भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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७४४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण भीष्मकद्वारा रुक्मिणीके विवाहका प्रस्ताव, शतानन्दका उन्हें श्रीकृष्णके साथ विवाह करनेकी सम्मति देना, रुक्मीद्वारा उसका विरोध और शिशुपालके साथ विवाह करनेका अनुरोध, भीष्मकका श्रीकृष्ण तथा अन्यान्य राजाओंको निमन्त्रित करना श्रीनारायणजी कहते हैं - नारद ! विदर्भ देशमें भीष्मक नामके एक राजा राज्य करते थे, जो नारायणके अंशसे उत्पन्न हुए थे। वे विदर्भदेशीय नरेशोंके सम्राट्, महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न, पुण्यात्मा, सत्यवादी, समस्त सम्पत्तियोंके दाता, धर्मिष्ठ, अत्यन्त महिमाशाली, सर्वश्रेष्ठ और समादृत थे। उनके एक कन्या थी, जिसका नाम रुक्मिणी था। वह महालक्ष्मीके अंशसे उत्पन्न थी तथा नारियोंमें श्रेष्ठ, अत्यन्त सौन्दर्यशालिनी, मनोहारिणी और सुन्दरी स्त्रियोंमें पूजनीया थी। उसमें नयी जवानीका उमंग था। वह रत्ननिर्मित आभूषणोंसे विभूषित थी। उसके शरीरकी कान्ति तपाये हुए सुवर्णकी भाँति उद्दीप्त थी। वह अपने तेजसे प्रकाशित हो रही थी तथा शुद्धसत्त्वस्वरूपा, सत्यशीला, पतिव्रता, शान्त, दमपरायणा और अनन्त गुणोंकी भण्डार थी। वह शरत्पूर्णिमाके चन्द्रमाके सदृश शोभाशालिनी थी। उसके नेत्र शरत्कालीन कमलके-से थे और उसका मुख लज्जासे अवनत रहता था। अपनी उस सुन्दरी युवती कन्याको सहसा विवाहके योग्य देखकर उत्तम व्रतका पालन करनेवाले, धर्मस्वरूप एवं धर्मात्मा राजा भीष्मक चिन्तित हो उठे। तब वे अपने पुत्रों, ब्राह्मणों तथा पुरोहितोंसे विचार- विमर्श करने लगे। भीष्मक बोले - सभासदो ! मेरी यह सुन्दरी कन्या बढ़कर विवाहके योग्य हो गयी है; अतः मैं इसके लिये मुनिपुत्र, देवपुत्र अथवा राजपुत्र - इनमेंसे किसी अभीष्ट उत्तम वरका वरण करना चाहता हूँ। अतः आपलोग किसी ऐसे योग्य वरकी तलाश करो, जो नवयुवक, धर्मात्मा, सत्यसंध, नारायणपरायण, वेद-वेदाङ्गका विशेषज्ञ, पण्डित, सुन्दर, शुभाचारी, शान्त, जितेन्द्रिय, क्षमाशील, गुणी, दीर्घायु, महान् कुलमें उत्पन्न और सर्वत्र प्रतिष्ठित हो । राजाधिराज भीष्मककी बात सुनकर महर्षि गौतमके पुत्र शतानन्द, जो वेद-वेदाङ्गके पारगामी विद्वान्, यथार्थज्ञानी, प्रवचनकुशल, विद्वान्, धर्मात्मा, कुलपुरोहित, भूतलपर सम्पूर्ण तत्त्वोंके ज्ञाता और समस्त कर्मोंमें निष्णात थे, राजासे बोले। शतानन्दने कहा - राजेन्द्र ! तुम तो स्वयं ही धर्मके ज्ञाता तथा धर्मशास्त्रमें निपुण हो; तथापि मैं वेदोक्त प्राचीन इतिहासका वर्णन करता हूँ, सुनो। जो परिपूर्णतम परमेश्वर ब्रह्माके भी विधाता हैं; ब्रह्मा, शिव और शेषद्वारा वन्दित, परमज्योतिःस्वरूप, भक्तानुग्रहमूर्ति, समस्त प्राणियोंके परमात्मा, प्रकृतिसे परे, निर्लिप्त, इच्छारहित और

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