भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

पृष्ठ 667, कुल 810 में से

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पृष्ठ 667

श्रीकृष्णजन्मखण्ड

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हा प्राणवल्लभ! हे प्राणचोर प्रियतम! तुम कहाँ गये?' फिर एक क्षणतक अन्वेषण करती हुई वे मालतीवनमें घूमती फिरीं। कभी क्षणभरके लिये बैठ जातीं, कभी उठ जातीं और कभी भूतलपर सो जाती थीं। कुछ क्षणोंतक अत्यन्त उच्चस्वरसे बारंबार रोदन और विलाप करती रहीं। 'हे नाथ! आओ-आओ' ऐसा बारंबार कहकर वे संतापसे मूर्च्छित हो गयीं। विरहानलसे संतप्त हो घास-फूससे ढके हुए भूतलपर इस तरह गिरीं, मानो प्राणान्त हो गया हो।

ब्रह्मन्! उस समय वहाँ अगणित गोपियाँ आ पहुँचीं। किन्हींके हाथोंमें चँवर थे और कोई चन्दनका अनुलेपन लिये आयी थीं। उन सबके बीच जो प्रियाली (प्यारी सखी) थी, उसने श्रीराधाको अपनी छातीसे लगा लिया। वह प्रियाजीको मरणासन्न-सी देख प्रेमसे विह्वल हो रोने लगी। उसने पङ्कके ऊपर सजल कमलदल बिछाकर उसपर श्रीराधाको सुलाया। वे चेष्टाहीन और मृतक-सी जान पड़ती थीं। गोपियाँ सुन्दर श्वेत चँवर डुलाती हुई उनकी सेवामें लग गयीं। उनके अङ्गोंमें चन्दनका लेप किया। उस अवस्थामें सती राधाके वस्त्र गीले हो गये थे। इतनेमें ही श्रीकृष्ण वहाँ लौट आये और अपनी उन प्राणवल्लभाको पूर्वोक्त अवस्थामें देखा। नारद! जब वे पास आने लगे तो बलवती गोपियोंने उन्हें रोक दिया और उन्हें इस तरह पकड़कर ले आयीं, जैसे राजभय आदिसे प्रेरित हो किसी दण्डनीय अपराधीको बाँधकर लाया गया हो। निकट आकर कृपानिधान श्रीकृष्णने राधाको गोदमें बिठा लिया, उन्हें सचेत किया और प्रबोधक वचनोंद्वारा समझाया। होशमें आकर देवी राधाने जब प्राणवल्लभको देखा, तब वे सुस्थिर हो गयीं और उन्होंने विरह-ज्वरको त्याग दिया। उस समय राधाकी चतुर सखी रत्नमालाने जो सबके द्वारा सम्मानित थी, श्रीकृष्णसे नीतिका सारभूत परम उत्तम मधुर वचन कहा।

रत्नमाला बोली—श्रीकृष्ण! सुनो। मैं ऐसी बात बताती हूँ, जो परिणाममें सुख देनेवाली, हितकारक, सत्य, नीतिका सारभूत तथा पति-पत्नीमें प्रीति बढ़ानेवाली है। वह नीतिसम्मत, वेदों और पुराणोंद्वारा अनुमोदित, लोक-व्यवहारमें प्रशंसनीय तथा उत्तम यशकी प्राप्ति करानेवाली है। नारियोंको जैसे माता प्यारी होती है, उसी तरह बन्धुजनोंमें भाई प्रिय होता है। भाईसे प्रिय पुत्र और पुत्रसे प्रिय पति होता है। साध्वी स्त्रियोंके लिये सत्पुरुषोंद्वारा समादृत स्वामी सौ पुत्रोंसे भी अधिक प्रिय होता है। रसिका और चतुरा स्त्रियोंके लिये पतिसे बढ़कर प्यारा दूसरा कोई नहीं है। इस मिथ्या संसारमें पति-पत्नीकी परस्पर प्रीति, समता तथा प्रेम-सौभाग्य परम अभीष्ट है। जिस-जिस घरमें पति-पत्नी एक-दूसरेके प्रति समभाव नहीं रखते, वहीं दरिद्रताका निवास है। वहाँ उन दोनोंका जीवन निष्फल है*। स्त्रीके लिये स्वामीसे मतभेद या फूट होना महान् दुःखकी बात है। वैसा जीवन शोक और संतापका बीज तथा मरणसे भी अधिक कष्टदायक है। सोते और जागते समय भी स्त्रियोंके प्राण पतिमें ही बसते हैं। पति ही इहलोक और परलोकमें स्त्रीका गुरु है। नाथ! ज्यों ही आप यहाँसे गये त्यों ही राधाको मूर्च्छा आ गयी। ये सहसा घाससे ढकी हुई भूमिपर गिर पड़ीं। उस समय मैंने इनके मुँहपर उत्तम शीतल जलका छींटा दिया, तब इनकी साँस चलने लगी और कुछ-कुछ चेतना आयी। मेरी सखी क्षण-क्षणमें पुकार उठती


*दम्पत्योः समता नास्ति यत्र यत्र हि मन्दिरे। अलक्ष्मीस्तत्र तत्रैव विफलं जीवनं तयोः॥
(६९।६४)

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