ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीकृष्णजन्मखण्ड ४२९
ही-मन श्रीकृष्णका चिन्तन करते हुए उन्होंने स्थान-स्थानपर परम आश्चर्यमय मनोहर दृश्य देखे। नाना प्रकारके वेश धारण किये समस्त गोपिकाएँ उनके दृष्टिपथमें आयीं। कोई अपने हाथोंसे मृदंग बजा रही थीं तो किन्हींके हाथोंसे वीणा-वादन हो रहा था। किन्हींके हाथमें चँवर थे तो किन्हींके करताल। किन्हींके हाथोंमें यन्त्रवाद्य शोभा पा रहे थे। कितनी ही रत्नमय नूपुरोंकी झनकार फैला रही थीं। बहुतोंकी रत्नमयी काञ्ची बज रही थी, जिसमें क्षुद्रघण्टिकाओंके शब्द गूँज रहे थे। किन्हींके माथेपर जलसे भरे घड़े थे, जो भाँति-भाँतिके नृत्यके प्रदर्शनका मनोरथ लिये खड़ी थीं। नारद! कुछ दूर और आगे जानेपर उन्होंने बहुत-से आश्रम देखे, जो राधाकी प्रधान सखियोंके आवासस्थान थे। वे रूप, गुण, वेश, यौवन, सौभाग्य और अवस्थामें एक-दूसरीके समान थीं। श्रीराधाकी समवयस्का सखियाँ तैंतीस गोपियाँ हैं, जिनकी वेश-भूषा अनिर्वचनीय है।
उनके नाम सुनो—सुशीला, शशिकला, यमुना, माधवी, रति, कदम्बमाला, कुन्ती, जाह्नवी, स्वयंप्रभा, चन्द्रमुखी, पद्ममुखी, सावित्री, सुधामुखी, शुभा, पद्मा, पारिजाता, गौरी, सर्वमङ्गला, कालिका, कमला, दुर्गा, भारती, सरस्वती, गङ्गा, अम्बिका, मधुमती, चम्पा, अपर्णा, सुन्दरी, कृष्णप्रिया, सती, नन्दिनी और नन्दना—ये सब-की-सब समान रूपवाली हैं। इनके शुभ्र आश्रम रत्नों और धातुओंसे चित्रित हैं। नाना प्रकारके चित्रोंसे चित्रित होनेके कारण वे अत्यन्त मनोहर प्रतीत होते हैं। उनके शिखर बहुमूल्य रत्नमय कलश-समूहोंसे जाज्वल्यमान हैं। उत्तम रत्नोंद्वारा उनकी रचना हुई है। गोलोक ब्रह्माण्डसे बाहर और ऊपर है। उससे ऊपर दूसरा कोई लोक नहीं है। ऊपर सब कुछ शून्य ही है। वहींतक सृष्टिकी अन्तिम सीमा है। सात रसातलोंसे भी नीचे सृष्टि नहीं है, रसातलोंसे नीचे जल और अन्धकार है, जो अगम्य और अदृश्य है। (अध्याय ४)
श्रीराधाके विशाल भवन एवं अन्तःपुरकी शोभाका वर्णन, ब्रह्मा आदिको दिव्य तेजःपुञ्जके दर्शन तथा उनके द्वारा उन तेजोमय परमेश्वरकी स्तुति
भगवान् नारायण कहते हैं—सम्पूर्ण गोलोकका दर्शन करके उन तीनों देवताओंके मनमें बड़ा हर्ष हुआ। वे फिर श्रीराधाके प्रधान द्वारपर आये। उस द्वारका निर्माण उत्तम रत्नों और मणियोंसे हुआ था। वहाँ दो वेदिकाएँ थीं। हल्दीके रंगकी उत्तम मणिसे, जिसमें हीरेका भी सम्मिश्रण था, बनाये गये श्रेष्ठ रत्न-मणिनिर्मित किवाड़ उस द्वारकी शोभा बढ़ाते थे। देवताओंने देखा, उस द्वारपर रक्षाके लिये परम उत्तम वीरभानुकी नियुक्ति हुई है। वे रत्नोंके बने हुए सिंहासनपर बैठे हैं, पीताम्बर पहने हैं तथा रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित हैं। उनके मस्तकपर रत्नमय मुकुट उद्भासित हो रहा है। विचित्र
चित्रोंसे अलंकृत उस अद्भुत एवं विचित्र द्वारकी रक्षा करते हुए द्वारपाल वीरभानुके पास जा देवताओंने प्रसन्नतापूर्वक अपना सारा अभिप्राय निवेदन किया। तब द्वारपालने निःशंक होकर उन देवेश्वरोंसे कहा—‘देवगण! मैं इस समय आज्ञा लिये बिना आपलोगोंको भीतर नहीं जाने दूँगा’।
मुने! यह कहकर द्वारपालने श्रीकृष्णके स्थानपर सेवकोंको भेजा और उनकी आज्ञा पाकर देवताओंको अंदर जानेकी अनुमति दी। उससे पूछकर वे तीनों देवता दूसरे उत्तम द्वारपर गये, जो पहलेसे अधिक विचित्र, सुन्दर और मनोहर था। नारद! उस द्वारपर नियुक्त हुए चन्द्रभानु नामक द्वारपाल दिखायी दिये, जिनकी अवस्था