भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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श्रीकृष्णजन्मखण्ड

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हारसे विभूषित पचास करोड़ गोपोंके विविध विलासोंसे विलसित रमणीय वृन्दावनको देखते हुए वे देवेश्वरगण गोलोकधाममें जा पहुँचे, जो चारों ओरसे गोलाकार तथा कोटि योजन विस्तृत है। वह सब ओरसे रत्नमय परकोटोंद्वारा घिरा हुआ है। मुने! उसमें चार दरवाजे हैं। उन दरवाजोंपर द्वारपालोंके रूपमें विराजमान गोप-समूह उनकी रक्षा करते हैं। श्रीकृष्णकी सेवामें लगे रहनेवाले गोपोंके आश्रम भी रत्नोंसे जटित तथा नाना प्रकारके भोगोंसे सम्पन्न हैं। उन आश्रमोंकी संख्या भी पचास करोड़ है। इनके सिवा भक्त गोप-समूहोंके सौ करोड़ आश्रम हैं, जिनका निर्माण पूर्वोक्त आश्रमोंसे भी अधिक सुन्दर है। वे सब-के-सब उत्तम रत्नोंसे गठित हैं। उनसे भी अधिक विलक्षण तथा बहुमूल्य रत्नोंद्वारा रचित आश्रम पार्षदोंके हैं, जिनकी संख्या दस करोड़ है। पार्षदोंमें भी जो प्रमुख लोग हैं, वे श्रीकृष्णके समान रूप धारण करके रहते हैं। उनके लिये उत्तम रत्नोंसे निर्मित एक करोड़ आश्रम हैं। राधिकाजीमें विशुद्ध भक्ति रखनेवाली गोपाङ्गनाओंके बत्तीस करोड़ दिव्य एवं श्रेष्ठ आश्रम हैं, जिनकी रचना उत्तम श्रेणीके रत्नोंद्वारा हुई है। उनकी जो किंकरियाँ हैं, उनके लिये भी मणिरत्न आदिके द्वारा बड़े सुन्दर और मनोहर भवन बनाये गये हैं, जिनकी संख्या दस करोड़ है। ये सभी दिव्य आश्रम और भवन वृन्दावनकी शोभाका विस्तार करते हैं।

सैंकड़ों जन्मोंकी तपस्याओंसे पवित्र हुए जो भक्तजन भारतवर्षकी भूमिपर श्रीहरिकी भक्तिमें तत्पर रहते हैं, वे कर्मोंके शान्त कर देनेवाले हैं—उनके कर्मबन्धन नष्ट हो जाते हैं। मुने! जो सोते, जागते हर समय अपने मनको श्रीहरिके ही ध्यानमें लगाये रहते हैं तथा दिन-रात ‘राधाकृष्ण’, ‘श्रीकृष्ण’ इत्यादि नामोंका जप किया करते हैं; उन श्रीकृष्ण-भक्तोंके लिये भी वहाँ गोलोकमें बड़े मनोहर निवासस्थान बने हुए हैं। उत्तम मणिरत्नोंद्वारा निर्मित वे भव्य भवन भाँति-भाँतिके भोगोंसे सम्पन्न हैं। पुष्प-शय्या, पुष्पमाला तथा श्वेत चामरसे सुशोभित हैं। रत्नमय दर्पणोंकी शोभासे पूर्ण हैं। उनमें इन्द्रनील मणियाँ जड़ी गयी हैं। उन भवनोंके शिखरोंपर बहुमूल्य रत्नमय कलशसमूह शोभा देते हैं। उनकी दीवारोंपर महीन वस्त्रोंके आवरण पड़े हुए हैं। ऐसे भवनोंकी संख्या भी सौ करोड़ है।

उस अद्भुत धामका दर्शन करके वे देवता बड़ी प्रसन्नताके साथ जब कुछ दूर और आगे गये, तब वहाँ उन्हें रमणीय अक्षयवट दिखायी दिया। मुने! उस वृक्षका विस्तार पाँच योजन और ऊँचाई दस योजन है। उसमें सहस्रों तने और असंख्य शाखाएँ शोभा पाती हैं। वह वृक्ष लाल-लाल पके फलोंसे व्याप्त है। रत्नमयी वेदिकाएँ उसकी शोभा बढ़ाती हैं। उस वृक्षके नीचे बहुत-से गोप-शिशु दृष्टिगोचर हुए, जिनका रूप श्रीकृष्णके ही समान था। वे सब-के-सब पीतवस्त्रधारी और मनोहर थे तथा खेल-कूदमें लगे हुए थे। उनके सारे अङ्ग चन्दनसे चर्चित थे और वे सभी रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित थे। देवेश्वरोंने वहाँ उन सबके दर्शन किये। वे सभी श्रीहरिके श्रेष्ठ पार्षद थे।

मुने! वहाँसे थोड़ी ही दूरपर उन्हें एक मनोहर राजमार्ग दिखायी दिया, जिसके दोनों पार्श्वमें लाल मणियोंसे अद्भुत रचना की गयी थी। इन्द्रनील, पद्मराग, हीरे और सुवर्णकी बनी हुई वेदियाँ उस राजमार्गके उभय पार्श्वको सुशोभित कर रही थीं। दोनों ओर रत्नमय विश्राम-मण्डप शोभा पाते थे। उस मार्गपर चन्दन, अगुरु, कस्तूरी और कुंकुमके द्रवसे मिश्रित जलका छिड़काव किया गया था। पल्लव, लाजा, फल, पुष्प, दूर्वा तथा सूक्ष्म सूत्रमें गुँथे हुए चन्दन-पल्लवोंकी बन्दनवारसे युक्त सहस्रों कदली-स्तम्भोंके समूह