भारतकोश
संग्रह पर लौटें

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

५०- पार्वतीजीके कहनेपर शनैश्चरका गणेशपर दृष्टिपात करना तथा शिशुके मस्तकका धड़से अलग हो जाना

गणपतिखण्ड ३३१

उन्होंने उन उमारहित दिगम्बर शिवको प्रसन्नचित्तवाली पार्वतीको लौटा दिया। फिर तो विश्वको आनन्दित करनेवाली दुर्गाने ब्राह्मणोंको अनेक प्रकारके रत्न तथा भिक्षुओं और वन्दियोंको सुवर्ण दान किये। ब्राह्मणों, देवताओं तथा पर्वतोंको भोजन कराया। सर्वोत्तम उपहारोंद्वारा शंकरजीकी पूजा की, बाजा बजवाया, माङ्गलिक कार्य कराये और श्रीहरिसे सम्बन्ध रखनेवाले सुन्दर गीत गवाये। इस प्रकार दुर्गाने व्रतको समाप्त करके परम उल्लासके साथ दान देकर सबको भोजन कराया। तत्पश्चात् अपने स्वामी शिवजीके साथ स्वयं भी भोजन किया। इसके बाद उत्तम पानके सुन्दर बीड़े, जो कपूर आदिसे सुवासित थे, क्रमशः सबको देकर कौतुकवश शिवजीके साथ स्वयं भी खाया। तदनन्तर पार्वतीदेवी एकान्तमें भगवान् शंकरके साथ विहार करने लगीं। इसी बीचमें एक ब्राह्मण दरवाजेपर आया। मुने! उस भिक्षुक ब्राह्मणका रूप तैलाभावके कारण रूखा था, शरीर मैले वस्त्रसे आच्छादित था, उसके दाँत अत्यन्त स्वच्छ थे, वह तृष्णासे पूर्णतया पीड़ित था, उसका शरीर कृश था, वह उज्ज्वल वर्णका तिलक धारण किये हुए था, उसका स्वर बहुत दीन था और दीनताके कारण उसकी मूर्ति कुत्सित थी। इस प्रकारके उस अत्यन्त वृद्ध तथा दुर्बल ब्राह्मणने अन्नकी याचना करनेके लिये दरवाजेपर डंडेके सहारे खड़े होकर महादेवजीको पुकारा।

ब्राह्मणने कहा—महादेव! आप क्या कर रहे हैं? मैं सात राततक चलनेवाले व्रतके समाप्त होनेपर भूखसे व्याकुल होकर भोजनकी इच्छासे आपकी शरणमें आया हूँ, मेरी रक्षा कीजिये। हे तात! आप तो करुणाके सागर हैं, अतः मुझ जराग्रस्त तथा तृष्णासे अत्यन्त पीड़ित वृद्धकी ओर दृष्टि डालिये। अरे ओ महादेव! आप क्या कर रहे हैं ? माता पार्वती! उठो और मुझे सुवासित जल तथा अन्न प्रदान करो। गिरिराजकुमारी! मुझ शरणागतकी रक्षा करो। माता! ओ माता! तुम तो जगत्की माता हो, फिर मैं जगत्से बाहर थोड़े ही हूँ; अतः शीघ्र आओ। भला, अपनी माताके रहते हुए मैं किस कारण तृष्णासे पीड़ित हो रहा हूँ? ब्राह्मणकी दीन वाणी सुनकर शिव-पार्वती उठे। इसी समय शिवजीका शुक्रपात हो गया। वे पार्वतीके साथ द्वारपर आये। वहाँ उन्होंने उस वृद्ध तथा दीन ब्राह्मणको देखा जो वृद्ध-अवस्थासे अत्यन्त पीड़ित था। उसके शरीरमें झुर्रियाँ पड़ गयी थीं। वह डंडा लिये हुए था और उसकी कमर झुक गयी थी। वह तपस्वी होते हुए भी अशान्त था। उसके कण्ठ, ओठ और तालु सूख गये थे और वह बड़ी शक्ति लगाकर उन दोनोंको प्रणाम तथा उनका स्तवन कर रहा था। उसके अमृतसे भी उत्तम वचन सुनकर नीलकण्ठ महादेवजी प्रसन्न हो गये। तब वे मुस्कराकर परम प्रेमके साथ उससे बोले।

शंकरजीने कहा—वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ विप्रवर! इस समय मैं यह जानना चाहता हूँ कि आपका घर कहाँ है और आपका नाम क्या है? इसे शीघ्र बतलाइये।

पार्वतीजी बोलीं—विप्रवर! कहाँसे आपका आगमन हुआ है? मेरा परम सौभाग्य था जो आप यहाँ पधारे। आप ब्राह्मण अतिथि होकर मेरे घरपर आये हैं, अतः आज मेरा जन्म सफल हो गया। द्विजश्रेष्ठ! अतिथिके शरीरमें देवता, ब्राह्मण और गुरु निवास करते हैं; अतः जिसने अतिथिका आदर-सत्कार कर लिया, उसने मानो तीनों लोकोंकी पूजा कर ली। अतिथिके चरणोंमें सभी तीर्थ सदा वर्तमान रहते हैं, अतः अतिथिके चरण-प्रक्षालनके जलसे निश्चय ही गृहस्थको तीर्थोंका फल प्राप्त हो जाता है। जिसने अपनी शक्तिके अनुसार यथोचितरूपसे अतिथिकी पूजा कर ली, उसने मानो सभी तीर्थोंमें स्नान कर लिया तथा सभी यज्ञोंमें दीक्षा ग्रहण कर ली। जिसने

३३२संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

भारतवर्षमें भक्तिपूर्वक अतिथिका पूजन कर लिया, उसके द्वारा मानो भूतलपर सम्पूर्ण महादान कर लिये गये; क्योंकि वेदोंमें वर्णित जो नाना प्रकारके पुण्य हैं, वे तथा उनके अतिरिक्त अन्य पुण्यकर्म भी अतिथि-सेवाकी सोलहवीं कलाकी समानता नहीं कर सकते। इसलिये जिसके घरसे अतिथि अनादृत होकर लौट जाता है, उस गृहस्थके पितर, देवता, अग्नि और गुरुजन भी तिरस्कृत हो उस अतिथिके पीछे चले जाते हैं। जो अपने अभीष्ट अतिथिकी अर्चना नहीं करता, वह बड़े-बड़े पापोंको प्राप्त करता है।

ब्राह्मणने कहा— वेदज्ञे! आप तो वेदोंके ज्ञानसे सम्पन्न हैं, अतः वेदोक्त विधिसे पूजन कीजिये। माता! मैं भूख-प्याससे पीड़ित हूँ। मैंने श्रुतियोंमें ऐसा वचन भी सुना है कि जब मनुष्य व्याधियुक्त, आहाररहित अथवा उपवास-व्रती होता है, तब वह स्वेच्छानुसार भोजन करना चाहता है।

पार्वतीजीने पूछा— विप्रवर! आप क्या भोजन करना चाहते हैं? वह यदि त्रिलोकीमें परम दुर्लभ होगा तो भी आज मैं आपको खिलाऊँगी। आप मेरा जन्म सफल कीजिये।

ब्राह्मणने कहा— सुव्रते! मैंने सुना है कि उत्तम व्रतपरायणा आपने पुण्यक-व्रतमें सभी प्रकारका भोजन एकत्रित किया है, अतः उन्हीं अनेक प्रकारके मिष्ठान्नोंको खानेके लिये मैं आया हूँ। मैं आपका पुत्र हूँ। जो मिष्ठान्न तीनों लोकोंमें दुर्लभ हैं, उन पदार्थोंको मुझे देकर आप सबसे पहले मेरी पूजा करें। साध्वि! वेदवादियोंका कथन है कि पिता पाँच प्रकारके होते हैं। माताएँ अनेक तरहकी कही जाती हैं और पुत्रके पाँच भेद हैं। विद्यादाता (गुरु), अन्नदाता, भयसे रक्षा करनेवाला, जन्मदाता (पिता) और कन्यादाता (श्वशुर)—ये मनुष्योंके वेदोक्त पिता कहे गये हैं। गुरुपत्नी, गर्भधात्री (जननी), स्तनदात्री (धाय), पिताकी बहिन (बुआ), माताकी बहिन (मौसी), माताकी सपत्नी (सौतेली माता), अन्न प्रदान करनेवाली (पाचिका) और पुत्रवधू—ये माताएँ कहलाती हैं। भृत्य, शिष्य, दत्तक, वीर्यसे उत्पन्न (औरस) और शरणागत—ये पाँच प्रकारके पुत्र हैं। इनमें चार धर्मपुत्र कहलाते हैं और पाँचवाँ औरस पुत्र धनका भागी होता है*। माता! मैं आप पुत्रहीनाका ही अनाथ पुत्र हूँ, वृद्धावस्थासे ग्रस्त हूँ और इस समय भूख-प्याससे पीड़ित होकर आपकी शरणमें आया हूँ। गिरिराजकिशोरी! अन्नोंमें श्रेष्ठ पूड़ी, उत्तम-उत्तम पके फल, आटेके बने हुए नाना प्रकारके पदार्थ, काल-देशानुसार उत्पन्न हुई वस्तुएँ, पक्वान्न, चावलके आटेका बना हुआ तिकोना पदार्थविशेष, दूध, गन्ना, गुड़के बने हुए द्रव्य, घी, दही, अगहनीका भात, घृतमें पका हुआ व्यञ्जन, गुड़मिश्रित तिलोंके लड्डू, मेरी जानकारीसे बाहर सुधा-तुल्य अन्य वस्तुएँ, कर्पूर आदिसे सुवासित सुन्दर श्रेष्ठ ताम्बूल, अत्यन्त निर्मल तथा स्वादिष्ट जल—इन सभी सुवासित पदार्थोंको, जिन्हें खाकर मेरी सुन्दर तोंद हो जाय, मुझे प्रदान कीजिये।

आपके स्वामी सारी सम्पत्तियोंके दाता तथा त्रिलोकीके सृष्टिकर्ता हैं और आप सम्पूर्ण ऐश्वर्योंको प्रदान करनेवाली महालक्ष्मीस्वरूपा हैं; अतः आप मुझे रमणीय रत्नसिंहासन, अमूल्य रत्नोंके आभूषण, अग्निशुद्ध सुन्दर वस्त्र, अत्यन्त दुर्लभ श्रीहरिका मन्त्र, श्रीहरिमें सुदृढ़ भक्ति,


* विद्यादातान्नदाता च भयत्राता च जन्मदः। कन्यादाता च वेदोक्ता नराणां पितरः स्मृताः॥
गुरुपत्नी गर्भधात्री स्तनदात्री पितुः स्वसा। स्वसा मातुः सपत्नी च पुत्रभार्यान्नदायिका॥
भृत्यः शिष्यश्च पोष्यश्च वीर्यजः शरणागतः। धर्मपुत्राश्च चत्वारो वीर्यजो धनभागिति॥
(गणपतिखण्ड ८। ४७–४९)

गणपतिखण्ड

३३३


मृत्युञ्जय नामक ज्ञान, सुखप्रदायिनी दानशक्ति और सर्वसिद्धि दीजिये। सतीमाता! आप ही सदा श्रीहरिकी प्रिया तथा सर्वस्व प्रदान करनेवाली शक्ति हैं; अतः अपने पुत्रके लिये आपको कौन-सी वस्तु अदेय है? मैं उत्तम धर्म और तपस्यामें लगे हुए मनको अत्यन्त निर्मल करके सारा कार्य करूँगा, परंतु जन्महेतुक कामनाओंमें नहीं लगूँगा; क्योंकि मनुष्य अपनी इच्छासे कर्म करता है, कर्मसे भोगकी प्राप्ति होती है। वे भोग शुभ और अशुभ दो प्रकारके होते हैं और वे ही दोनों सुख-दुःखके हेतु हैं। जगदम्बिके! न किसीसे दुःख होता है न सुख, सब अपने कर्मका ही भोग है; इसलिये विद्वान् पुरुष कर्मसे विरत हो जाते हैं। सत्पुरुष निरन्तर आनन्दपूर्वक बुद्धिद्वारा हरिका स्मरण करनेसे, तपस्यासे तथा भक्तोंके सङ्गसे कर्मको ही निर्मूल कर देते हैं; क्योंकि इन्द्रिय और उनके विषयोंके संयोगसे उत्पन्न हुआ सुख तभीतक रहता है, जबतक उनका नाश नहीं हो जाता, परंतु हरिकीर्तनरूप सुख सब कालमें वर्तमान रहता है।

