ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
१७६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ ही रहता है, वह गुणीसे अलग होकर कोई कार्य कैसे कर सकता है; क्योंकि जैसे गन्ध अपने गुणी पुष्प आदिसे अलग होकर स्थानान्तरमे फैल जाती है, उसी प्रकार आत्माका चेतनतारूप गुण भी आत्मासे अलग होकर समस्त शरीरमें व्याप्त हो जाता है; अतः कोई विरोध नहीं है । सम्बन्ध—इसी बातको श्रुतिप्रमाणसे दृढ़ करते हैं— तथा च दर्शयति ॥ २ । ३ । २७ ॥ तथा=ऐसा; च=ही; दर्शयति=श्रुति भी दिखलाती है । व्याख्या—केवल युक्तिसे ही यह बात सिद्ध होती हो, ऐसा नहीं; श्रुतिमे भी आत्माका एक जगह रहकर अपने गुणके द्वारा समस्त शरीरमे नखसे लोमतक व्याप्त होना दिखाया गया है (बृह० उ० १ । ४ । ७), (छा० उ० ८ । ८ । १); अतः यह सिद्ध होता है कि आत्मा अणु है । सम्बन्ध—इस प्रकार पूर्वपक्षीद्वारा इक्कीसवें सूत्रसे लेकर सत्ताईसवें सूत्रतक जीवात्माका अणु होना सिद्ध किया गया; किन्तु उसमें दी हुई युक्तियाँ सर्वथा निर्बल हैं और पूर्वपक्षीद्वारा उद्धृत श्रुति-प्रमाण तो आभासमात्र है ही, इसलिये अब सिद्धान्तीकी ओरसे अणुवादका खण्डन करके आत्माके विभुत्वकी सिद्धि की जाती है— पृथगुपदेशात् ॥ २ । ३ । २८ ॥ पृथक्=( जीवात्माके विषयमे ) अणुपरिमाणसे भिन्न; उपदेशात्=उपदेश श्रुतिमें मिलता है, इसलिये ( जीवात्मा अणु नहीं, विभु है ) । व्याख्या—पूर्वपक्षकी ओरसे जीवात्माको अणु बतानेके लिये जो प्रमाण दिया गया, उसी श्रुतिमें स्पष्ट शब्दोमे जीवात्माको विभु बताया गया है । भाव यह कि जहाँ जीवात्माका स्वरूप बालाग्रके दस हजारवें भागके समान बताया है, वहीं उसको 'स चानन्त्याय कल्पते ।' इस वाक्यसे अनन्त अर्थात् विभु होनेमे समर्थ कहा गया है ( श्वेता० उ० ५ । ९) । अतः प्रमाण देनेवालेको श्रुतिके अगले उपदेशपर भी दृष्टिपात करना चाहिये । इसके सिवा, कठोपनिषद् ( १ । ३ । १०, १३; २ । ३ । ७ ) मे स्पष्ट ही जीवात्माका विशेषण 'महान्' आया है तथा गीतामें भी जीवात्माके स्वरूपका वर्णन करते हुए स्पष्ट कहा है कि 'यह
सूत्र २९ ] अध्याय २ १७७
सूत्र २९ ] अध्याय २ १७७ आत्मा नित्य, सर्वव्यापी, स्थिर, अचल और सनातन है।' (गीता २ । २४), 'जिस प्रकार सब जगह व्याप्त हुआ भी आकाश सूक्ष्म होनेके कारण लिप्त नहीं होता, वैसे ही आत्मा भी शरीरमें सब जगह स्थित है तो भी उससे लिप्त नहीं होता।' (गीता १३ । ३२) तथा 'उस आत्माको तू अविनाशी समझ, जिससे यह समस्त जडसमुदाय व्याप्त है।' (गीता २ । १७)—इन प्रमाणोंके विषयमे यह नहीं कहा जा सकता कि ये परमात्माके प्रकरणमे आये हैं। सम्बन्ध—इसपर यह जिज्ञासा होती है कि यदि ऐसी बात है तो श्रुतिमें जो स्पष्ट शब्दोंमें आत्माको अणु और अङ्गुष्ठमात्र कहा है, उसकी सङ्गति कैसे होगी ? इसपर कहते हैं— तद्गुणसारत्वात्तु तद्व्यपदेशः प्राज्ञवत् ॥ २ । ३ । २९ ॥ तद्व्यपदेशः=वह कथन; तु=तो; तद्गुणसारत्वात्=उस बुद्धि आदिके गुणोंकी प्रधानताको लेकर है; प्राज्ञवत्=जैसे परमेश्वरको अणु और हृदयमें स्थित अङ्गुष्ठमात्र बताया है, वैसे ही जीवात्माके लिये भी समझना चाहिये। व्याख्या—श्रुतिमे जीवात्माको अङ्गुष्ठमात्र परिमाणवाला कहते हुए इस प्रकार वर्णन किया गया है— अङ्गुष्ठमात्रो रवितुल्यरूपः सङ्कल्पाहङ्कारसमन्वितो यः। बुद्धेर्गुणेनात्मगुणेन चैव आराग्रमात्रो ह्यपरोऽपि दृष्टः ॥ 'जो अङ्गुष्ठमात्र परिमाणवाला, सूर्यके सदृश प्रकाशस्वरूप तथा सङ्कल्प और अहङ्कारसे युक्त है, वह बुद्धिके गुणोंसे और शरीरके गुणोंसे ही आरेकी नोक-जैसे सूक्ष्म आकारवाला है—ऐसा परमात्मासे भिन्न जीवात्मा भी निस्सन्देह ज्ञानियोंद्वारा देखा गया है।' (श्वेता० उ० ५ । ८) जीवात्माकी गति- आगतिका वर्णन भी शरीरादिके सम्बन्धसे ही है (कौ० उ० ३ । ६; प्र० उ० ३ । ९, १०) *। इससे यह बात बिल्कुल स्पष्ट हो जाती है कि श्रुतिमें जहाँ कहीं जीवात्माको एकदेशी 'अङ्गुष्ठमात्र' या 'अणु' कहा गया है, वह बुद्धि और शरीर- के गुणोंको लेकर ही है; जैसे परमात्माको भी जगह-जगह जीवात्माके हृदयमें स्थित (क० उ० १ । ३ । १; प्र० उ० ६ । २; मु० उ० २ । १ । १० तथा २ । २ । १; ३ । १ । ५; ७; श्वेता० उ० ३ । २०) तथा अङ्गुष्ठमात्र भी (क० उ० २ । १ । १२-१३) बताया है। वह कथन स्थानकी अपेक्षासे ही है, उसी प्रकार
- यच्चित्तस्तेनैष प्राणमायाति प्राणस्तेजसा युक्तः सहात्मना यथासंकल्पितं लोकं नयति । वे० द० १२—
१७८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ जीवात्माके विषयमे भी समझना चाहिये। वास्तवमें वह अणु नहीं, विभु है; इसमें कोई शङ्का नहीं है। पूर्वपक्षीने जो छान्दोग्य-श्रुतिका प्रमाण देकर यह बात कही कि 'वह एक जगह स्थित रहते हुए ही नखसे लोमतक व्याप्त है', वह कहना सर्वथा प्रकरण- विरुद्ध है; क्योंकि उस प्रकरणमें आत्माके गुणकी व्याप्तिविषयक कोई बात ही नहीं कही गयी है। तथा गन्ध, प्रदीप आदिका दृष्टान्त देकर जो गुणके द्वारा आत्माके चैतन्यकी व्याप्ति बतायी है, वह भी युक्तिसङ्गत नहीं है; क्योंकि श्रुतिमे आत्माको चैतन्यगुणविशिष्ट नहीं माना गया है, बल्कि परमेश्वरकी भाँति सत्, चेतन और आनन्द—ये उसके स्वरूपभूत लक्षण माने गये हैं। अतः जीवात्माको अणु मानना किसी प्रकार भी उचित नहीं है। सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि यदि इस प्रकार बुद्धि आदिके गुणोंके संयोगसे आत्माको अङ्गुष्ठमात्र तथा एकदेशी माना जायगा, स्वरूपसे नहीं, तब तो जब प्रलयकालमें आत्माके साथ बुद्धि आदिका सम्बन्ध नहीं रहेगा, उस समय समस्त जीवोंकी मुक्ति हो जायगी। अतः प्रलयके बाद सृष्टि भी नहीं हो सकेगी। यदि मुक्त जीवोंका पुनः उत्पन्न होना मान लिया जाय तो मुक्तिके अभावका प्रसङ्ग उपस्थित होगा, इसपर कहते हैं— यावदात्मभावित्वाच्च न दोषस्तद्दर्शनात् ॥ २ । ३ । ३० ॥ यावदात्मभावित्वात् = जबतक स्थूल, सूक्ष्म या कारण—इनमेंसे किसी भी शरीरके साथ जीवात्माका सम्बन्ध रहता है, तबतक वह उस शरीरके अनुरूप, एकदेशी-सा रहता है, इसलिये; च=भी; दोषः=उक्त दोष; न=नहीं है; तद्दर्शनात् = श्रुतिमे भी ऐसा ही देखा गया है। व्याख्या—श्रुतिमें कहा गया है कि जीवका एक शरीरसे दूसरेमे जाते समय भी सूक्ष्म शरीरसे सम्बन्ध बना रहता है (प्र० उ० ३ । ९, १०)। परलोकमें भी उसका शरीरसे सम्बन्ध माना गया है तथा सुषुप्ति और स्वप्नकालमें भी देहके साथ उसका सम्बन्ध बताया गया है (प्र० उ० ४ । २, ५)। * इसी प्रकार प्रलयकालमें भी
- तस्मै स होवाच । यथा गार्ग्य मरीचयोऽर्कस्यास्तं गच्छतः सर्वा एतस्मिंस्तेजो- मण्डल एकीभवन्ति ताः पुनः पुनरुदयतः प्रचरन्त्येवं ह वै तत्सर्वं परे देवे मनस्येकी- भवति। तेन तर्ह्येष पुरुषो न शृणोति न पश्यति न जिघ्रति न रसयते न स्पृशते नाभिवदते नादत्ते नानन्दयते न विसृजते नेयायते स्वपितीत्याचक्षते ।'
सूत्र ३०-३१ ] अध्याय २ १७९
सूत्र ३०-३१ ] अध्याय २ १७९ कर्मसंस्कारोंके सहित कारणशरीरसे जीवात्माका सम्बन्ध रहता है; क्योंकि श्रुतिमें यह बात स्पष्ट कही है कि प्रलयकालमें यह विज्ञानात्मा समस्त इन्द्रियोंके सहित उस परब्रह्ममें स्थित होता है ( प्र० उ० ४ । ११ ), * इसलिये सुषुप्ति और प्रलयकाल- में समस्त जीवोंके मुक्त होनेका तथा मुक्त पुरुषोंके पुनर्जन्म आदिका कोई दोष नहीं आ सकता । सम्बन्ध-प्रलयकालमें तो समस्त जगत् परमात्मामें विलीन हो जाता है, वहाँ बुद्धि आदि तत्त्वोंकी भी परमात्मासे भिन्न सत्ता नहीं रहती, इस स्थितिमें बुद्धि आदिके समुदायरूप सूक्ष्म या कारण-शरीरके साथ जीवात्माका सम्बन्ध कैसे रह सकता है ? और यदि उस समय नहीं रहता है तो सृष्टिकालमें कैसे सम्बन्ध हो जाता है ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— पुंस्त्वादिवत्त्वस्य सतोऽभिव्यक्तियोगात् ॥ २ । ३ । ३१ ॥ पुंस्त्वादिवत्=पुरुषत्व आदिकी भाँति; सतः=पहलेसे विद्यमान; अस्य= 'उससे उन सुप्रसिद्ध महर्षि पिप्पलादने कहा—गार्ग्य ! जिस प्रकार अस्त होते हुए सूर्यकी सब किरणें इस तेजोमण्डलमें एक हो जाती हैं; फिर उदय होनेपर वे सब पुनः-पुनः सब ओर फैलती रहती हैं। ठीक ऐसे ही (निद्राके समय) वे सब इन्द्रियाँ भी परमदेव मनमें एक हो जाती हैं; इस कारण उस समय यह जीवात्मा न तो सुनता है, न देखता है, न सूँघता है, न स्वाद लेता है, न स्पर्श करता है, न बोलता है, न ग्रहण करता है, न मैथुनका आनन्द भोगता है, न मल-मूत्रका त्याग करता है और न चलता ही है। उस समय 'वह सो रहा है' ऐसा लोग कहते हैं।' अत्रैष देवः स्वप्ने महिमानमनुभवति । यद् दृष्टं दृष्टमनुपश्यति श्रुतं श्रुतमेवार्थमनु शृणोति । देशदिगन्तरैश्च प्रत्यनुभूतं पुनः पुनः प्रत्यनुभवति । दृष्टं चादृष्टं च श्रुतं चाश्रुतं चानुभूतं चाननुभूतं च सच्चासच्व सर्वं पश्यति सर्वः पश्यति । 