीड़ित हो रहा हूँ? ब्राह्मणकी दीन वाणी सुनकर शिव-पार्वती उठे। इसी समय शिवजीका शुक्रपात हो गया। वे पार्वतीके साथ द्वारपर आये। वहाँ उन्होंने उस वृद्ध तथा दीन ब्राह्मणको देखा जो वृद्ध-अवस्थासे अत्यन्त पीड़ित था। उसके शरीरमें झुर्रियाँ पड़ गयी थीं। वह डंडा लिये हुए था और उसकी कमर झुक गयी थी। वह तपस्वी होते हुए भी अशान्त था। उसके कण्ठ, ओठ और तालु सूख गये थे और वह बड़ी शक्ति लगाकर उन दोनोंको प्रणाम तथा उनका स्तवन कर रहा था। उसके अमृतसे भी उत्तम वचन सुनकर नीलकण्ठ महादेवजी प्रसन्न हो गये। तब वे मुस्कराकर परम प्रेमके साथ उससे बोले।

शंकरजीने कहा—वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ विप्रवर! इस समय मैं यह जानना चाहता हूँ कि आपका घर कहाँ है और आपका नाम क्या है? इसे शीघ्र बतलाइये।

पार्वतीजी बोलीं—विप्रवर! कहाँसे आपका आगमन हुआ है? मेरा परम सौभाग्य था जो आप यहाँ पधारे। आप ब्राह्मण अतिथि होकर मेरे घरपर आये हैं, अतः आज मेरा जन्म सफल हो गया। द्विजश्रेष्ठ! अतिथिके शरीरमें देवता, ब्राह्मण और गुरु निवास करते हैं; अतः जिसने अतिथिका आदर-सत्कार कर लिया, उसने मानो तीनों लोकोंकी पूजा कर ली। अतिथिके चरणोंमें सभी तीर्थ सदा वर्तमान रहते हैं, अतः अतिथिके चरण-प्रक्षालनके जलसे निश्चय ही गृहस्थको तीर्थोंका फल प्राप्त हो जाता है। जिसने अपनी शक्तिके अनुसार यथोचितरूपसे अतिथिकी पूजा कर ली, उसने मानो सभी तीर्थोंमें स्नान कर लिया तथा सभी यज्ञोंमें दीक्षा ग्रहण कर ली। जिसने