सतीदेवि! हरिध्यानपरायण भक्तोंकी आयु नष्ट नहीं होती; क्योंकि काल तथा मृत्युञ्जय उनपर अपना प्रभाव नहीं डाल सकते—यह ध्रुव है। वे चिरजीवी भक्त भारतवर्षमें चिरकालतक जीवित रहते हैं और सम्पूर्ण सिद्धियोंका ज्ञान प्राप्त करके स्वच्छन्दतापूर्वक सर्वत्रगामी होते हैं। हरिभक्तोंको पूर्वजन्मका स्मरण बना रहता है। वे अपने करोड़ों जन्मोंको जानते हैं और उनकी कथाएँ कहते हैं; फिर आनन्दके साथ स्वेच्छानुसार जन्म धारण करते हैं। वे स्वयं तो पवित्र होते ही हैं, अपनी लीलासे दूसरोंको तथा तीर्थोंको पवित्र कर देते हैं। इस पुण्यक्षेत्र भारतमें वे परोपकार और सेवाके लिये भ्रमण करते रहते हैं। वे वैष्णव जिस तीर्थमें गोदोहन-कालमात्र भी ठहर जाते हैं तो उनके चरणस्पर्शसे वसुन्धरा तत्काल ही पवित्र हो जाती है। जिन मनुष्योंको भक्तोंका दर्शन अथवा आलिङ्गन प्राप्त हो जाता है, वे मानो समस्त तीर्थोंमें भ्रमण कर चुके और उन्हें सम्पूर्ण यज्ञोंकी दीक्षा मिल चुकी। जैसे सब कुछ भक्षण करनेपर भी अग्नि और समस्त पदार्थोंका स्पर्श करनेपर भी वायु दूषित नहीं कहे जाते, उसी प्रकार निरन्तर हरिमें चित्त लगानेवाले भक्त पापोंसे लिप्त नहीं होते। करोड़ों जन्मोंके अन्तमें मनुष्य-जन्म मिलता है। फिर मनुष्य-योनिमें बहुत-से जन्मोंके बाद उसे भक्तोंका सङ्ग प्राप्त होता है।

सती पार्वति! भक्तोंके सङ्गसे प्राणियोंके हृदयमें भक्तिका अंकुर उत्पन्न होता है और भक्तिहीनोंके दर्शनसे वह सूख जाता है। पुनः वैष्णवोंके साथ वार्तालाप करनेसे वह प्रफुल्लित हो उठता है। तत्पश्चात् वह अविनाशी अंकुर प्रत्येक जन्ममें बढ़ता रहता है। सती! वृद्धिको प्राप्त होते हुए उस वृक्षका फल हरिकी दासता है। इस प्रकार भक्तिके परिपक्व हो जानेपर परिणाममें वह श्रीहरिका पार्षद हो जाता है। फिर तो महाप्रलयके अवसरपर ब्रह्मा, ब्रह्मलोक तथा सम्पूर्ण सृष्टिका संहार हो जानेपर भी निश्चय ही उसका नाश नहीं होता। अम्बिके! इसलिये मुझे सदा नारायणके चरणोंमें भक्ति प्रदान कीजिये; क्योंकि विष्णुमाये! आपके बिना विष्णुमें भक्ति नहीं प्राप्त होती। आपकी तपस्या और पूजन तो लोकशिक्षाके लिये हैं; क्योंकि आप नित्यस्वरूपा सनातनी देवी हैं और समस्त कर्मोंका फल प्रदान करनेवाली हैं। प्रत्येक कल्पमें श्रीकृष्ण गणेशरूपसे आपके पुत्र बनकर आपकी गोदमें आते हैं।

यों कहकर वे ब्राह्मण तुरंत ही अन्तर्धान हो गये। वे परमेश्वर इस प्रकार अन्तर्हित होकर बालरूप धारण करके महलके भीतर स्थित पार्वतीकी शय्यापर जा पहुँचे और जन्मे हुए बालककी भाँति घरकी छतके भीतरी भागकी ओर देखने लगे। उस बालकके शरीरकी आभा

३३४संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

शुद्ध चम्पकके समान थी। उसका प्रकाश करोड़ों चन्द्रमाओंकी भाँति उद्दीप्त था। सब लोग सुखपूर्वक उसकी ओर देख सकते थे। वह नेत्रोंकी ज्योति बढ़ानेवाला था। कामदेवको विमोहित करनेवाला उसका अत्यन्त सुन्दर शरीर था। उसका अनुपम मुख शारदीय पूर्णिमाका उपहास कर रहा था। सुन्दर कमलको तिरस्कृत करनेवाले उसके सुन्दर नेत्र थे। ओष्ठ और अधरपुट ऐसे लाल थे कि उसे देखकर पका हुआ बिम्बाफल भी लज्जित हो जाता था। कपाल और कपोल परम मनोहर थे। गरुड़के चोंचकी भी निन्दा करनेवाली रुचिर नासिका थी। उसके सभी अङ्ग उत्तम थे। त्रिलोकीमें कहीं उसकी उपमा नहीं थी। इस प्रकार वह रमणीय शय्यापर सोया हुआ शिशु हाथ-पैर उछाल रहा था।

(अध्याय ८)


श्रीहरिके अन्तर्धान हो जानेपर शिव-पार्वतीद्वारा ब्राह्मणकी खोज, आकाशवाणीके सूचित करनेपर पार्वतीका महलमें जाकर पुत्रको देखना और शिवजीको बुलाकर दिखाना, शिव-पार्वतीका पुत्रको गोदमें लेकर आनन्द मनाना

श्रीनारायण कहते हैं—मुने! इस प्रकार जब श्रीहरि अन्तर्धान हो गये, तब दुर्गा और शंकर ब्राह्मणकी खोज करते हुए चारों ओर घूमने लगे।

उस समय पार्वतीजी कहने लगीं—हे विप्रवर! आप तो अत्यन्त वृद्ध और भूखसे व्याकुल थे। हे तात! आप कहाँ चले गये? विभो! मुझे दर्शन दीजिये और मेरे प्राणोंकी रक्षा कीजिये। शिवजी! शीघ्र उठिये और उन ब्राह्मणदेवकी खोज कीजिये। वे क्षणमात्रके लिये उदास मनवाले हमलोगोंके सामने आये थे। परमेश्वर! यदि भूखसे पीड़ित अतिथि गृहस्थके घरसे अपूजित होकर चला जाता है तो क्या उस गृहस्थका जीवन व्यर्थ नहीं हो जाता? यहाँतक कि उसके पितर उसके द्वारा दिये गये पिण्डदान और तर्पणको नहीं ग्रहण करते तथा अग्नि उसकी दी हुई आहुति और देवगण उसके द्वारा निवेदित पुष्प एवं जल नहीं स्वीकार करते। उस अपवित्रका हव्य, पुष्प, जल और द्रव्य—सभी मदिराके तुल्य हो जाता है। उसका शरीर मल-सदृश और स्पर्श पुण्यनाशक हो जाता है।

इसी बीच वहाँ आकाशवाणी हुई, जिसे शोकसे आतुर तथा विकलतासे युक्त दुर्गाने सुना। (आकाशवाणीने कहा—) जगन्माता! शान्त हो जाओ और मन्दिरमें अपने पुत्रकी ओर दृष्टिपात करो। वह साक्षात् गोलोकाधिपति परिपूर्णतम परात्पर श्रीकृष्ण है तथा सुपुण्यक-व्रतरूपी वृक्षका सनातन फल है। योगी लोग जिस अविनाशी तेजका प्रसन्नमनसे निरन्तर ध्यान करते हैं; वैष्णवगण तथा ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि देवता जिसके ध्यानमें लीन रहते हैं; प्रत्येक कल्पमें जिस पूजनीयकी सर्वप्रथम पूजा होती है, जिसके स्मरणमात्रसे समस्त विघ्न नष्ट हो जाते हैं, तथा जो पुण्यकी राशिस্বরূপ है, मन्दिरमें विराजमान अपने उस पुत्रकी ओर तो दृष्टि डालो। प्रत्येक कल्पमें तुम जिस सनातन ज्योति रूपका ध्यान करती हो, वही तुम्हारा पुत्र है। यह मुक्तिदाता तथा भक्तोंके अनुग्रहका मूर्त रूप है। जरा उसकी ओर तो निहारो। जो तुम्हारी कामनापूर्तिका बीज, तपरूपी कल्पवृक्षका फल और लावण्यतामें करोड़ों कामदेवोंकी निन्दा करनेवाला है, अपने उस सुन्दर पुत्रको देखो। दुर्गे! तुम क्यों विलाप कर रही हो? अरे, यह क्षुधातुर ब्राह्मण नहीं है, यह तो विप्रवेषमें जनार्दन

गणपतिखण्ड ३३५


हैं। अब कहाँ वह वृद्ध और कहाँ वह अतिथि ? नारद! यों कहकर सरस्वती चुप हो गयीं।

तब उस आकाशवाणीको सुनकर सती पार्वती भयभीत हो अपने महलमें गयीं। वहाँ उन्होंने पलंगपर सोये हुए बालकको देखा। वह आनन्दपूर्वक मुस्कराते हुए महलकी छतके भीतरी भागको निहार रहा था। उसकी प्रभा सैकड़ों चन्द्रमाओंके तुल्य थी। वह अपने प्रकाशसमूहसे भूतलको प्रकाशित कर रहा था। हर्षपूर्वक स्वेच्छानुसार इधर-उधर देखते हुए शय्यापर उछल-कूद रहा था और स्तनपानकी इच्छासे रोते हुए ‘उमा’ ऐसा शब्द कर रहा था। उस अद्भुत रूपको देखकर सर्वमङ्गला पार्वती त्रस्त हो शंकरजीके संनिकट गयीं और उन प्राणेश्वरसे मङ्गल-वचन बोलीं।

पार्वतीने कहा—प्राणपति! घर चलिये और मन्दिरके भीतर चलकर प्रत्येक कल्पमें आप जिसका ध्यान करते हैं तथा जो तपस्याका फलदाता है, उसे देखिये। जो पुण्यका बीज, महोत्सवस्वरूप, ‘पुत्’ नामक नरकसे रक्षा करनेका कारण और भवसागरसे पार करनेवाला है, शीघ्र ही उस पुत्रके मुखका अवलोकन कीजिये; क्योंकि समस्त तीर्थोंमें स्नान तथा सम्पूर्ण यज्ञोंमें दीक्षा-ग्रहणका पुण्य इस पुत्रदर्शनके पुण्यकी सोलहवीं कलाकी समानता नहीं कर सकता। सर्वस्व दान कर देनेसे जो पुण्य होता है तथा पृथ्वीकी प्रदक्षिणा करनेसे जिस पुण्यकी प्राप्ति होती है, वे सभी इस पुत्रदर्शन जन्य पुण्यके सोलहवें अंशके भी बराबर नहीं हैं।

पार्वतीके ये वचन सुनकर शिवजीका मन हर्षमग्न हो गया। वे तुरंत ही अपनी प्रियतमाके साथ अपने घर आये। वहाँ उन्होंने शय्यापर अपने पुत्रको देखा। उसकी कान्ति तपाये हुए स्वर्णके समान उद्दीप्त थी। (फिर सोचने लगे—) मेरे हृदयमें जो अत्यन्त मनोहर रूप विद्यमान था, यह तो वही है। तत्पश्चात् दुर्गाने उस पुत्रको शय्यापरसे उठा लिया और उसे छातीसे लगाकर वे उसका चुम्बन करने लगीं। उस समय वे आनन्द-सागरमें निमग्न होकर यों कहने लगीं—‘बेटा! जैसे दरिद्रका मन सहसा उत्तम धन पाकर संतुष्ट हो जाता है, उसी तरह तुझ सनातन अमूल्य रत्नकी प्राप्तिसे मेरा मनोरथ पूर्ण हो गया। जैसे चिरकालसे प्रवासी हुए प्रियतमके घर लौटनेपर स्त्रीका मन पूर्णतया हर्षमग्न हो जाता है, वही दशा मेरे मनकी भी हो रही है। वत्स! जैसे एक पुत्रवाली माता चिरकालसे बाहर गये हुए अपने इकलौते पुत्रको आया हुआ देखकर परितुष्ट होती है, वैसे ही इस समय मैं भी संतुष्ट हो रही हूँ। जैसे मनुष्य चिरकालसे नष्ट हुए उत्तम रत्नको तथा अनावृष्टिके समय उत्तम वृष्टिको पाकर हर्षसे फूल उठता है, उसी प्रकार तुझ पुत्रको पाकर मैं भी हर्ष-गद्गद हो रही हूँ। जैसे चिरकालके पश्चात् आश्रयहीन अंधेका मन परम निर्मल नेत्रकी प्राप्तिसे प्रसन्न हो जाता है, वही अवस्था (तुझे पाकर) मेरे मनकी भी हो रही है। जैसे दुस्तर अगाध सागरमें गिरे हुए अथवा विपत्तिमें फँसे हुए नौका आदि

