ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ५८६ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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महादेवजी सिद्धस्वरूप, सिद्धोंके स्वामी, योगीन्द्रोंके गुरुके भी गुरु, मृत्युञ्जय, कालके भी काल तथा सनातन ब्रह्मज्योति हैं। वे प्रभु परमात्मस्वरूप, सगुण तथा निर्गुण हैं। उन्होंने भक्तोंके ध्यानके लिये निर्मल महेश्वररूप धारण किया है।
दूतकी यह बात सुनकर हिमवान् प्रसन्नतापूर्वक उठे और मधुपर्क आदि साथ ले भगवान् शंकरके समीप गये। दूतकी पूर्वोक्त बात सुनकर देवी शिवाके मुख और नेत्र प्रसन्नतासे खिल उठे। उन्होंने अपने मनमें यही माना कि महेश्वर मेरे ही लिये आये हैं। यही जानकर उन्होंने विविध दिव्य वस्त्रों तथा दिव्य रत्नालंकारों एवं मालाओंके द्वारा अपने सम्पूर्ण अङ्गोंको सुसज्जित किया। तत्पश्चात् अपने अनुपम रूपको देखकर पार्वती ने मन-ही-मन शंकरजीका ध्यान किया। विशेषतः स्वामीके चरणकमलोंका वे चिन्तन करने लगीं। उस समय शिवको छोड़कर पिता, माता, बन्धु-बान्धव, साध्वी वर्ग तथा सहोदर भाई किसीको भी उन्होंने अपने मनमें स्थान नहीं दिया।
इधर गिरिराज हिमालयने वहाँ जाकर भगवान् चन्द्रशेखरके दर्शन किये। वे गङ्गाजीके रमणीय तटसे ऊपरको आ रहे थे। उनके मुखपर मन्द मुस्कानकी प्रभा फैल रही थी। वे संस्कारयुक्त माला धारण किये मेरे नामका जप कर रहे थे। उनके सिरपर सुनहरी प्रभासे युक्त जटाराशि विराजमान थी। वे वृषभकी पीठपर बैठकर हाथमें त्रिशूल लिये सब प्रकारके आभूषणोंसे सुशोभित थे। सर्पका ही यज्ञोपवीत पहने सर्पमय आभूषणोंसे विभूषित थे। उनकी अङ्गकान्ति शुद्ध स्फटिकके समान उज्ज्वल थी, वे वस्त्रके स्थानमें व्याघ्रचर्म धारण किये, हड्डियोंकी माला पहने तथा अङ्गोंमें विभूति रमाये बड़ी शोभा पाते थे। दिगम्बर वेष, पाँच मुख और प्रत्येक मुखमें तीन-तीन नेत्र थे। उनके श्रीअङ्गोंसे करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाश फैल रहा था। हिमवान्ने उनके चारों ओर एकादश रुद्रोंको देखा, जो ब्रह्मतेजसे प्रकाशमान थे। शिवके वामभागमें महाकाल और दाहिने भागमें नन्दिकेश्वर खड़े थे। भूत, प्रेत, पिशाच, कूष्माण्ड, ब्रह्मराक्षस, बेताल, क्षेत्रपाल, भयानक पराक्रमी भैरव, सनक, सनन्दन, सनत्कुमार, सनातन, जैगीषव्य, कात्यायन, दुर्वासा और अष्टावक्र आदि ऋषि—सब उनके सामने खड़े थे। हिमालयने इन सबको मस्तक झुकाकर भगवान् शिवको प्रणाम किया और पृथ्वीपर माथा टेक दण्डकी भाँति पड़कर दोनों हाथ जोड़ लिये। इसके बाद बड़ी भक्ति-भावनासे शिवके चरणकमल पकड़कर पर्वतराजने नमस्कार किया और नेत्रोंसे आँसू बहाते पुलकित-शरीर हो धर्मके दिये हुए स्तोत्रसे परमेश्वर शिवकी स्तुति आरम्भ की।
**हिमालय बोले—**भगवन्! आप ही सृष्टिकर्ता ब्रह्मा हैं। आप ही जगत्पालक विष्णु हैं। आप ही सबका संहार करनेवाले अनन्त हैं और आप ही कल्याणदाता शिव हैं। आप गुणातीत ईश्वर, सनातन ज्योतिःस्वरूप हैं। प्रकृति और उसके ईश्वर हैं। प्राकृत पदार्थरूप होते हुए भी प्रकृतिसे परे हैं। भक्तोंके ध्यान करनेके लिये आप अनेक रूप धारण करते हैं। जिन रूपोंमें जिसकी प्रीति है, उसके लिये आप वे ही रूप धारण करते हैं। आप ही सृष्टिके जन्मदाता सूर्य हैं। समस्त तेजोंके आधार हैं। आप ही शीतल किरणोंसे सदा शस्योंका पालन करनेवाले सोम हैं। आप ही वायु, वरुण और सर्वदाहक अग्नि हैं। आप ही देवराज इन्द्र, काल, मृत्यु तथा यम हैं। मृत्युञ्जय होनेके कारण मृत्युकी भी मृत्यु, कालके भी काल तथा यमके भी यम हैं। वेद, वेदकर्ता तथा वेद-वेदाङ्गोंके पारङ्गत विद्वान् भी आप ही