भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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गणपतिखण्ड

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हड्डी, रुई, कछुआ, धूल, भौंकता हुआ कुत्ता, दाहिनी ओर भयंकर शब्द करता हुआ सियार, जटा, हजामत, कटा हुआ बाल, नख, मल, कलह, विलाप करता हुआ मनुष्य, अमङ्गलसूचक विलाप करनेवाला तथा शोककारक रुदन करनेवाला, झूठी गवाही देनेवाला, चोर मनुष्य, हत्यारा, कुलटाका पति और पुत्र, कुलटाका अन्न खानेवाला, देवता, गुरु और ब्राह्मणोंकी वस्तुओं तथा धनका अपहरण करनेवाला, दान देकर छीन लेनेवाला, डाकू, हिंसक, चुगलखोर, दुष्ट, पिता-मातासे विरक्त, ब्राह्मण और पीपलका विघातक, सत्यका हनन करनेवाला, कृतघ्न, धरोहर हड़प लेनेवाला मनुष्य, विप्रद्रोही, मित्रद्रोही, घायल, विश्वासघातक, गुरु, देवता और ब्राह्मणकी निन्दा करनेवाला, अपने अङ्गोंको काटनेवाला, जीवहिंसक, अपने अङ्गसे हीन, निर्दयी, व्रत-उपवाससे रहित, दीक्षाहीन, नपुंसक, कुष्ठरोगी, काना, बहरा, पुक्कस (जातिविशेष), कटे हुए लिङ्गवाला (नागा), मदिरासे मतवाला, मदिरा, पागल, खून उगलनेवाला, भैंसा, गदहा, मूत्र, विष्ठा, कफ, मनुष्यकी सूखी खोपड़ी, प्रचण्ड आँधी, रक्तकी वृष्टि, बाजा, वृक्षका गिराया जाना, भेड़िया, सूअर, गीध, बाज, कङ्क (एक मांसाहारी पक्षी), भालू, पाश, सूखी लकड़ी, कौआ, गन्धक, पहले-पहल दान लेनेवाला ब्राह्मण (महापात्र), तन्त्र-मन्त्रसे जीविका चलानेवाला, वैद्य, रक्त-पुष्प, औषध, भूसी, दूषित समाचार, मृतककी बातचीत, ब्राह्मणका दारुण शाप, दुर्गन्धयुक्त वायु और दुःशब्द आदि राजाके सामने आये। राजाका मन दूषित हो गया, प्राण निरन्तर क्षुब्ध रहने लगे, बायाँ अङ्ग फड़कने लगा और शरीरमें जडता आ गयी तथापि राजाको युद्धमें ही अपना मङ्गल दीख रहा था; अतः वह निःशङ्क हो सारी सेनाओंको साथ लेकर युद्धक्षेत्रमें प्रविष्ट हुआ। वहाँ भृगुवंशी परशुरामको सामने देखकर वह तुरंत रथसे उतर पड़ा और भक्तिपूर्वक बड़े-बड़े राजाओंके साथ दण्डकी भाँति भूमिपर लेटकर उन्हें प्रणाम किया। तब परशुरामने 'तुम स्वर्गमें जाओ' ऐसा राजाको उसका अभीष्ट आशीर्वाद दिया। वह उनके मनोऽनुकूल ही हुआ; क्योंकि ब्राह्मणके आशीर्वचन दुर्लङ्घ्य होते हैं। तदनन्तर राजराजेश्वर कार्तवीर्य उसी क्षण राजाओंसहित परशुरामको नमस्कार करके तुरंत ही रथपर, जो नाना प्रकारकी युद्ध-सामग्रीसे सम्पन्न था, सवार हुआ। फिर उसने सहसा दुन्दुभि, मुरज आदि तरह-तरहके बाजे बजवाये और ब्राह्मणोंको धन दान किया। तब वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ परशुराम राजाओंकी उस सभामें राजाधिराज कार्तवीर्यसे हितकारक, सत्य एवं नीतियुक्त वचन बोले।

**परशुरामने कहा—**अये धर्मिष्ठ राजेन्द्र! तुम तो चन्द्रवंशमें उत्पन्न हुए हो और विष्णुके अंशभूत बुद्धिमान् दत्तात्रेयके शिष्य हो। तुम स्वयं विद्वान् हो और वेदज्ञोंके मुखसे तुमने वेदोंका श्रवण भी किया है; फिर भी तुम्हें इस समय सज्जनोंको विडम्बित करनेवाली दुर्बुद्धि कैसे उत्पन्न हो गयी? तुमने पहले लोभवश निरीह ब्राह्मणकी हत्या कैसे कर डाली? जिसके कारण सती-साध्वी ब्राह्मणी शोक-संतप्त होकर पतिके