३३६संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

साधनविहीन मनुष्यका मन नौकाको पाकर आनन्दसे भर जाता है, वैसे ही मेरा मन भी आनन्दित हो रहा है। जैसे प्याससे सूखे हुए कण्ठवाले मनुष्योंका मन चिरकालके पश्चात् अत्यन्त शीतल एवं सुवासित जलको पाकर प्रसन्न हो जाता है, वही दशा मेरे मनकी भी है। जैसे दावाग्निसे घिरे हुएको अग्निरहित स्थान और आश्रयहीनको आश्रय मिल जानेसे मनकी इच्छा पूरी हो जाती है, उसी प्रकार मेरी भी इच्छापूर्ति हो रही है। चिरकालसे व्रतोपवास करनेवाले भूखे मनुष्योंका मन जैसे सामने उत्तम अन्न देखकर प्रसन्न हो उठता है, उसी तरह मेरा मन भी हर्षित हो रहा है।' यों कहकर पार्वती ने अपने बालकको गोदमें लेकर प्रेमके साथ उसके मुखमें अपना स्तन दे दिया। उस समय उनका मन परमानन्दमें निमग्न हो रहा था। तत्पश्चात् भगवान् शंकरने भी प्रसन्नमनसे उस बालकको अपनी गोदमें उठा लिया।

(अध्याय ९)


शिव, पार्वती तथा देवताओंद्वारा अनेक प्रकारका दान दिया जाना, बालकको देवताओं एवं देवियोंका शुभाशीर्वाद और इस मङ्गलाध्यायके श्रवणका फल

श्रीनारायणजी कहते हैं—नारद ! तदनन्तर उन दोनों पति-पत्नी—शिव-पार्वती ने बाहर जाकर पुत्रकी मङ्गलकामनासे हर्षपूर्वक ब्राह्मणोंको नाना प्रकारके रत्न दान किये तथा भिक्षुओं और वन्दियोंको विभिन्न प्रकारकी वस्तुएँ बाँटीं। उस अवसरपर शंकरजीने अनेक प्रकारके बाजे बजवाये। हिमालयने ब्राह्मणोंको एक लाख रत्न, एक हजार श्रेष्ठ हाथी, तीन लाख घोड़े, दस लाख गौएँ, पाँच लाख स्वर्णमुद्राएँ तथा और भी जो मुक्ता, हीरे और रत्न आदि श्रेष्ठ मणियाँ थीं, वे सभी दान कीं। इसके अतिरिक्त दूसरे प्रकारके भी दान—जैसे वस्त्र, आभूषण और क्षीरसागरसे उत्पन्न सभी तरहके अमूल्य रत्न आदि दिये। कौतुकी विष्णुने ब्राह्मणोंको कौस्तुभमणिका दान दिया। ब्रह्माने हर्षपूर्वक ब्राह्मणोंको ऐसी विशिष्ट वस्तुएँ दान कीं जो सृष्टिमें परम दुर्लभ थीं तथा वे ब्राह्मण जिन्हें पाना चाहते थे। इसी तरह धर्म, सूर्य, इन्द्र, देवगण, मुनिगण, गन्धर्व, पर्वत तथा देवियोंने क्रमशः दान दिये। ब्रह्मन् ! उस अवसरपर क्षीरसागरने हर्षित होकर कौतुकवश एक हजार माणिक्य, एक सौ कौस्तुभमणि, एक सौ हीरक, एक सहस्र हरे रंगकी श्रेष्ठ मणियाँ, एक लाख गो-रत्न, एक सहस्र गज-रत्न, श्वेतवर्णके अन्यान्य अमूल्य रत्न, एक करोड़ स्वर्णमुद्राएँ और अग्निमें तपाकर शुद्ध किये हुए वस्त्र ब्राह्मणोंको प्रदान किये। सरस्वतीदेवीने अमूल्य रत्नोंका बना हुआ एक ऐसा हार दिया, जो तीनों लोकोंमें दुर्लभ था। वह अत्यन्त निर्मल, साररूप और अपनी प्रभासे सूर्यके प्रकाशकी निन्दा करनेवाला, मणिजटित और हीरेके नगोंसे सुशोभित था। उस रमणीय हारके मध्यमें कौस्तुभमणि पिरोयी हुई थी। सावित्रीने हर्षित होकर एक बहुमूल्य रत्नोंद्वारा निर्मित त्रिलोकीका साररूप हार और सब तरहके आभूषण प्रदान किये। आनन्दमग्न कुबेरने एक लाख सोनेकी सिलें, अनेक प्रकारके धन और एक सौ अमूल्य रत्न दान किये। मुने ! शिवपुत्रके जन्मोत्सवमें उपस्थित सभी लोगोंने इस प्रकार ब्राह्मणोंको दान देकर तत्पश्चात् उस शिशुका दर्शन किया। उस समय वे सब परमानन्दमें निमग्न थे। मुने ! उस दानमें ब्राह्मणों तथा वन्दियोंको इतना धन मिला था कि वे उसका भार ढोनेमें असमर्थ थे, इसलिये बोझसे घबराकर मार्गमें ठहर-ठहरकर चलते थे। वे सभी विश्राम कर चुकनेपर पूर्वकालके दाताओंकी कथाएँ कहते थे, जिसे वृद्ध एवं युवा भिक्षुक प्रेमपूर्वक सुनते थे।

गणपतिखण्ड ३३७

नारद! उस अवसरपर विष्णुने आनन्दमग्न होकर दुन्दुभिका शब्द कराया, गीत गवाया, नाच कराया, वेदों और पुराणोंका पाठ कराया। फिर मुनिवरोंको बुलवाकर हर्षपूर्वक उनका पूजन किया, माङ्गलिक कार्य कराया और उनसे आशीर्वाद दिलाया। तत्पश्चात् देवी तथा देवगणोंके साथ वे स्वयं भी उस बालकको शुभाशीर्वाद देने लगे।

विष्णुने कहा—बालक! तुम दीर्घायु, ज्ञानमें शिवके सदृश, पराक्रममें मेरे तुल्य और सम्पूर्ण सिद्धियोंके ईश्वर होओ।

ब्रह्माने कहा—वत्स! तुम्हारे यशसे जगत् पूर्ण हो जाय, तुम शीघ्र ही सर्वपूज्य हो जाओ और सबसे पहले तुम्हारी परम दुर्लभ पूजा हो।

धर्मने कहा—पार्वतीनन्दन! तुम मेरे समान परम धार्मिक, सर्वज्ञ, दयालु, हरिभक्त और श्रीहरिके समान परम दुर्लभ होओ।

महादेवने कहा—प्राणप्रिय पुत्र! तुम मेरी भाँति दाता, हरिभक्त, बुद्धिमान्, विद्यावान्, पुण्यवान्, शान्त और जितेन्द्रिय होओ।

लक्ष्मीने कहा—बेटा! तुम्हारे घरमें तथा शरीरमें मेरी सनातनी स्थिति बनी रहे और मेरी ही तरह तुम्हें शान्त एवं मनोहर रूपवाली पतिव्रता पत्नी प्राप्त हो।

सरस्वतीने कहा—पुत्र! मेरे ही तुल्य तुम्हें परमोत्कृष्ट कवित्वशक्ति, धारणाशक्ति, स्मरणशक्ति और विवेचनशक्तिकी प्राप्ति हो।

सावित्रीने कहा—वत्स! मैं वेदमाता हूँ, अतः तुम मेरे मन्त्रजपमें तत्पर होकर शीघ्र ही वेदवादियोंमें श्रेष्ठ तथा वेदज्ञानी हो जाओ।

हिमालयने कहा—बेटा! तुम्हारी बुद्धि सदा श्रीकृष्णमें लगी रहे, श्रीकृष्णमें ही तुम्हारी सनातनी भक्ति हो, तुम श्रीकृष्णके समान गुणवान् होओ और सदा श्रीकृष्णपरायण बने रहो।

मेनकाने कहा—वत्स! तुम गम्भीरतामें समुद्रके समान, सुन्दरतामें कामदेवके सदृश, लक्ष्मीवानोंमें श्रीपतिके तुल्य और धर्ममें धर्मकी तरह होओ।

वसुन्धराने कहा—वत्स! तुम मेरी तरह क्षमाशील, शरणदाता, सम्पूर्ण रत्नोंसे सम्पन्न, विघ्नरहित, विघ्नविनाशक और शुभके आश्रयस्थान होओ।

पार्वतीने कहा—बेटा! तुम अपने पिताके समान महान् योगी, सिद्ध, सिद्धियोंके प्रदाता, शुभकारक, मृत्युञ्जय, ऐश्वर्यशाली और अत्यन्त निपुण होओ।

तदनन्तर समागत सभी ऋषियों, मुनियों और सिद्धोंने आशीर्वाद दिया और ब्राह्मणों तथा वन्दियोंने सब प्रकारकी मङ्गल-कामना की। वत्स नारद! इस प्रकार मैंने गणेशका जन्मवृत्तान्त, जो सम्पूर्ण मङ्गलोंका मङ्गल करनेवाला तथा समस्त विघ्नोंका विनाशक है, पूर्णतया तुमसे वर्णन कर दिया। जो मनुष्य अत्यन्त समाहित होकर इस सुमङ्गलाध्यायको सुनता है, वह सम्पूर्ण मङ्गलोंसे युक्त होकर मङ्गलोंका आवासस्थान हो जाता है। इसके श्रवणसे पुत्रहीनको पुत्र, निर्धनको धन, कृपणको निरन्तर धन प्रदान करनेकी शक्ति, भार्यार्थीको भार्या, प्रजाकामीको प्रजा और रोगीको आरोग्य प्राप्त होता है। दुर्भगा स्त्रीको सौभाग्य, भ्रष्ट हुआ पुत्र, नष्ट हुआ धन और प्रवासी पति मिल जाता है तथा शोकग्रस्तको सदा आनन्दकी प्राप्ति हो जाती है, इसमें संशय नहीं है। मुने! गणेशाख्यानके श्रवणसे मनुष्यको जिस पुण्यकी प्राप्ति होती है, वह फल निश्चय ही इस अध्यायके श्रवणसे मिल जाता है। यह मङ्गलाध्याय जिसके घरमें विद्यमान रहता है, वह सदा मङ्गलयुक्त रहता है, इसमें तनिक भी संशय नहीं है। यात्राकालमें अथवा पुण्यपर्वपर जो मनुष्य एकाग्रचित्तसे इसका श्रवण करता है, वह श्रीगणेशकी कृपासे अपने सभी मनोरथोंको पा जाता है।

(अध्याय १०)

३३८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण


गणेशको देखनेके लिये शनैश्चरका आना और पार्वतीके पूछनेपर अपने द्वारा किसी वस्तुके न देखनेका कारण बताना

श्रीनारायणजी कहते हैं— नारद ! इस प्रकार उस बालकको आशीर्वाद देकर श्रीहरि उस सभामें देवताओं और मुनियोंके साथ एक रत्ननिर्मित श्रेष्ठ सिंहासनपर विराजमान हुए। उनके दक्षिणभागमें शंकर, वामभागमें प्रजापति ब्रह्मा और आगे धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ तथा जगत्‌के साक्षी धर्मने आसन ग्रहण किया। ब्रह्मन् ! फिर धर्मके समीप सूर्य, इन्द्र, चन्द्रमा, देवगण, मुनिसमुदाय और पर्वतसमूह सुखपूर्वक आसनोंपर बैठे। इसी बीच महायोगी सूर्यपुत्र शनैश्चर शंकरनन्दन गणेशको देखनेके लिये वहाँ आये। उनका मुख अत्यन्त नम्र था, आँखें कुछ मुँदी हुई थीं और मन एकमात्र श्रीकृष्णमें लगा हुआ था; अतः वे बाहर-भीतर श्रीकृष्णका स्मरण कर रहे थे। वे तपःफलको खानेवाले, तेजस्वी, धधकती हुई अग्निकी शिखाके समान प्रकाशमान, अत्यन्त सुन्दर, श्यामवर्ण, पीताम्बरधारी और श्रेष्ठ थे। उन्होंने वहाँ पहले विष्णु, ब्रह्मा, शिव, धर्म, सूर्य, देवगणों और मुनिवरोंको प्रणाम किया। फिर उनकी आज्ञासे वे उस बालकको देखनेके लिये गये। भीतर जाकर शनैश्चरने सिर झुकाकर पार्वतीदेवीको नमस्कार किया। उस समय वे पुत्रको छातीसे चिपटाये रत्नसिंहासनपर विराजमान हो आनन्दपूर्वक मुस्करा रही थीं। पाँच सखियाँ निरन्तर उनपर श्वेत चँवर डुलाती जाती थीं। वे सखीद्वारा दिये गये सुवासित ताम्बूलको चबा रही थीं। उनके शरीरपर अग्निसे तपाकर शुद्ध की हुई सुन्दर साड़ी शोभायमान थी। रत्नोंके आभूषण उनकी शोभा बढ़ा रहे थे। सहसा सूर्यनन्दन शनैश्चरको सिर झुकाये देखकर दुर्गाने उन्हें शीघ्र ही शुभाशीर्वाद दिया और फिर उनसे वार्तालाप करके उनका कुशल-मङ्गल पूछा।