'इस स्वप्नावस्थामें यह जीवात्मा अपनी विभूतिका अनुभव करता है; जो बार-बार देखा हुआ है, उसीको बार-बार देखता है। बार-बार सुनी हुई बातको पुनः-पुनः सुनता है। नाना देश और दिशाओंमें बार बार अनुभव किये हुए विषयोंको पुनः-पुनः अनुभव करता है। इतना ही नहीं, देखे और न देखे हुएको भी, सुने हुए और न सुने हुएको भी, अनुभव किये हुए और अनुभव न किये हुएको भी तथा विद्यमान और अविद्यमान- को भी देखता है; इस प्रकार वह सारी घटनाओंको देखता है और सब कुछ स्वयं बनकर देखता है।'
- विज्ञानात्मा सह देवैश्च सर्वैः प्राणा भूतानि संप्रतिष्ठन्ति यत्र । तदक्षरं वेदयते यस्तु सोम्य स सर्वज्ञः सर्वमेवाविवेशेति ॥
१८० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ शरीरादि सम्बन्धका; तु=ही; अभिव्यक्तियोगात्=सृष्टिकाळमें प्रकट होनेका योग है, इसलिये ( कोई दोष. नहीं है ) । व्याख्या-प्रलयकाळमें यद्यपि बुद्धि आदि तत्त्व स्थूलरूपमे न रहकर अपने कारणरूप परंब्रह्म परमेश्वरमें विलीन हो जाते हैं, तथापि भगवान्की अचिन्त्य शक्तिके रूपमें वे अव्यक्तरूपसे सब-के-सब विद्यमान रहते हैं । तथा सब जीवात्मा भी अपने-अपने कर्मसंस्काररूप कारण-शरीरोंके सहित अव्यक्तरूपसे उस परब्रह्म परमेश्वरमे विलीन रहते हैं ( प्र० उ० ४ । ११ ) ।* उनका सर्वथा नाश नहीं होता । अतः सृष्टिकालमें उस परब्रह्म परमात्माके संकल्पसे वे उसी प्रकार सूक्ष्म और स्थूल रूपोंमें प्रकट हो जाते हैं; जैसे बीजरूपमे पहलेसे ही विद्यमान पुरुषत्व बाल्यकालमें प्रकट नहीं होता, किन्तु युवावस्थामें शक्तिके संयोगसे प्रकट हो जाता है । यही बात बीज-वृक्षके सम्बन्धमे भी समझी जा सकती है । ( गीता अध्याय १४ श्लोक ३ और ४ में यही बात स्पष्ट की गयी है ) इसलिये कोई विरोध नहीं है । जिस साधकका अन्तःकरण साधनाके द्वारा जितना शुद्ध और व्यापक होता है, वह उतना ही विशाल हो जाता है । यही कारण है कि योगीमें दूर देशकी बात जानने आदिकी सामर्थ्य आ जाती है; क्योकि जीवात्मा तो पहलेसे सर्वत्र व्याप्त है ही, अन्तःकरण और स्थूल शरीरके सम्बन्धसे ही वह उसके अनुरूप आकारवाला हो रहा है । सम्बन्ध-जीवात्मा तो स्वयंप्रकाशस्वरूप है, उसे मन, बुद्धिके सम्बन्धसे वस्तुका ज्ञान होता है, यह माननेकी क्या आवश्यकता है ? इस जिज्ञासापर कहते हैं- नित्योपलब्ध्यनुपलब्धिप्रसङ्गोऽन्यतरनियमो वान्यथा ॥ २ । ३ । ३२ ॥ अन्यथा=जीवको अन्तःकरणके सम्बन्धसे विषय-ज्ञान होता है, ऐसा न माननेपर; नित्योपलब्ध्यनुपलब्धिप्रसङ्गः=उसे सदा ही विषयोंके अनुभव होनेका या कभी भी न होनेका प्रसङ्ग उपस्थित होगा; वा=अथवा; अन्यतरनियमः= आत्माकी ग्राहकता-शक्ति या विषयकी ग्राह्यता-शक्तिके नियमन ( प्रतिबन्ध ) की ॐ यह मन्त्र पूर्वसूत्रकी टिप्पणीमें आ गया है ।
