ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीकृष्णजन्मखण्ड ६३७
अज्ञानरूपी तिमिर (रतौंधी)-रोगसे अन्धे हुए मनुष्यकी दृष्टिको ज्ञानाञ्जनकी शलाकासे खोल दिया है; उन श्रीगुरुदेवको नमस्कार है। जन्मदाता, अन्नदाता, माता, पिता, अन्य गुरु जीवको घोर संसारसागरसे पार करनेमें समर्थ नहीं हैं। गुरु विष्णु हैं, गुरु ब्रह्मा हैं, गुरु महेश्वरदेव हैं, गुरु धर्म हैं, गुरु शेषनाग हैं और गुरु सर्वात्मा निर्गुण श्रीकृष्ण हैं; गुरु सम्पूर्ण तीर्थ, आश्रम तथा देवालय हैं। गुरु सम्पूर्ण देवस्वरूप तथा साक्षात् श्रीहरि हैं। इष्टदेवके रुष्ट हो जानेपर गुरुदेव अपने शिष्यकी रक्षा कर सकते हैं; किंतु गुरुके रुष्ट हो जानेपर इष्टदेव उसकी रक्षा नहीं कर सकते। जिसपर सम्पूर्ण ग्रह, देवता और ब्राह्मण रुष्ट हो जाते हैं, उसीपर गुरुदेव रुष्ट होते हैं; क्योंकि गुरु ही देवता हैं। आत्मा (शरीर), पुत्र, धन और पत्नी भी गुरुसे बढ़कर प्रिय नहीं हैं। धर्म, तप, सत्य और पुण्य भी गुरुसे अधिक प्रिय नहीं हैं। गुरुसे बढ़कर शासक और बन्धु दूसरा कोई नहीं है। शिष्योंके लिये सदा गुरु ही शासक, राजा और देवता हैं। अन्नदाता जबतक अन्न देनेमें समर्थ है, तभीतक वह शासक होता है; परंतु गुरु जन्म-जन्ममें शिष्योंके शासक होते हैं। मन्त्र, विद्या, गुरु और देवता—ये पतिकी भाँति पूर्वजन्मके अनुसार ही प्राप्त होते हैं। प्रत्येक जन्ममें गुरुका सम्बन्ध होनेसे उनका स्थान सबसे ऊपर है। पितारूप गुरु जिस जन्ममें जन्म देते हैं, उसी जन्ममें वन्दनीय होते हैं। माता तथा अन्य गुरुओंकी भी यही स्थिति है; परंतु ज्ञानदाता गुरु प्रत्येक जन्ममें वन्दनीय हैं। ब्रह्मन्! आप ब्राह्मणोंमें वरिष्ठ, तपस्वी जनोंमें गरिष्ठ तथा समस्त धर्मात्माओंमें उत्तम धर्मिष्ठ एवं ब्रह्मनिष्ठ ब्रह्मवेत्ता हैं। मुनिश्रेष्ठ! अब आप मुझपर और इन्द्रपर संतुष्ट हों। आपके संतुष्ट होनेपर ही ग्रह और देवता सदा संतुष्ट रहते हैं।
ब्रह्मन्! ऐसा कहकर शची फिर उच्चस्वरसे रोने लगी। उसका रोना देखकर तारादेवी भी फूट-फूटकर रोने लगीं। तारा अपने पतिके चरणोंपर गिर पड़ीं और बार-बार यह कहकर रोने लगीं कि आप इन्द्रके अपराधको क्षमा करें। तब बृहस्पतिजी संतुष्ट हो तारासे बोले।
गुरुने कहा—तारे! उठो। शचीका सब कुछ मङ्गलमय होगा, मेरे आशीर्वादसे यह अपने पति महेन्द्रको शीघ्र ही प्राप्त कर लेगी।
ऐसा कहकर बृहस्पतिजी चुप हो गये। तारा पुनः उनके चरणोंमें गिरीं और बार-बार रोयीं। फिर ताराने शचीको पकड़कर अपने हृदयसे लगा लिया और उसे नाना प्रकारके आध्यात्मिक-ज्ञानसम्बन्धी उत्तम वचन सुनाकर समझाया एवं धीरज बँधाया।
(अध्याय ५६—५९)
बृहस्पतिका शचीको आश्वासन एवं आशीर्वाद देना, नहुषका सप्तर्षियोंको वाहन बनाना और दुर्वासाके शापसे अजगर होना, बृहस्पतिका इन्द्रको बुलाकर पुनः सिंहासनपर बिठाना तथा गौतमसे इन्द्र और अहल्याको शापकी प्राप्ति
श्रीनारायण कहते हैं—नारद! शचीद्वारा किये गये स्तोत्रको सुनकर बृहस्पति बहुत संतुष्ट हुए और शान्तभावसे इन्द्रपत्नी शचीके प्रति मधुर वाणीमें बोले।
बृहस्पतिने कहा—बेटी! सारा भय छोड़ दो। मेरे रहते तुम्हें भय किस बातका है? शोभने! मेरे लिये जैसे कचकी पत्नी (पुत्रवधू) रक्षणीय है, उसी प्रकार तुम भी हो। जो स्थान पुत्रका