पार्वतीने पुनः पूछा— ग्रहेश्वर ! इस समय तुम्हारा मुख नीचेकी ओर क्यों झुका हुआ है तथा तुम मुझे अथवा इस बालककी ओर देख क्यों नहीं रहे हो? साधो ! मैं इसका कारण सुनना चाहती हूँ।

शनैश्चरने कहा— साध्वि ! सारे जीव स्वकर्मानुसार अपनी करनीका फल भोगते हैं; क्योंकि जो भी शुभ अथवा अशुभ कर्म होता है, उसका करोड़ों कल्पोंमें भी नाश नहीं होता। जीव कर्मानुसार ब्रह्मा, इन्द्र और सूर्यके भवनमें जन्म लेता है। कर्मसे ही वह मनुष्यके घरमें और कर्मसे ही पशु आदि योनियोंमें उत्पन्न होता है। कर्मसे वह नरकमें जाता है और कर्मसे ही उसे वैकुण्ठकी प्राप्ति होती है। स्वकर्मानुसार वह चक्रवर्ती राजा हो जाता है और अपने ही कर्मसे वही नौकर भी होता है। माता ! कर्मसे ही वह सुन्दर होता है और अपने कर्मके फलस्वरूप वह सदा रोगग्रस्त बना रहता है। कर्मानुसार ही वह विषयप्रेमी और अपने कर्मसे ही विषयोंसे निर्लिप्त रहता है। कर्मसे ही वह लोकमें धनवान्, कर्मसे ही दरिद्र, कर्मसे ही उत्तम कुटुम्बवाला और कर्मसे ही बन्धुओंके लिये कण्टकरूप हो जाता है। अपने कर्मसे ही जीवको उत्तम पत्नी, उत्तम पुत्र और निरन्तर सुखकी प्राप्ति होती है तथा स्वकर्मसे ही वह पुत्रहीन, दुष्ट स्वभावा स्त्रीका स्वामी अथवा स्त्रीहीन होता है।

शंकरवल्लभे ! मैं एक परम गोपनीय इतिहास, यद्यपि वह लज्जाजनक तथा माताके समक्ष कहने योग्य नहीं है, कहता हूँ, सुनिये। मैं बचपनसे ही श्रीकृष्णका भक्त था। मेरा मन सदा एकमात्र श्रीकृष्णके ध्यानमें ही लगा रहता था। मैं विषयोंसे विरक्त होकर निरन्तर तपस्यामें रत रहता था।

गणपतिखण्ड ३३९

पिताजीने चित्ररथकी कन्यासे मेरा विवाह कर दिया। वह सती-साध्वी नारी अत्यन्त तेजस्विनी तथा सतत तपस्यामें रत रहनेवाली थी। एक दिन ऋतुस्नान करके वह मेरे पास आयी। उस समय मैं भगवच्चरणोंका ध्यान कर रहा था। मुझे बाह्यज्ञान बिलकुल नहीं था। पत्नीने अपना ऋतुकाल निष्फल जानकर मुझे शाप दे दिया कि 'तुम अब जिसकी ओर दृष्टि करोगे, वही नष्ट हो जायगा'। तदनन्तर जब मैं ध्यानसे विरत हुआ, तब मैंने उस सतीको संतुष्ट किया; परंतु अब तो वह शापसे मुक्त करानेमें असमर्थ थी; अतः पश्चात्ताप करने लगी। माता! इसी कारण मैं किसी वस्तुको अपने नेत्रोंसे नहीं देखता और तभीसे मैं जीवहिंसाके भयसे स्वाभाविक ही अपने मुखको नीचे किये रहता हूँ। मुने! शनैश्चरकी बात सुनकर पार्वती हँसने लगीं और नर्तकियों तथा किन्नरियोंका सारा समुदाय ठहाका मारकर हँस पड़ा। (अध्याय ११)


पार्वतीके कहनेसे शनैश्चरका गणेशपर दृष्टिपात करना, गणेशके सिरका कटकर गोलोकमें चला जाना, पार्वतीकी मूर्च्छा, श्रीहरिका आगमन और गणेशके धड़पर हस्तीका सिर जोड़कर जीवित करना, फिर पार्वतीको होशमें लाकर बालकको आशीर्वाद देना, पार्वतीद्वारा शनैश्चरको शाप

श्रीनारायणजी कहते हैं— नारद! शनैश्चरका वचन सुनकर दुर्गाने परमेश्वर श्रीहरिका स्मरण किया और 'सारा जगत् ईश्वरकी इच्छाके वशीभूत ही है' यों कहा। फिर दैववशीभूता पार्वतीदेवीने कौतूहलवश शनैश्चरसे कहा—'तुम मेरी तथा मेरे बालककी ओर देखो। भला, इस निषेक (कर्मफलभोग)-को कौन हटा सकता है?' तब पार्वतीका वचन सुनकर शनैश्चर स्वयं मन-ही-मन यों विचार करने लगे—'अहो! क्या मैं इस पार्वतीनन्दनपर दृष्टिपात करूँ अथवा न करूँ? क्योंकि यदि मैं बालकको देख लूँगा तो निश्चय ही उसका अनिष्ट हो जायगा।' यों कहकर धर्मात्मा शनैश्चरने धर्मको साक्षी बनाकर बालकको तो देखनेका विचार किया, परंतु बालककी माताको नहीं। शनैश्चरका मन तो पहलेसे ही खिन्न था। उनके कण्ठ, ओष्ठ और तालु भी सूख गये थे; फिर भी उन्होंने अपने बायें नेत्रके कोनेसे शिशुके मुखकी ओर निहारा। मुने! शनिकी दृष्टि पड़ते ही शिशुका मस्तक धड़से अलग हो गया। तब शनैश्चरने अपनी आँख फेर ली और फिर वे नीचे मुख करके खड़े हो गये। इसके बाद उस बालकका खूनसे लथपथ हुआ सारा शरीर तो पार्वतीकी गोदमें पड़ा रह गया, परंतु मस्तक अपने अभीष्ट गोलोकमें जाकर श्रीकृष्णमें प्रविष्ट हो गया। यह देखकर पार्वतीदेवी बालकको छातीसे चिपटाकर फूट-फूटकर विलाप करने लगीं और उन्मत्तकी

३४०संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

भाँति भूमिपर गिरकर मूर्च्छित हो गयीं। तब वहाँ उपस्थित सभी देवता, देवियाँ, पर्वत, गन्धर्व, शिव तथा कैलासवासी जन यह दृश्य देखकर आश्चर्यचकित हो गये। उस समय उनकी दशा चित्रलिखित पुत्तलिकाके समान जड़ हो गयी।

इस प्रकार उन सबको मूर्च्छित देखकर श्रीहरि गरुड़पर सवार हुए और उत्तरदिशामें स्थित पुष्पभद्राके निकट गये। वहाँ पुष्पभद्रा नदीके तटपर वनमें स्थित एक गजेन्द्रको देखा, जो निद्राके वशीभूत हो बच्चोंसे घिरकर हथिनीके साथ सो रहा था। उसका सिर उत्तर दिशाकी ओर था, मन परमानन्दसे पूर्ण था और वह सुरतके परिश्रमसे थका हुआ था। फिर तो श्रीहरिने शीघ्र ही सुदर्शनचक्रसे उसका सिर काट लिया और रक्तसे भीगे हुए उस मनोहर मस्तकको बड़े हर्षके साथ गरुड़पर रख लिया। गजके कटे हुए अङ्गके गिरनेसे हथिनीकी नींद टूट गयी। तब अमङ्गल शब्द करती हुई उसने अपने शावकोंको भी जगाया। फिर वह शोकसे विह्वल हो शावकोंके साथ बिलख-बिलखकर चीत्कार करने लगी। तत्पश्चात् जो लक्ष्मीके स्वामी हैं, जिनका स्वरूप परम शान्त है; जिनके करकमलोंमें शङ्ख, चक्र, गदा और पद्म शोभा पाते हैं; जो पीताम्बरधारी, परात्पर, जगत्के स्वामी, निषेकका खण्डन करनेमें समर्थ, निषेकको उत्पन्न करनेवाले, सर्वव्यापक, निषेकके भोगके दाता और भोगके निस्तारके कारणस्वरूप हैं तथा जो गरुड़पर आरूढ़ हो मुस्कराते हुए सुदर्शनचक्रको घुमा रहे हैं—उन परमेश्वरका उसने स्तवन किया। विप्रवर! उसकी स्तुतिसे प्रसन्न होकर भगवान्‌ने उसे वर दिया और दूसरे गजका मस्तक काटकर इसके धड़से जोड़ दिया। फिर उन ब्रह्मवेत्ताने ब्रह्मज्ञानसे उसे जीवित कर दिया और उस गजेन्द्रके सर्वाङ्गमें अपने चरणकमलका स्पर्श कराते हुए कहा—'गज! तू अपने कुटुम्बके साथ एक कल्पपर्यन्त जीवित रह।' यों कहकर मनके समान वेगशाली भगवान् कैलासपर आ पहुँचे। वहाँ पार्वतीके वासस्थानपर आकर उन्होंने उस बालकको अपनी छातीसे चिपटा लिया और उस हाथीके मस्तकको सुन्दर बनाकर बालकके धड़से जोड़ दिया। फिर ब्रह्मस्वरूप भगवान्‌ने ब्रह्मज्ञानसे हुंकारोच्चारण किया और खेल-खेलमें ही उसे जीवित कर दिया। पुनः श्रीकृष्णने पार्वतीको सचेत करके उस शिशुको उनकी गोदमें रख दिया और आध्यात्मिक ज्ञानद्वारा पार्वतीको समझाना आरम्भ किया।

**विष्णुने कहा—**शिवे! तुम तो जगत्की बुद्धिस्वरूपा हो। क्या तुम नहीं जानतीं कि ब्रह्मासे लेकर कीटपर्यन्त सारा जगत् अपने कर्मानुसार फल भोगता है। प्राणियोंका जो स्वकर्मार्जित भोग है, वह सौ करोड़ कल्पोंतक प्रत्येक योनिमें शुभ-अशुभ फलरूपसे नित्य प्राप्त होता रहता है। सती! इन्द्र अपने कर्मवश कीड़ेकी योनिमें जन्म ले सकते हैं और कीड़ा पूर्वकर्मफलानुसार इन्द्र भी हो सकता है। पूर्वजन्मार्जित कर्मफलके बिना सिंह मक्खीको भी मारनेमें असमर्थ है और मच्छर अपने प्राक्तन कर्मके बलसे हाथीको भी मार डालनेकी शक्ति रखता है। सुख-दुःख, भय-शोक, आनन्द—ये कर्मके ही फल हैं। इनमें सुख और हर्ष उत्तम कर्मके और अन्य पापकर्मके परिणाम हैं*। कर्मका भोग शुभ-अशुभ-रूपसे इहलोक अथवा परलोकमें प्राप्त होता है, परंतु कर्मोपार्जनके योग्य पुण्यक्षेत्र भारत ही है। स्वयं श्रीकृष्ण कर्मके फलदाता, विधिके विधाता, मृत्युके भी मृत्यु, कालके काल, निषेकके


*सुखं दुःखं भयं शोकमानन्दं कर्मणः फलम्। सुकर्मणः सुखं हर्षमितरे पापकर्मणः॥
(गणपतिखण्ड १२। २७)

प्रणाम करना

गणपतिखण्ड ३४१

निषेककर्ता, संहर्ताके भी संहारक, पालकके भी पालक, परात्पर, परिपूर्णतम गोलोकनाथ हैं। हम ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर जिस पुरुषकी कलाएँ हैं, महाविराट् जिसका अंश है, जिसके रोम-विवरमें जगत् भरे हैं, कोई-कोई उनके कलांश हैं और कोई-कोई कलांशके भी अंश हैं और जो सम्पूर्ण चराचर जगत्-स्वरूप हैं, उन्हीं श्रीकृष्णमें विनायक स्थित हैं।

