भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 571

• श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५६१

मुकुट धारण करती हैं। उनकी आकृति बड़ी मनोहर है। श्रेष्ठ मणियोंके सारतत्त्वसे जटिल रत्नमयी माला उनके कण्ठ एवं वक्षःस्थलको उद्भासित किये रहती है। पारिजातके फूलोंकी मालाएँ गलेसे लेकर घुटनोंतक लटकी रहती हैं। उनकी कटिका निम्नभाग अत्यन्त स्थूल और कठोर है। वे स्तनों और नूतन यौवनके भारसे कुछ-कुछ झुकी-सी रहती हैं। उनकी झाँकी मनको मोह लेनेवाली है। ब्रह्मा आदि देवता निरन्तर उनकी स्तुति करते हैं। उनके श्रीअङ्गोंकी प्रभा करोड़ों सूर्योंको लज्जित करती है। नीचे-ऊपरके ओठ पके बिम्बफलके सदृश लाल हैं। अङ्गकान्ति सुन्दर चम्पाके समान है। मोतीकी लड़ियोंको भी लजानेवाली दन्तावली उनके मुखकी शोभा बढ़ाती है। वे मोक्ष और मनोवाञ्छित कामनाओंको देनेवाली हैं। शरत्कालके पूर्ण चन्द्रको भी तिरस्कृत करनेवाली चन्द्रमुखी देवी पार्वतीका मैं भजन करता हूँ।

इस प्रकार ध्यान करके मस्तकपर फूल रखकर व्रती पुरुष प्रसन्नतापूर्वक हाथमें पुष्प ले पुनः भक्तिभावसे ध्यान करके पूजन आरम्भ करे। पूर्वोक्त मन्त्रसे ही प्रतिदिन हर्षपूर्वक षोडशोपचार चढ़ावे। फिर व्रती भक्ति और प्रसन्नताके साथ पूर्वकथित स्तोत्रद्वारा ही देवीकी स्तुति करके उन्हें प्रणाम करे। प्रणामके पश्चात् भक्तिभावसे मनको एकाग्र करके गौरी-व्रतकी कथा सुने।

नारदजीने पूछा—भगवन्! आपने व्रतके विधान, फल और गौरीके अद्भुत स्तोत्रका वर्णन कर दिया। अब मैं गौरी-व्रतकी शुभ कथा सुनना चाहता हूँ। पहले किसने इस व्रतको किया था? और किसने भूतलपर इसे प्रकाशित किया था? इन सब बातोंको आप विस्तारपूर्वक बताइये; क्योंकि आप संदेहका निवारण करनेवाले हैं।

भगवान् श्रीनारायणने कहा—नारद! कुशध्वजकी पुत्री सती वेदवतीने महान् तीर्थ पुष्करमें पहले-पहल इस व्रतका अनुष्ठान किया था। व्रतकी समाप्तिके दिन कोटि सूर्योंके समान प्रकाशमान भगवती जगदम्बाने उसे साक्षात् दर्शन दिया। देवीके साथ लाख योगिनियाँ भी थीं। वे परमेश्वरी सुवर्णनिर्मित रथपर बैठी थीं और उनके प्रसन्नमुखपर मुस्कराहट फैल रही थी। उन्होंने संयमशीला वेदवतीसे कहा।

पार्वती बोलीं—वेदवती! तुम्हारा कल्याण हो। तुम इच्छानुसार वर माँगो। तुम्हारे इस व्रतसे मैं संतुष्ट हूँ; अतः तुम्हें मनोवाञ्छित वर दूँगी।

नारद! पार्वतीकी बात सुनकर साध्वी वेदवतीने उन प्रसन्नहृदया देवीकी ओर देखा और दोनों हाथ जोड़ उन्हें प्रणाम करके वह बोली।

वेदवतीने कहा—देवि! मैंने नारायणको मनसे चाहा है; अतः वे ही मेरे प्राणवल्लभ पति हों—यह वर मुझे दीजिये। दूसरे किसी वरको लेनेकी मुझे इच्छा नहीं है। आप उनके चरणोंमें सुदृढ़ भक्ति प्रदान कीजिये।

वेदवतीकी बात सुनकर जगदम्बा पार्वती हँस पड़ीं और तुरंत रथसे उतरकर उस हरिवल्लभासे बोलीं।

पार्वतीने कहा—जगदम्ब ! मैंने सब जान लिया। तुम साक्षात् सती लक्ष्मी हो और भारतवर्षको अपनी पदधूलिसे पवित्र करनेके लिये यहाँ आयी हो। साध्वि ! परमेश्वरि ! तुम्हारी चरणरजसे यह पृथ्वी तथा यहाँके सम्पूर्ण तीर्थ तत्काल पवित्र हो गये हैं। तपस्विनि ! तुम्हारा यह व्रत लोकशिक्षाके लिये है। तुम तपस्या करो। देवि! तुम साक्षात् नारायणकी वल्लभा हो और जन्म-जन्ममें उनकी प्रिया रहोगी। भविष्यमें भूतलका भार उतारनेके लिये तथा यहाँके दस्युभूत राक्षसोंका नाश करनेके लिये पूर्ण परमात्मा विष्णु दशरथनन्दन श्रीरामके रूपमें वसुधापर पधारेंगे। उनके दो भक्त जय और विजय ब्राह्मणोंके शापके कारण वैकुण्ठधामसे