भारतकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

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१७६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ ही रहता है, वह गुणीसे अलग होकर कोई कार्य कैसे कर सकता है; क्योंकि जैसे गन्ध अपने गुणी पुष्प आदिसे अलग होकर स्थानान्तरमे फैल जाती है, उसी प्रकार आत्माका चेतनतारूप गुण भी आत्मासे अलग होकर समस्त शरीरमें व्याप्त हो जाता है; अतः कोई विरोध नहीं है । सम्बन्ध—इसी बातको श्रुतिप्रमाणसे दृढ़ करते हैं— तथा च दर्शयति ॥ २ । ३ । २७ ॥ तथा=ऐसा; च=ही; दर्शयति=श्रुति भी दिखलाती है । व्याख्या—केवल युक्तिसे ही यह बात सिद्ध होती हो, ऐसा नहीं; श्रुतिमे भी आत्माका एक जगह रहकर अपने गुणके द्वारा समस्त शरीरमे नखसे लोमतक व्याप्त होना दिखाया गया है (बृह० उ० १ । ४ । ७), (छा० उ० ८ । ८ । १); अतः यह सिद्ध होता है कि आत्मा अणु है । सम्बन्ध—इस प्रकार पूर्वपक्षीद्वारा इक्कीसवें सूत्रसे लेकर सत्ताईसवें सूत्रतक जीवात्माका अणु होना सिद्ध किया गया; किन्तु उसमें दी हुई युक्तियाँ सर्वथा निर्बल हैं और पूर्वपक्षीद्वारा उद्धृत श्रुति-प्रमाण तो आभासमात्र है ही, इसलिये अब सिद्धान्तीकी ओरसे अणुवादका खण्डन करके आत्माके विभुत्वकी सिद्धि की जाती है— पृथगुपदेशात् ॥ २ । ३ । २८ ॥ पृथक्=( जीवात्माके विषयमे ) अणुपरिमाणसे भिन्न; उपदेशात्=उपदेश श्रुतिमें मिलता है, इसलिये ( जीवात्मा अणु नहीं, विभु है ) । व्याख्या—पूर्वपक्षकी ओरसे जीवात्माको अणु बतानेके लिये जो प्रमाण दिया गया, उसी श्रुतिमें स्पष्ट शब्दोमे जीवात्माको विभु बताया गया है । भाव यह कि जहाँ जीवात्माका स्वरूप बालाग्रके दस हजारवें भागके समान बताया है, वहीं उसको 'स चानन्त्याय कल्पते ।' इस वाक्यसे अनन्त अर्थात् विभु होनेमे समर्थ कहा गया है ( श्वेता० उ० ५ । ९) । अतः प्रमाण देनेवालेको श्रुतिके अगले उपदेशपर भी दृष्टिपात करना चाहिये । इसके सिवा, कठोपनिषद् ( १ । ३ । १०, १३; २ । ३ । ७ ) मे स्पष्ट ही जीवात्माका विशेषण 'महान्' आया है तथा गीतामें भी जीवात्माके स्वरूपका वर्णन करते हुए स्पष्ट कहा है कि 'यह