इस प्रकार श्रीविष्णुका कथन सुनकर पार्वतीका मन संतुष्ट हो गया। तब वे उन गदाधर भगवान्को प्रणाम करके शिशुको दूध पिलाने लगीं। तदनन्तर प्रसन्न हुई पार्वतीने शंकरजीकी प्रेरणासे अञ्जलि बाँधकर भक्तिपूर्वक उन कमलापति भगवान् विष्णुकी स्तुति की। तब विष्णुने शिशुको तथा शिशुकी माताको आशीर्वाद दिया और अपने आभूषण कौस्तुभमणिको बालकके गलेमें डाल दिया। ब्रह्माने अपना मुकुट और धर्मने रत्नका आभूषण दिया। फिर क्रमशः देवियोंने तथा उपस्थित सभी देवताओं, मुनियों, पर्वतों, गन्धर्वों और समस्त महिलाओंने यथोचितरूपसे रत्न प्रदान किये। उस समय महादेवजीका हृदय अत्यन्त हर्षमग्न था। वे विष्णुका स्तवन करने लगे। नारद! वहाँ मरकर जीवित हुए बालकको देखकर शिव-पार्वतीने ब्राह्मणोंको असंख्य रत्न दान किये। मरे हुए बालकके जी उठनेपर हर्षगद्गद हुए हिमालयने वन्दियोंको एक सौ हाथी और एक सहस्र घोड़े प्रदान किये तथा देवगण हर्षित होकर ब्राह्मणोंको और सभी नारियोंने वन्दियोंको दान दिया। लक्ष्मीपति विष्णुने माङ्गलिक कार्य सम्पन्न कराया, ब्राह्मणोंको भोजनसे तृप्त किया और वेदों तथा पुराणोंका पाठ कराया। तत्पश्चात् शनैश्चरको लज्जायुक्त देखकर पार्वतीको क्रोध आ गया और उन्होंने उस सभाके बीच शनैश्चरको यों शाप देते हुए कहा—'तुम अङ्गहीन हो जाओ।' (अध्याय १२)


विष्णु आदि देवताओंद्वारा गणेशकी अग्रपूजा, पार्वतीकृत विशेषोपचारसहित गणेशपूजन, विष्णुकृत गणेशस्तवन और 'संसारमोहन' नामक कवचका वर्णन

**श्रीनारायणजी कहते हैं—**नारद! तदनन्तर विष्णुने शुभ समय आनेपर देवों तथा मुनियोंके साथ सर्वश्रेष्ठ उपहारोंसे उस बालकका पूजन किया और उससे यों कहा—'सुरश्रेष्ठ! मैंने सबसे पहले तुम्हारी पूजा की है; अतः वत्स! तुम सर्वपूज्य तथा योगीन्द्र होओ।' यों कहकर श्रीहरिने उसके गलेमें वनमाला डाल दी और उसे मुक्तिदायक ब्रह्मज्ञान तथा सम्पूर्ण सिद्धियाँ प्रदान करके अपने समान बना दिया। फिर षोडशोपचारकी सुन्दर वस्तुएँ दीं और मुनियों तथा देवोंके साथ उसका इस प्रकार नामकरण किया—विघ्नेश, गणेश, हेरम्ब, गजानन, लम्बोदर, एकदन्त, शूर्पकर्ण और विनायक—उसके ये आठ नाम रखे गये। पुनः सनातन श्रीहरिने उन मुनियोंको बुलवाकर उसे आशीर्वाद दिलाया। तदनन्तर सभी देव-देवियोंने तथा मुनियों आदिने अनेक प्रकारके उपहार गणेशको दिये और फिर क्रमशः उन्होंने भक्तिपूर्वक उसकी पूजा की।

नारद! तदनन्तर जगज्जननी पार्वतीने, जिनका मुखकमल हर्षके कारण विकसित हो रहा था, अपने पुत्रको रत्ननिर्मित सिंहासनपर बैठाया। फिर उन्होंने आनन्दपूर्वक समस्त तीर्थोंके जलसे भरे हुए सौ कलशोंसे मुनियोंद्वारा वेद-मन्त्रोच्चारणपूर्वक उसे स्नान कराया और अग्निमें तपाकर शुद्ध किये हुए दो वस्त्र दिये। फिर पाद्यके लिये गोदावरीका जल, अर्घ्यके निमित्त गङ्गाजल और आचमनके हेतु दूर्वा, अक्षत, पुष्प और चन्दनसे युक्त पुष्करका जल लाकर दिया। रत्नपात्रमें रखे हुए

३४२संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

शर्करायुक्त द्रवका मधुपर्क प्रदान किया। पुनः स्वर्गलोकके वैद्य अश्विनीकुमारद्वारा निर्मित स्नानोपयोगी विष्णुतैल, बहुमूल्य रत्नोंके बने हुए सुन्दर आभूषण, पारिजातके पुष्पोंकी सौ मालाएँ, मालती, चम्पक आदि अनेक प्रकारके पुष्प, तुलसीके अतिरिक्त पूजोपयोगी तरह-तरहके पत्र, चन्दन, अगुरु, कस्तूरी, कुंकुम, ढेर-के-ढेर रत्नप्रदीप और धूप सादर समर्पित किये। तत्पश्चात् उसे प्रिय लगनेवाले नैवेद्यों—तिलके लड्डू, जौ और गेहूँके चूर्ण, पूड़ी, अत्यन्त स्वादिष्ट तथा मनोहर पक्वान्न, शर्करामिश्रित स्वादिष्ट स्वस्तिकके आकारका बना हुआ त्रिकोण पकवानविशेष, गुड़युक्त खील, चिउड़ा और अगहनीके चावलके आटेके बने हुए पदार्थके नाना प्रकारके व्यंजनोंके साथ पहाड़ लगा दिया। नारद! फिर उस पूजनमें सुन्दरी पार्वतीने हर्षमें भरकर एक लाख घड़े, दूध, एक लाख घड़े दही, तीन लाख घड़े मधु और पाँच लाख घड़े घी सादर अर्पित किया। नारद! फिर अनार और बेलके असंख्य फल, भाँति-भाँतिके खजूर, कैथ, जामुन, आम, कटहल, केला और नारियलके असंख्य फल दिये। इनके सिवा और भी जो ऋतुके अनुसार विभिन्न देशोंमें उत्पन्न हुए स्वादिष्ट एवं मधुर पके हुए फल थे, उन्हें भी महामायाने समर्पित किया। पुनः आचमन और पान करनेके लिये अत्यन्त निर्मल कर्पूर आदिसे सुवासित स्वच्छ गङ्गाजल दिया। नारद! इसके बाद उसी प्रकार सुवासित उत्तम रमणीय पानके बीड़े और बायनसे परिपूर्ण सैकड़ों स्वर्णपात्र दिये।

तदनन्तर मेनका, हिमालय, हिमालयके पुत्र और प्रिय अमात्योंने गिरिजाके पुत्रका पूजन किया। वहाँ उपस्थित ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि सभी देवता—

'ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं गणेश्वराय ब्रह्मरूपाय चारवे।
सर्वसिद्धिप्रदेशाय विघ्नेशाय नमो नमः॥'

—इसी मन्त्रसे भक्तिपूर्वक वस्तुएँ समर्पित करके परमानन्दमें मग्न थे। इस मन्त्रमें बत्तीस अक्षर हैं। यह सम्पूर्ण कामनाओंका दाता, धर्म, अर्थ, काम, मोक्षका फल देनेवाला और सर्वसिद्धिप्रद है। इसके पाँच लाख जपसे ही जापकको मन्त्रसिद्धि प्राप्त हो जाती है। भारतवर्षमें जिसे मन्त्रसिद्धि हो जाती है, वह विष्णु-तुल्य हो जाता है। उसके नाम-स्मरणसे सारे विघ्न भाग जाते हैं। निश्चय ही वह महान् वक्ता, महासिद्ध, सम्पूर्ण सिद्धियोंसे सम्पन्न, श्रेष्ठ कवियोंमें भी श्रेष्ठ गुणवान्, विद्वानोंके गुरुका गुरु तथा जगत्‌के लिये साक्षात् वाक्पति हो जाता है। उस उत्सवके अवसरपर आनन्दमग्न हुए देवताओंने इस मन्त्रसे शिशुकी पूजा करके अनेक प्रकारके बाजे बजवाये, उत्सव कराया, ब्राह्मणोंको भोजनसे तृप्त किया; फिर उन ब्राह्मणोंको तथा विशेषतया वन्दियोंको दान दिया।

**श्रीनारायणजी कहते हैं—**नारद! तदनन्तर उस सभाके बीच विष्णु परमभक्तिपूर्वक सम्पूर्ण विघ्नोंके विनाशक उन गणेश्वरकी भलीभाँति पूजा करके उनकी स्तुति करने लगे।

**श्रीविष्णुने कहा—**ईश! मैं सनातन ब्रह्मज्योतिःस्वरूप आपका स्तवन करना चाहता हूँ, परंतु आपके अनुरूप निरूपण करनेमें मैं सर्वथा असमर्थ हूँ; क्योंकि आप इच्छारहित, सम्पूर्ण देवोंमें श्रेष्ठ, सिद्धों और योगियोंके गुरु, सर्वस्वरूप, सर्वेश्वर, ज्ञानराशिस্বরূপ, अव्यक्त, अविनाशी, नित्य, सत्य, आत्मस्वरूप, वायुके समान अत्यन्त निर्लेप, क्षतरहित, सबके साक्षी, संसार-सागरसे पार होनेके लिये परम दुर्लभ मायारूपी नौकाके कर्णधारस्वरूप, भक्तोंपर अनुग्रह करनेवाले, श्रेष्ठ, वरणीय, वरदाता, वरदानियोंके भी ईश्वर, सिद्ध, सिद्धस्वरूप, सिद्धिदाता, सिद्धिके साधन, ध्यानसे अतिरिक्त ध्येय, ध्यानद्वारा असाध्य, धार्मिक, धर्मस्वरूप, धर्मके ज्ञाता, धर्म और अधर्मका फल प्रदान करनेवाले, संसार-वृक्षके

गणपतिखण्ड ३४३

बीज, अंकुर और उसके आश्रय, स्त्री-पुरुष और नपुंसकके स्वरूपमें विराजमान तथा इनकी इन्द्रियोंसे परे, सबके आदि, अग्रपूज्य, सर्वपूज्य, गुणके सागर, स्वेच्छासे सगुण ब्रह्म तथा स्वेच्छासे ही निर्गुण ब्रह्मका रूप धारण करनेवाले, स्वयं प्रकृतिरूप और प्रकृतिसे परे प्राकृतरूप हैं। शेष अपने सहस्रों मुखोंसे भी आपकी स्तुति करनेमें असमर्थ हैं। आपके स्तवनमें न पञ्चमुख महेश्वर समर्थ हैं न चतुर्मुख ब्रह्मा ही; न सरस्वतीकी शक्ति है और न मैं ही कर सकता हूँ। न चारों वेदोंकी ही शक्ति है, फिर उन वेदवादियोंकी क्या गणना ?

इस प्रकार देवसभामें देवताओंके साथ सुरेश्वर गणेशकी स्तुति करके सुराधीश रमापति मौन हो गये। मुने! जो मनुष्य एकाग्रचित्त हो भक्तिभावसे प्रातः, मध्याह्न और सायंकाल इस विष्णुकृत गणेशस्तोत्रका सतत पाठ करता है, विघ्नेश्वर उसके समस्त विघ्नोंका विनाश कर देते हैं, सदा उसके सब कल्याणोंकी वृद्धि होती है और वह स्वयं कल्याणजनक हो जाता है। जो यात्राकालमें भक्तिपूर्वक इसका पाठ करके यात्रा करता है, निस्संदेह उसकी सभी अभीप्सित कामनाएँ सिद्ध हो जाती हैं। उसके द्वारा देखा गया दुःस्वप्न सुस्वप्नमें परिणत हो जाता है। उसे कभी दारुण ग्रहपीड़ा नहीं भोगनी पड़ती। उसके शत्रुओंका विनाश और बन्धुओंका विशेष उत्कर्ष होता है। निरन्तर विघ्नोंका क्षय और सदा सम्पत्तिकी वृद्धि होती रहती है। उसके घरमें पुत्र-पौत्रको बढ़ानेवाली लक्ष्मी स्थिररूपसे वास करती हैं। वह इस लोकमें सम्पूर्ण ऐश्वर्योंका भागी होकर अन्तमें विष्णु-पदको प्राप्त हो जाता है। तीर्थों, यज्ञों और सम्पूर्ण महादानोंसे जो फल मिलता है, वह उसे श्रीगणेशकी कृपासे प्राप्त हो जाता है—यह ध्रुव सत्य है।

नारदजीने कहा—प्रभो! गणेशके स्तोत्र तथा उनके मनोहर पूजनको तो मैंने सुन लिया, अब मुझे जन्म-मृत्युके चक्रसे छुड़ानेवाले कवचके सुननेकी इच्छा है।

श्रीनारायणने कहा—नारद! उस देवसभाके मध्य जब गणेशकी पूजा समाप्त हुई, तब शनैश्चरने सबके तारक जगद्गुरु विष्णुसे कहा।

शनैश्चर बोले—वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ भगवन्! सम्पूर्ण दुःखोंके विनाश और दुःखकी पूर्णतया शान्तिके लिये विघ्नहन्ता गणेशके कवचका वर्णन कीजिये। प्रभो! हमारा मायाशक्तिके साथ विवाद हो गया है; अतः उस विघ्नके प्रशमनके लिये मैं उस कवचको धारण करूँगा।

