भारतकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

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सूत्र १९—२२ ] अध्याय २ १७३ 'स्वरूपसे ही हो सकती है। जो परलोकमें जाता है, वही स्वयं लौटकर आता है, दूसरा नहीं। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि शरीरके नाशसे आत्माका नाश नहीं होता और वह सदा ही रहता है। सम्बन्ध—इस प्रकार श्रुतिप्रमाणसे जो आत्माका नित्यत्व सिद्ध किया गया, इसमें जीवात्माको गमनागमनशील—एक देशसे दूसरे देशमें जाने-आनेवाला कहा गया। यदि यही ठीक है तब तो आत्मा विभु नहीं माना जा सकता, उसको एकदेशी मानना पड़ेगा; अतः उसका नित्यत्व भी गौण ही होगा। इस शङ्काका निराकरण करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है। इसमें पूर्वपक्षकी ओरसे आत्माके अणुत्वकी स्थापना करके अन्तमें उसको विभु (व्यापक) सिद्ध किया गया है— नाणुरतच्छ्रुतेरिति चेन्नेतराधिकारात् ॥ २ । ३ । २१ ॥ चेत्=यदि कहो कि; अणुः=जीवात्मा अणु; न=नहीं है; अतच्छ्रुतेः= क्योंकि श्रुतिमें उसको अणु न कहकर महान् और व्यापक बताया गया है; इति न=तो यह कहना ठीक नहीं; इतराधिकारात्=क्योंकि (जहाँ श्रुतियोंमें आत्माको महान् और विभु बताया है) वहाँ इतर अर्थात् परमात्माका प्रकरण है। व्याख्या—'स वा एष महानज आत्मा योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु ।' (बृह० उ० ४ । ४ । २२) अर्थात् 'जो यह विज्ञानमय आत्मा प्राणोंमें है, वही यह महान् अजन्मा आत्मा है।' इत्यादि श्रुतियोंके वर्णनको लेकर यदि यह कहा जाय कि श्रुतिमें उसको अणु नहीं कहा गया है, महान् कहा गया है, इसलिये जीवात्मा अणु नहीं है, व्यापक है तो यह सिद्ध नहीं हो सकता; क्योंकि यह श्रुति परमात्माके प्रकरणकी है; अतः वहाँ आया हुआ 'आत्मा' शब्द जीवात्माका वाचक नहीं है। सम्बन्ध—केवल इतनी ही बात नहीं है, अपि तु— स्वशब्दानुमानाभ्यां च ॥ २ । ३ । २२ ॥ स्वशब्दानुमानाभ्याम्=श्रुतिमें अणुवाचक शब्द है, उससे और अनुमान (उपमा) वाचक दूसरे शब्दोंसे; च=भी (जीवात्माका अणुत्व सिद्ध होता है)। व्याख्या—मुण्डकोपनिषद्में कहा है कि 'एषोऽणुरात्मा चेतसा वेदितव्यः।'