भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 478
४६८संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

ब्राह्मणने नन्दशिशुके कण्ठमें वह कवच बाँध दिया। इस प्रकार साक्षात् श्रीहरिने अपना ही कवच अपने कण्ठमें धारण किया। मुने! श्रीहरिके इस कवचका सम्पूर्ण प्रभाव बताया गया। भगवान् अनन्त हैं। वे अपनी महिमासे कभी च्युत नहीं होते। उनके प्रभावकी कहीं तुलना नहीं है।

(अध्याय १२)


मुनि गर्गजीका आगमन, यशोदाद्वारा उनका सत्कार और परिचय-प्रश्न, गर्गजीका उत्तर, नन्दका आगमन, नन्द-यशोदाको एकान्तमें ले जाकर गर्गजीका श्रीराधा-कृष्णके नाम-माहात्म्यका परिचय देना और उनकी भावी लीलाओंका क्रमशः वर्णन करना, श्रीकृष्णके नामकरण एवं अन्नप्राशन-संस्कारका बृहद् आयोजन, ब्राह्मणोंको दान-मान, गर्गद्वारा श्रीकृष्णकी स्तुति तथा गर्ग आदिकी विदाई

भगवान् नारायण कहते हैं—महामुने! अब श्रीकृष्णका कुछ और माहात्म्य सुनो, जो विघ्नविनाशक, पापहारी, महान् पुण्य प्रदान करनेवाला तथा परम उत्तम है। एक दिनकी बात है। सोनेके सिंहासनपर बैठी हुई नन्दपत्नी यशोदा भूखे हुए श्रीकृष्णको गोदमें लेकर उन्हें स्तन पिला रही थीं। उसी समय एक श्रेष्ठ ब्राह्मण शिष्यसमूहसे घिरे हुए वहाँ आये। वे ब्रह्मतेजसे प्रकाशित हो रहे थे और शुद्ध स्फटिककी मालापर परब्रह्मका जप कर रहे थे। दण्ड और छत्र धारण किये श्वेत वस्त्र पहने वे महर्षि अपनी धवल दन्तपंक्तियोंके कारण बड़ी शोभा पा रहे थे। वेद और वेदाङ्गोंके पारंगत तो वे थे ही, ज्योतिर्विद्याके मूर्तिमान् स्वरूप थे। उन्होंने अपने मस्तकपर तपाये हुए सुवर्णके समान पिङ्गल जटाभार धारण कर रखा था। उनका मुख शरत्पूर्णिमाके चन्द्रदेवकी कान्तिको लज्जित कर रहा था। गोरे-गोरे अङ्ग और कमल-जैसे नेत्रवाले वे योगिराज भगवान् शंकरके शिष्य थे तथा गदाधारी श्रीविष्णुके प्रति विशुद्ध भक्ति रखते थे। वे श्रीमान् महर्षि प्रसन्नतापूर्वक शिष्योंको पढ़ाते थे। उनके एक हाथमें व्याख्याकी मुद्रा सुस्पष्ट दिखायी देती थी। वे वेदोंकी अनेक प्रकारकी व्याख्या लीलापूर्वक करते थे। उन्हें देखकर ऐसा जान पड़ता था


ऐशान्यामीश्वरः पातु सर्वत्र पातु शत्रुजित् । जले स्थले चान्तरिक्षे निद्रायां पातु राघवः ॥
इत्येवं कथितं ब्रह्मन् कवचं परमाद्भुतम् । कृष्णेन कृपया दत्तं स्मृतेनैव पुरा मया ॥
शुम्भेन सह संग्रामे निर्लक्ष्ये घोरदारुणे । गगने स्थितया सद्यः प्राप्तिमात्रेण सो जितः ॥
कवचस्य प्रभावेण धरण्यां पतितो मृतः । पूर्वं वर्षशतं खे च कृत्वा युद्धं भयावहम् ॥
मृते शुम्भे च गोविन्दः कृपालुर्गगनस्थितः । माल्यं च कवचं दत्त्वा गोलोकं स जगाम ह ॥
कल्पान्तरस्य वृत्तान्तं कृपया कथितं मुने । अभ्यन्तरभयं नास्ति कवचस्य प्रभावतः ॥
कोटिशः कोटिशोनष्टामया दृष्टाश्च वेधसः । अहं च हरिणा सार्द्धं कल्पे कल्पे स्थिरा सदा ॥
इत्युक्त्वा कवचंदत्त्वा सान्तर्धानं चकार ह । निःशङ्को नाभिकमले तस्थौ स कमलोद्भवः ॥
सुवर्णगुटिकायां तु कृत्वेदं कवचं परम् । कण्ठे वा दक्षिणे बाहौ बध्नीयाद् यः सुधीः सदा ॥
विषाग्निसर्पशत्रुभ्यो भयं तस्य न विद्यते । जले स्थले चान्तरिक्षे निद्रायां रक्षतीश्वरः ॥

( श्रीकृष्णजन्मखण्ड १२ । १४–३६)