तदनन्तर भगवान् विष्णुने कवचकी गोपनीयता और महिमा बतलाते हुए कहा—सूर्यनन्दन! दस लाख जप करनेसे कवच सिद्ध हो जाता है। जो मनुष्य कवच सिद्ध कर लेता है, वह मृत्युको जीतनेमें समर्थ हो जाता है। सिद्ध-कवचवाला मनुष्य उसके ग्रहणमात्रसे भूतलपर वाग्मी, चिरजीवी, सर्वत्र विजयी और पूज्य हो जाता है। इस मालामन्त्रको तथा इस पुण्यकवचको धारण करनेवाले मनुष्योंके सारे पाप निश्चय ही नष्ट हो जाते हैं। भूत, प्रेत, पिशाच, कूष्माण्ड, ब्रह्मराक्षस, डाकिनी, योगिनी, बेताल आदि, बालग्रह, ग्रह तथा क्षेत्रपाल आदि कवचके शब्दमात्रके श्रवणसे भयभीत होकर भाग खड़े होते हैं। जैसे गरुड़के निकट सर्प नहीं जाते, उसी तरह कवचधारी पुरुषोंके संनिकट आधि (मानसिक रोग), व्याधि (शारीरिक रोग) और भयदायक शोक नहीं फटकते। इसे अपने सरल स्वभाववाले गुरुभक्त शिष्यको ही बतलाना चाहिये।

शनैश्चर! इस 'संसारमोहन' नामक कवचके प्रजापति ऋषि हैं, बृहती छन्द है और स्वयं लम्बोदर गणेश देवता हैं। धर्म, अर्थ, काम और मोक्षमें इसका विनियोग कहा गया है। मुने! यह सम्पूर्ण कवचोंका सारभूत है। 'ॐ गं हुं श्रीगणेशाय स्वाहा' यह मेरे मस्तककी रक्षा करे। बत्तीस

३४४संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

अक्षरोंवाला मन्त्र सदा मेरे ललाटको बचाये। ‘ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं गम्’ यह निरन्तर मेरे नेत्रोंकी रक्षा करे। विघ्नेश भूतलपर सदा मेरे तालुकी रक्षा करें। ‘ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं’ यह निरन्तर मेरी नासिकाकी रक्षा करे तथा ‘ॐ गौं गं शूर्पकर्णाय स्वाहा’ यह मेरे ओठको सुरक्षित रखे। षोडशाक्षर-मन्त्र मेरे दाँत, तालु और जीभको बचावे। ‘ॐ लं श्रीं लम्बोदराय स्वाहा’ सदा गण्डस्थलकी रक्षा करे। ‘ॐ क्लीं ह्रीं विघ्ननाशाय स्वाहा’ सदा कानोंकी रक्षा करे। ‘ॐ श्रीं गं गजाननाय स्वाहा’ सदा कंधोंकी रक्षा करे। ‘ॐ ह्रीं विनायकाय स्वाहा’ सदा पृष्ठभागकी रक्षा करे। ‘ॐ क्लीं ह्रीं’ कंकालकी और ‘गं’ वक्षःस्थलकी रक्षा करे। विघ्ननिहन्ता हाथ, पैर तथा सर्वाङ्गको सुरक्षित रखे। पूर्वदिशामें लम्बोदर और अग्निकोणमें विघ्ननायक रक्षा करें। दक्षिणमें विघ्नेश और नैर्ऋत्यकोणमें गजानन रक्षा करें। पश्चिममें पार्वतीपुत्र, वायव्यकोणमें शंकरात्मज, उत्तरमें परिपूर्णतम श्रीकृष्णका अंश, ईशानकोणमें एकदन्त और ऊर्ध्वभागमें हेरम्ब रक्षा करें। अधोभागमें सर्वपूज्य गणाधिप सब ओरसे मेरी रक्षा करें।

शयन और जागरणकालमें योगियोंके गुरु मेरा पालन करें। वत्स! इस प्रकार जो सम्पूर्ण मन्त्रसमूहोंका विग्रहस्वरूप है, उस परम अद्भुत संसारमोहन नामक कवचका तुमसे वर्णन कर दिया। सूर्यनन्दन! इसे प्राचीनकालमें गोलोकके वृन्दावनमें रासमण्डलके अवसरपर श्रीकृष्णने मुझ विनीतको दिया था। वही मैंने तुम्हें प्रदान किया है। तुम इसे जिस-किसीको मत दे डालना। यह परम श्रेष्ठ, सर्वपूज्य और सम्पूर्ण संकटोंसे उबारनेवाला है। जो मनुष्य विधिपूर्वक गुरुकी अभ्यर्थना करके इस कवचको गलेमें अथवा दक्षिण भुजापर धारण करता है, वह निस्संदेह विष्णु ही है। ग्रहेन्द्र! हजारों अश्वमेध और सैकड़ों वाजपेय-यज्ञ इस कवचकी सोलहवीं कलाकी समानता नहीं कर सकते। जो मनुष्य इस कवचको जाने बिना शंकर-सुवन गणेशकी भक्ति करता है, उसके लिये सौ लाख जपनेपर भी मन्त्र सिद्धिदायक नहीं होता।* इस प्रकार सूर्यपुत्र शनैश्चरको यह कवच प्रदान करके सुरेश्वर विष्णु चुप हो गये। तब समीपमें स्थित परमानन्दमें निमग्न हुए देवताओंने कहा। (अध्याय १३)


* संसारमोहनस्यास्य कवचस्य प्रजापतिः। ऋषिश्छन्दश्च बृहती देवो लम्बोदरः स्वयम्॥
धर्मार्थकाममोक्षेषु विनियोगः प्रकीर्तितः॥
सर्वेषां कवचानां च सारभूतमिदं मुने। ॐ गं हुं श्रीगणेशाय स्वाहा मे पातु मस्तकम्।
द्वात्रिंशदक्षरो मन्त्रो ललाटो मे सदाऽवतु॥
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं गमिति च सततं पातु लोचनम्। तालुकं पातु विघ्नेशः सततं धरणीतले॥
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीमिति च सततं पातु नासिकाम्। ॐ गौं गं शूर्पकर्णाय स्वाहा पात्वधरं मम॥
दन्तानि तालुकां जिह्वां पातु मे षोडशाक्षरः॥
ॐ लं श्रीं लम्बोदरायेति स्वाहा गण्डं सदाऽवतु। ॐ क्लीं ह्रीं विघ्ननाशाय स्वाहा कर्णं सदाऽवतु॥
ॐ श्रीं गं गजाननायेति स्वाहा स्कन्धं सदाऽवतु। ॐ ह्रीं विनायकायेति स्वाहा पृष्ठं सदाऽवतु॥
ॐ क्लीं ह्रीमिति कङ्कालं पातु वक्षःस्थलं च गम्। करौ पादौ सदा पातु सर्वाङ्गं विघ्ननिघ्नकृत्॥
प्राच्यां लम्बोदरः पातु आग्नेय्यां विघ्ननायकः। दक्षिणे पातु विघ्नेशो नैर्ऋत्यां तु गजाननः॥
पश्चिमे पार्वतीपुत्रो वायव्यां शङ्करात्मजः। कृष्णांशश्चोत्तरे च परिपूर्णतमस्य च॥
ऐशान्यामेकदन्तश्च हेरम्बः पातु चोर्ध्वतः। अधो गणाधिपः पातु सर्वपूज्यश्च सर्वतः॥
स्वप्ने जागरणे चैव पातु मां योगिनां गुरुः॥
इति ते कथितं वत्स सर्वमन्त्रौघविग्रहम्। संसारमोहनं नाम कवचं परमाद्भुतम्॥
श्रीकृष्णेन पुरा दत्तं गोलोके रासमण्डले। वृन्दावने विनीताय मह्यं दिनकरात्मज॥

गणपतिखण्ड ३४५

पार्वतीको देवताओंद्वारा कार्तिकेयका समाचार प्राप्त होना, शिवजीका कृत्तिकाओंके पास दूतोंको भेजना, वहाँ कार्तिकेय और नन्दीका संवाद

तदनन्तर, पहले शंकरका वीर्य पृथ्वीपर गिरनेसे कार्तिकेयके उत्पन्न होनेकी बात आयी थी, उसीके सम्बन्धमें बात छिड़नेपर—

श्रीधर्मने कहा— भगवन्! प्रकोपके कारण रतिसे उठते हुए शंकरजीका वह अमोघ वीर्य भूतलपर गिरा था, यह मुझे ज्ञात है।

भूमिने कहा— ब्रह्मन्! उस वीर्यका वहन करना अत्यन्त कठिन था, इसलिये जब मैं उसका भार सहन न कर सकी, तब मैंने उसे अग्निमें डाल दिया; अतः मुझ अबलाको क्षमा कीजिये।

अग्निने कहा— जगन्नाथ! मैंने भी उस वीर्यका भार उठानेमें असमर्थ होकर उसे सरकंडोंके वनमें फेंक दिया। भला, दुर्बलका पुरुषार्थ ही क्या और उसका यश ही कैसा?

वायुने कहा— विष्णो! स्वर्णरेखा नदीके तटपर सरकंडोंमें गिरा हुआ वह वीर्य तुरंत ही अत्यन्त सुन्दर बालक हो गया।

श्रीसूर्यने कहा— भगवन्! कालचक्रसे प्रेरित हुआ मैं उस रोते हुए बालकको देखकर अस्ताचलकी ओर चला गया; क्योंकि मैं रातमें ठहरनेके लिये असमर्थ हूँ।

चन्द्रमाने कहा— विष्णो! उसी समय कृत्तिकाओंका समुदाय बदरिकाश्रमसे आ रहा था। उन्होंने उस रुदन करते हुए बालकको देखा और उसे उठाकर वे अपने भवनको चली गयीं।

जलने कहा— प्रभो! कृत्तिकाओंने उस रोते हुए शिशुको अपने घर लाकर और उसके भूखे होनेपर उसे अपने स्तनोंका दूध पिलाकर बढ़ाया। वह शिव-पुत्र सूर्यसे भी अधिक प्रभावशाली था।

दोनों संध्याओंने कहा— भगवन्! इस समय वह बालक छहों कृत्तिकाओंका पोष्य पुत्र है। उन्होंने स्वयं ही प्रेमपूर्वक उसका 'कार्तिकेय' ऐसा नाम रखा है।

रात्रिने कहा— प्रभो! वे कृत्तिकाएँ उस बालकको आँखोंसे ओझल नहीं करती हैं। उनके लिये वह प्राणोंसे भी बढ़कर प्रेमपात्र है; क्योंकि जो पालन करनेवाला होता है, उसीका वह पुत्र कहलाता है।

दिनने कहा— देव! जो-जो वस्तुएँ त्रिलोकीमें दुर्लभ हैं और अपने स्वादके लिये प्रशंसित हैं, उन्हींको वे उस बालकको खिलाती हैं।

जब उस सभामें उन सब लोगोंने प्रसन्नमनसे श्रीहरिसे यों कहा, तब उनके उस कथनको सुनकर मधुसूदन संतुष्ट हो गये। पुत्रका पूरा समाचार पाकर पार्वतीका मन हर्षसे खिल उठा। उन्होंने ब्राह्मणोंको करोड़ों रत्न, बहुत-सा धन और विभिन्न प्रकारके सभी वस्त्र दिये। तत्पश्चात् लक्ष्मी, सरस्वती, सावित्री, मेना आदि सभी महिलाओंने तथा विष्णु आदि सभी देवताओंने ब्राह्मणोंको धन दिया।

श्रीनारायण कहते हैं— मुने! पुत्रका समाचार मिल जानेपर जब विष्णु, देवगण, मुनिसमुदाय और पर्वतोंने पार्वतीसहित शंकरको प्रेरित किया, तब उन्होंने लाखों क्षेत्रपाल, भूत, बेताल, यक्ष, कूष्माण्ड, ब्रह्मराक्षस, डाकिनी, योगिनी और भैरवोंके साथ महान् बल-पराक्रमसम्पन्न वीरभद्र,


मया दत्तं च तुभ्यं च यस्मै कस्मै न दास्यसि। परं वरं सर्वपूज्यं सर्वसंकटतारणम्॥
गुरुमभ्यर्च्य विधिवत् कवचं धारयेत्तु यः। कण्ठे वा दक्षिणे बाहौ सोऽपि विष्णुर्न संशयः॥
अश्वमेधसहस्राणि वाजपेयशतानि च। ग्रहेन्द्र कवचस्यास्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥
इदं कवचमज्ञात्वा यो भजेच्छङ्करात्मजम्। शतलक्षप्रजप्तोऽपि न मन्त्रः सिद्धिदायकः॥

( १३ । ७८-९७ )

३४६ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

विशालाक्ष, शंकुकर्ण, कबन्ध, नन्दीश्वर, महाकाल, वज्रदन्त, भगन्दर, गोधामुख, दधिमुख आदि दूतोंको, जो धधकती हुई आगकी लपटके समान उद्दीप्त हो रहे थे, भेजा। उन सभी शिव-दूतोंने, जो नाना प्रकारके शस्त्रास्त्रोंसे सुसज्जित थे, शीघ्र ही जाकर कृत्तिकाओंके भवनको चारों ओरसे घेर लिया। उन्हें देखकर सभी कृत्तिकाओंका मन भयसे व्याकुल हो गया। तब वे ब्रह्मतेजसे उद्दीप्त होते हुए कार्तिकेयके पास जाकर कहने लगीं।

कृत्तिकाओंने कहा— बेटा कार्तिकेय! असंख्यों कराल सेनाओंने भवनको चारों ओरसे घेर लिया है और हमें पता भी नहीं है कि ये किसकी हैं।

तब कार्तिकेय बोले— माताओ! आपलोगोंका भय दूर हो जाना चाहिये। मेरे रहते आपको भय कैसा? यह कर्मभोग दुर्निवार्य है, इसे कौन हटा सकता है। इसी बीच सेनापति नन्दिकेश्वर भी वहाँ कार्तिकेयके समक्ष उपस्थित हुए और कृत्तिकाओंसे बोले।

नन्दिकेश्वरने कहा— भ्राता! संहारकर्ता सुरश्रेष्ठ शंकर और माता पार्वतीद्वारा भेजे गये शुभ समाचारको मुझसे श्रवण करो। कैलासपर्वतपर गणेशके माङ्गलिक जन्मोत्सवके अवसरपर सभामें ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि सभी देवता उपस्थित हैं। वहाँ गिरिराजकिशोरीने जगत्का पालन करनेवाले विष्णुको सम्बोधित करके उनसे तुम्हारे अन्वेषणके लिये कहा। तब विष्णुने तुम्हारी प्राप्तिके निमित्त क्रमशः उन सभी देवोंसे पूछा। उनमेंसे प्रत्येकने यथोचित उत्तर भी दिया। उन्हींमें धर्म-अधर्मके साक्षी धर्म आदि सभी देवताओंने परमेश्वरको तुम्हारे यहाँ कृत्तिकाओंके भवनमें रहनेकी सूचना दी। प्राचीनकालमें शिव- पार्वतीकी जो एकान्त क्रीड़ा हुई थी, उसमें देवताओंद्वारा देखे जानेपर शम्भुका शुक्र भूतलपर गिर पड़ा था। भूमिने उस शुक्रको अग्निमें और अग्निने उसे सरकंडोंके वनमें फेंक दिया। वहाँसे इन कृत्तिकाओंने तुम्हें पाया है। अब तुम अपने घर चलो। वहाँ तुम्हें सम्पूर्ण शस्त्रास्त्रोंकी प्राप्ति होगी, विष्णु देवताओंको साथ लेकर तुम्हारा अभिषेक करेंगे और तब तुम तारकासुरका वध करोगे। तुम विश्वसंहर्ता शंकरके पुत्र हो, अतः ये कृत्तिकाएँ तुम्हें उसी तरह नहीं छिपा सकतीं, जैसे शुष्क वृक्ष अपने कोटरमें अग्निको गुप्त नहीं रख सकता। तुम तो विश्वमें दीप्तिमान् हो। इन कृत्तिकाओंके घरमें तुम्हारी उसी प्रकार शोभा नहीं हो रही है, जैसे महाकूपमें पड़े हुए चन्द्रमा शोभित नहीं होते। जैसे सूर्य मनुष्यके हाथोंकी ओटमें नहीं छिप सकते, उसी तरह तुम भी इनके अङ्गतेजसे आच्छादित न होकर जगत्‌को प्रकाशित कर रहे हो। शम्भुनन्दन! तुम तो जगद्व्यापी विष्णु हो, अतः इन कृत्तिकाओंके व्याप्य नहीं हो, जैसे आकाश किसीका व्याप्य नहीं है, बल्कि वह स्वयं ही सबका व्यापक है। तुम विषयोंसे निर्लिप्त योगीन्द्र हो तथा विश्वके आधार और परमेश्वर हो। ऐसी दशामें कृत्तिकाओंके भवनमें तुम सर्वेश्वरका निवास होना उसी प्रकार सम्भव नहीं है, जैसे क्षुद्र गौरैयाके उदरमें गरुड़का रहना असम्भव है। तुम भक्तोंके लिये मूर्तिमान् अनुग्रह तथा गुणों और तेजोंकी राशि हो। देवगण तुम्हें उसी तरह नहीं जानते जैसे योगहीन पुरुष ज्ञानसे अनभिज्ञ होता है। जैसे मोहितचित्तवाले भक्तिहीन मनुष्योंको हरिकी उत्कृष्ट भक्तिका ज्ञान नहीं होता, उसी तरह ये कृत्तिकाएँ तुम्हें कैसे जान सकती हैं; क्योंकि तुम अनिर्वचनीय हो। भ्राता! जो लोग जिसके गुणको नहीं जानते, वे उसका अनादर ही करते हैं; जैसे मेढक एक साथ रहनेवाले कमलोंका आदर नहीं करते।

कार्तिकेयने कहा— भ्राता! जो भूत, भविष्यत्, वर्तमान—तीनों कालोंका ज्ञान है, वह सब मुझे ज्ञात है। तुम भी तो ज्ञानी हो; क्योंकि मृत्युञ्जयके आश्रित हो। ऐसी दशामें तुम्हारी क्या प्रशंसा की

५२- पुष्करमें तप करते हुए इन्द्रको श्रीविष्णुका प्रकट होकर मनोवाञ्छित वर, कवच और मन्त्र प्रदान करना

गणपतिखण्ड ३४७


जाय। भाई! कर्मानुसार जिनका जिन-जिन योनियोंमें जन्म होता है, वे उन्हीं योनियोंमें निरन्तर रहते हुए निर्वृति लाभ करते हैं। वे चाहे संत हों अथवा मूर्ख हों, जिन्हें कर्मभोगके परिणामस्वरूप जिस योनिकी प्राप्ति हुई है, वे विष्णुमायासे मोहित होकर उसी योनिको बहुत बढ़कर समझते हैं। जो सनातनी विष्णुमाया सबकी आदि, सर्वस्व प्रदान करनेवाली और विश्वका मङ्गल करनेवाली हैं, उन्हीं जगज्जननीने इस समय भारतवर्षमें शैलराजकी पत्नीके गर्भसे जन्म धारण किया है और दारुण तपस्या करके शंकरको पतिरूपमें प्राप्त किया है। ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त सारी सृष्टि कृत्रिम है, अतएव मिथ्या ही है। सभी श्रीकृष्णसे उत्पन्न हुए हैं और समय आनेपर केवल श्रीकृष्णमें ही विलीन हो जाते हैं। प्रत्येक कल्पमें सृष्टिके विधानमें मैं नित्य होते हुए भी मायासे आबद्ध होकर जन्म-धारण करता हूँ, उस समय प्रत्येक जन्ममें जगज्जननी पार्वती मेरी माता होती हैं। जगत्में जितनी नारियाँ हैं, वे सभी प्रकृतिसे उत्पन्न हुई हैं। उनमेंसे कुछ प्रकृतिकी अंशभूता हैं तो कुछ कलात्मिका तथा कुछ कलांशके अंशसे प्रकट हुई हैं। ये ज्ञानसम्पन्ना योगिनी कृत्तिकाएँ प्रकृतिकी कलाएँ हैं। इन्होंने निरन्तर अपने स्तनके दूध तथा उपहारसे मेरा पालन-पोषण किया है। अतः मैं उनका पोष्य पुत्र हूँ और पोषण करनेके कारण ये मेरी माताएँ हैं। साथ ही मैं उन प्रकृतिदेवी (पार्वती)-का भी पुत्र हूँ; क्योंकि तुम्हारे स्वामी शंकरजीके वीर्यसे उत्पन्न हुआ हूँ। नन्दिकेश्वर! मैं गिरिराजनन्दिनीके गर्भसे उत्पन्न नहीं हुआ हूँ, अतः जैसे वे मेरी धर्ममाता हैं, वैसे ही ये कृत्तिकाएँ भी सर्वसम्मतिसे मेरी धर्म-माताएँ हैं; क्योंकि स्तन पिलानेवाली (धाय), गर्भमें धारण करनेवाली (जननी), भोजन देनेवाली (पाचिका), गुरुपत्नी, अभीष्ट देवताकी पत्नी, पिताकी पत्नी (सौतेली माता), कन्या, बहिन, पुत्रवधू, पत्नीकी माता (सास), माताकी माता (नानी), पिताकी माता (दादी), सहोदर भाईकी पत्नी, माताकी बहिन (मौसी), पिताकी बहिन (बुआ) तथा मामी—ये सोलह मनुष्योंकी वेदविहित माताएँ कहलाती हैं।* ये कृत्तिकाएँ सम्पूर्ण सिद्धियोंकी ज्ञाता, परमैश्वर्यसम्पन्न और तीनों लोकोंमें पूजित हैं। ये क्षुद्र नहीं हैं, बल्कि ब्रह्माकी कन्याएँ हैं। तुम भी सत्त्वसम्पन्न तथा शम्भुके पुत्रके समान हो और विष्णुने तुम्हें भेजा है; अतः चलो, मैं तुम्हारे साथ चलता हूँ। वहाँ देवसमुदायका दर्शन करूँगा। (अध्याय १४-१५)


कार्तिकेयका नन्दिकेश्वरके साथ कैलासपर आगमन, स्वागत, सभामें जाकर विष्णु आदि देवोंको नमस्कार करना और शुभाशीर्वाद पाना

श्रीनारायणजी कहते हैं— नारद! शंकरसुवन कार्तिकेय नन्दिकेश्वरसे यों कहकर शीघ्र ही कृत्तिकाओंको समझाते हुए नीतियुक्त वचन बोले।

कार्तिकेयने कहा— माताओ! मैं देवसमुदाय, बन्धुवर्ग तथा माताको देखना चाहता हूँ; अतः शंकरजीके निवासस्थानपर जाऊँगा, इसके लिये आपलोग मुझे आज्ञा प्रदान करें। सारा जगत्, शुभदायक जन्म-कर्म, संयोग-वियोग सभी दैवके


* स्तनदात्री गर्भधात्री भक्ष्यदात्री गुरुप्रिया। अभीष्टदेवपत्नी च पितुः पत्नी च कन्यका॥
सगर्भकन्याभगिनी पुत्रपत्नी प्रियाप्रसूः। मातृर्माता पितुर्माता सोदरस्य प्रिया तथा॥
मातुः पितुश्च भगिनी मातुलानी तथैव च। जनानां वेदविहिता मातरः षोडश स्मृताः॥
(१५। ३८—४०)

३४८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण अधीन है। दैवसे बढ़कर दूसरा कोई बली नहीं है। वह दैव श्रीकृष्णके वशमें रहनेवाला है; क्योंकि वे दैवसे परे हैं। इसीलिये संतलोग उन ऐश्वर्यशाली परमात्माका निरन्तर भजन करते हैं। अविनाशी श्रीकृष्ण अपनी लीलासे दैवको बढ़ाने और घटानेमें समर्थ हैं। उनका भक्त दैवके वशीभूत नहीं होता—ऐसा निर्णीत है। इसलिये आपलोग इस दुःखदायक मोहका परित्याग कीजिये और जो सुखदाता, मोक्षप्रद, सारसर्वस्व, जन्म- मृत्युके भयके विनाशकर्ता, परमानन्दके जनक और मोह-जालके उच्छेदक हैं तथा ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि सभी देवगण जिनका निरन्तर भजन करते हैं, उन गोविन्दकी भक्ति कीजिये। इस भवसागरमें मैं आपलोगोंका कौन हूँ और आपलोग मेरी कौन हैं? संसार-प्रवाहका वह सारा कर्म फेनकी भाँति पुञ्जीभूत हो गया है। (वस्तुतः कोई किसीका नहीं है।) संयोग अथवा वियोग—यह सब ईश्वरकी इच्छासे ही होता है। यहाँतक कि सारा ब्रह्माण्ड ईश्वरके अधीन है, वह भी स्वतन्त्र नहीं है—ऐसा विद्वान् लोग कहते हैं। सारी त्रिलोकी जलके बुलबुलेके समान क्षणभङ्गुर है, फिर भी मायासे मोहित चित्तवाले लोग इस अनित्य जगत्में मायाका विस्तार करते हैं; परंतु जो श्रीकृष्णपरायण संत हैं, वे जगत्में रहते हुए भी वायुकी भाँति लिप्त नहीं होते। इसलिये माताओ! आपलोग मोहका परित्याग करके मुझे जानेकी आज्ञा दीजिये। यों कहकर ऐश्वर्यशाली कार्तिकेयने उन कृत्तिकाओंको नमस्कार किया और फिर मन- ही-मन श्रीहरिका स्मरण करते हुए शंकरजीके पार्षदोंके साथ यात्राके लिये प्रस्थान किया। इसी बीच उन्होंने वहाँ एक उत्तम रथको देखा। वह बहुमूल्य रत्नोंका बना हुआ था, जिसे विश्वकर्माने भलीभाँति निर्माण किया था, उसमें स्थान- स्थानपर माणिक्य और हीरे जड़े गये थे, जिससे उसकी अपूर्व शोभा हो रही थी। पारिजात- पुष्पोंकी मालावलीसे वह सुशोभित था। मणियोंके दर्पण तथा श्वेत चँवरोंसे वह अत्यन्त उद्भासित हो रहा था और चित्रकारीयुक्त रमणीय क्रीडा- भवनोंसे वह भलीभाँति सुसज्जित था। वह मनोहर तो था ही, उसका विस्तार भी बड़ा था। उसमें सौ पहिये लगे थे। उसका वेग मनके समान था और श्रेष्ठ पार्षद उसे घेरे हुए थे। उस रथको पार्वतीने भेजा था। उस रथपर कार्तिकेयको चढ़ते देखकर कृत्तिकाओंका हृदय दुःखसे फटा जा रहा था। उनके केश खुल गये थे और वे शोकसे व्याकुल थीं। सहसा चेतना प्राप्त होनेपर अपने सामने स्कन्दको देख वे अत्यन्त शोकके कारण ठगी-सी रह गयीं; फिर वहीं भयवश उन्मत्तकी भाँति कहने लगीं। कृत्तिकाओोंने कहा—हाय! अब हमलोग क्या करें, कहाँ चली जायें ? बेटा ! हमारे आश्रय तो तुम्हीं हो। इस समय तुम हमलोगोंको छोड़कर कहाँ जा रहे हो ? यह तुम्हारे लिये धर्मसङ्गत बात नहीं है। हमलोगोंने बड़े स्नेहसे तुम्हें पाला-पोसा है, अतः तुम धर्मानुसार हमारे पुत्र हो। भला, उपयुक्त पुत्र मातृवर्गोंका परित्याग कर दे—यह भी कोई धर्म है? यों कहकर सभी कृत्तिकाओोंने कार्तिकेयको छातीसे चिपका लिया और पुत्र- वियोगजन्य दारुण दुःखके कारण वे पुनः मूर्च्छित हो गयीं। मुने ! तत्पश्चात् कुमार कार्तिकेयने आध्यात्मिक वचनोंद्वारा उन्हें समझाया और फिर उनके तथा पार्षदोंके साथ वे उस रथपर सवार हुए। मुने ! यात्राकालमें उन्होंने अपने सामने साँड़, गजराज, घोड़ा, जलती हुई आग, भरा हुआ सुवर्ण-कलश, अनेक प्रकारके पके हुए फल, पति-पुत्रसे युक्त स्त्री, प्रदीप, उत्तम मणि, मोती, पुष्पमाला, मछली और चन्दन—इन माङ्गलिक वस्तुओंको, वामभागमें शृगाल, नकुल, कुम्भ और शुभदायक शवको तथा दक्षिणभागमें राजहंस,

गणपतिखण्ड ३४९


मयूर, खञ्जन, शुक, कोकिल, कबूतर, शङ्खचिल्ल (सफेद चील), माङ्गल्यिक चक्रवाक, कृष्णसार-मृग, सुरभी और चमरी गौ, श्वेत चँवर, सवत्सा धेनु और शुभ पताकाको देखा। उस समय नाना प्रकारके बाजोंकी मङ्गलध्वनि सुनायी पड़ने लगी, हरिकीर्तन तथा घण्टा और शङ्खका शब्द होने लगा। इस प्रकार मङ्गल-शकुनोंको देखते तथा सुनते हुए कार्तिकेय आनन्दपूर्वक उस मनके समान वेगशाली रथके द्वारा क्षणमात्रमें ही पिताके मन्दिरपर जा पहुँचे। वहाँ कैलासपर पहुँचकर वे अविनाशी वट-वृक्षके नीचे कृत्तिकाओं तथा श्रेष्ठ पार्षदोंके साथ कुछ देरके लिये ठहर गये। उस नगरके राजमार्ग बड़े मनोहर थे। उनपर चारों ओर पद्मराग और इन्द्रनीलमणि जड़ी हुई थी। समूह-के-समूह केलेके खंभे गड़े थे, जिनपर रेशमी सूतमें गुँथे हुए चन्दनके पल्लवोंकी बन्दनवार लटक रही थी। वह पूर्ण कुम्भोंसे सुशोभित था। उसपर चन्दनमिश्रित जलका छिड़काव किया गया था। असंख्यों रत्नप्रदीपों तथा मणियोंसे उसकी विशेष शोभा हो रही थी। वह सदा उत्सवोंसे व्याप्त, हाथोंमें दूब और पुष्प लिये हुए वन्दियों और ब्राह्मणोंसे युक्त तथा पति-पुत्रवती साध्वी नारियोंसे समन्वित था। समस्त मङ्गल-कार्य करके पार्वती देवी लक्ष्मी, सरस्वती, दुर्गा, सावित्री, तुलसी, रति, अरुन्धती, अहल्या, दिति, सुन्दरी तारा, अदिति, शतरूपा, शची, संध्या, रोहिणी, अनसूया, स्वाहा, संज्ञा, वरुण-पत्नी, आकूति, प्रसूति, देवहूति, मेनका, एक रंग तथा एक प्रकृतिवाली मैनाक-पत्नी, वसुन्धरा और मनसादेवीको आगे करके वहाँ आयीं। तदनन्तर देवगण, मुनिसमुदाय, पर्वत, गन्धर्व तथा किन्नर सब-के-सब आनन्दमग्न हो कुमारके स्वागतमें गये। महेश्वर भी नाना प्रकारके बाजों, रुद्रगणों, पार्षदों, भैरवों तथा क्षेत्रपालोंके साथ वहाँ पधारे। तत्पश्चात् शक्तिधारी कार्तिकेय पार्वतीको निकट देखकर हर्षगद्गद हो गये। उस समय वे तुरंत ही रथसे उतर पड़े और सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम करने लगे। तब पार्वतीने कार्तिकेयको देखकर लक्ष्मी आदि देवियों, मुनि-पत्नियों और शिव आदि सभीसे यत्नपूर्वक परम भक्तिके साथ सम्भाषण किया और उन्हें अपनी गोदमें उठाकर वे चूमने लगीं। फिर शंकर, देवगण, पर्वत, शैलपत्नियों, पार्वती आदि देवियों तथा सभी मुनियोंने कार्तिकेयको शुभाशीर्वाद दिया। तदनन्तर कुमार गणोंके साथ शिव-भवनमें आये। वहाँ सभाके मध्यमें उन्होंने क्षीरसागरमें शयन करनेवाले भगवान् विष्णुको देखा। वे रत्नाभरणोंसे विभूषित हो रत्नसिंहासनपर विराजमान थे। धर्म, ब्रह्मा, इन्द्र, चन्द्रमा, सूर्य, अग्नि, वायु आदि देवता उन्हें घेरे हुए थे। उनका मुख प्रसन्न था तथा उसपर थोड़ी-थोड़ी मुसकानकी छटा छा रही थी। वे भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये कातर हो रहे थे। उनपर श्वेत चँवर डुलाया जा रहा था और देवेन्द्र तथा मुनीन्द्र उनका स्तवन कर रहे थे। उन जगन्नाथको देखकर कार्तिकेयके सर्वाङ्गमें रोमाञ्च हो आया। उन्होंने भक्तिभावपूर्वक सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम किया। इसके बाद

३५०संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

ब्रह्मा, धर्म, देवताओं और हर्षित मुनिवरोंमें प्रत्येकको प्रणाम किया और उनका शुभाशीर्वाद पाया। फिर बारी-बारीसे सबसे कुशल-समाचार पूछकर वे एक रत्नसिंहासनपर बैठे। उस समय पार्वतीसहित शंकरने ब्राह्मणोंको बहुत-सा धन दान किया।
(अध्याय १६)


कार्तिकेयका अभिषेक तथा देवताओंद्वारा उन्हें उपहार-प्रदान

श्रीनारायणजी कहते हैं— नारद! तदनन्तर जगदीश्वर विष्णुने प्रसन्नमनसे शुभ मुहूर्त निश्चय करके कार्तिकेयको एक रमणीय रत्नसिंहासनपर बैठाया और कौतुकवश नाना प्रकारके झाँझ-मँजीरा तथा यन्त्रमय बाजे बजवाये। फिर अमूल्य रत्नोंके बने हुए सैकड़ों घड़ोंसे, जो वेदमन्त्रोंद्वारा अभिषिक्त तथा सम्पूर्ण तीर्थोंके जलोंसे परिपूर्ण थे, कार्तिकेयको हर्षपूर्वक स्नान कराया। तत्पश्चात् कार्तिकेयको प्रसन्नमनसे बहुमूल्य रत्नोंद्वारा निर्मित किरीट, दो माङ्गलिक बाजूबंद, अमूल्य रत्नोंके बने हुए बहुत-से आभूषण, अग्निमें तपाकर शुद्ध किये हुए दो दिव्य वस्त्र, क्षीरसागरसे उत्पन्न हुई कौस्तुभमणि और वनमाला दी। ब्रह्माने यज्ञसूत्र, वेद, वेदमाता गायत्री, संध्या-मन्त्र, कृष्ण-मन्त्र, श्रीहरिका स्तोत्र और कवच, कमण्डलु, ब्रह्मास्त्र तथा शत्रुविनाशिनी विद्या प्रदान की। धर्मने दिव्य धर्मबुद्धि और समस्त जीवोंपर दया समर्पित की। शिवने परमोत्कृष्ट मृत्युञ्जय-ज्ञान, सम्पूर्ण शास्त्रोंका ज्ञान, निरन्तर सुख प्रदान करनेवाला परम मनोहर तत्त्वज्ञान, योगतत्त्व, सिद्धितत्त्व, परम दुर्लभ ब्रह्मज्ञान, त्रिशूल, पिनाक, फरसा, शक्ति, पाशुपतास्त्र, धनुष और संधान-संहारके ज्ञानसहित संहारास्त्र अर्पित किया। वरुणने श्वेत छत्र और रत्नोंकी माला, महेन्द्रने गजराज, अमृतसागरने अमृतका कलश, सूर्यने मनके समान वेगशाली रथ और मनोहर कवच, यमने यमदण्ड और अग्निने बहुत बड़ी शक्ति प्रदान की। इसी प्रकार अन्यान्य सभी देवताओंने भी हर्षपूर्वक नाना प्रकारके शस्त्र उन्हें भेंट किये। कामदेवने हर्षमग्न होकर उन्हें कामशास्त्र और क्षीरसागरने अमूल्य रत्न तथा रत्नोंके बने हुए विशिष्ट नूपुर दिये। पार्वतीका मन तो उस समय परमानन्दमें निमग्न था, उन्होंने मुस्कराते हुए महाविद्या, सुशीलाविद्या, मेधा, दया, स्मृति, अत्यन्त निर्मल बुद्धि, शान्ति, तुष्टि, पुष्टि, क्षमा, धृति, श्रीहरिमें सुदृढ़ भक्ति और श्रीहरिकी दासता प्रदान की। नारद! प्रजापतिने देवसेनाको, जो रत्नाभरणोंसे विभूषित, परम विनीत, उत्तम शीलवती, मनको हरण कर लेनेवाली अत्यन्त सुन्दरी थी, जिसे विद्वान् लोग शिशुओंकी रक्षा करनेवाली महाषष्ठी कहते हैं, वैवाहिक विधिके अनुसार वेद-मन्त्रोच्चारणपूर्वक कार्तिकेयके अर्पित कर दिया। इस प्रकार कुमारका अभिषेक करके सभी देवता, मुनिगण और गन्धर्व जगदीश्वरोंको प्रणाम करके अपने-अपने घर चले गये।

नारद! इसके बाद शंकरने नारायण, ब्रह्मा और धर्मकी स्तुति की और फिर धर्मका आलिङ्गन करके परमप्रिय श्रीहरिको मस्तक झुकाया। तदनन्तर शंकरद्वारा सत्कृत होकर शैलराज हिमालय गणोंसहित प्रेमपूर्वक वहाँसे बिदा हुए। इस प्रकार जो-जो लोग वहाँ आये थे, वे सभी आनन्दपूर्वक प्रस्थान कर गये। तब महेश्वर देवी पार्वतीके साथ बड़े आनन्दसे वहाँ रहने लगे। कुछ समय बीतनेके बाद शंकरने पुनः उन सभी देवोंको बुलाकर विवाह-विधिके अनुसार पुष्टिको महात्मा गणेशके हाथों समर्पित कर दिया। इस प्रकार दोनों पुत्रों तथा गणोंके साथ रहती हुई पार्वतीका मन बड़ा प्रसन्न था।