सूत्र ३२] अध्याय २ १८१
सूत्र ३२] अध्याय २ १८१ कल्पना करनी पड़ेगी (ऐसी दशामें अन्तःकरणका सम्बन्ध मानना ही युक्ति- सङ्गत है)। व्याख्या-यदि यह नहीं माना जाय कि यह जीवात्मा अन्तःकरणके सम्बन्ध- से समस्त वस्तुओका अनुभव करता है तो प्रत्यक्षमे जो यह देखा जाता है कि यह जीवात्मा कभी किसी वस्तुका अनुभव करता है और कभी नहीं करता, इसकी सिद्धि नहीं होगी; क्योकि इसको यदि प्रकाशस्वरूप होनेके कारण स्वतः अनुभव करनेवाला मानेंगे, तब तो इसे सदैव एक साथ प्रत्येक वस्तुका ज्ञान रहता है, ऐसा मानना पड़ेगा। यदि इसमे जाननेकी शक्ति स्वाभाविक नहीं मानेगे तो कभी नहीं जाननेका प्रसङ्ग आ जायगा। अथवा दोनोंमेंसे किसी एककी शक्तिका नियमन (सङ्कोच) मानना पड़ेगा। अर्थात् या तो यह स्वीकार करना पड़ेगा कि किसी निमित्तसे जीवात्माकी ग्राहकशक्तिका प्रतिबन्ध होता है या यह मानना पड़ेगा कि विषयकी ग्राह्यता-शक्तिमें किसी कारणवश प्रतिबन्ध आ जाता है। प्रतिबन्ध हट जानेपर विषयकी उपलब्धि होती है और उसके रहनेपर विषयो- पलब्धि नहीं होती। परन्तु यह गौरवपूर्ण कल्पना करनेकी अपेक्षा अन्तःकरणके सम्बन्धको स्वीकार कर लेनेमें ही लाघव है। इसलिये यही मानना ठीक है कि अन्तःकरणके सम्बन्धसे ही जीवात्माको समस्त लौकिक पदार्थोंका अनुभव होता है। 'मनसा ह्येव पश्यति मनसा शृणोति' (बृह० उ० १ । ५ । ३) अर्थात् 'मनसे ही देखता है, मनसे सुनता है' इत्यादि मन्त्र-वाक्योंद्वारा श्रुति भी अन्तः- करणके सम्बन्धको स्वीकार करती है। जीवात्माका अन्तःकरणसे सम्बन्ध रहते हुए भी वह कभी तो कार्यरूपमें प्रकट रहता है और कभी कारणरूपसे अप्रकट रहता है। इस प्रकार यहाँतक यह बात सिद्ध हो गयी कि जीवात्माको जो अणु कहा गया है, वह उसकी सूक्ष्मताका बोधक है, न कि एकदेशिता (छोटेपन) का; और उसको जो अङ्गुष्ठमात्र कहा गया है, वह मनुष्य-शरीरके हृदयके मापके अनुसार कहा गया है तथा उसे जो छोटे आकारवाला बताया गया है, वह भी सङ्कीर्ण अन्तःकरणके सम्बन्धसे है, वास्तवमें वह विभु (समस्त जड पदार्थोंमें व्याप्त) और अनन्त (देश-कालकी सीमासे अतीत) है। सम्बन्ध-सांख्यमतमें जड प्रकृतिको स्वतन्त्र कर्ता माना गया है और पुरुषको असङ्ग माना गया है; किन्तु जड प्रकृतिको स्वभावसे कर्ता मानना युक्ति- सङ्गत नहीं है तथा पुरुष असङ्ग होनेसे उसको भी कर्ता मानना नहीं बन
१८२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ सकता । अतः यह निश्चय करनेके लिये कि कर्ता कौन है, अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है । वहाँ गौणरूपसे 'जीवात्मा कर्ता है' यह बात सिद्ध करनेके लिये सूत्रकार कहते हैं— कर्ता शास्त्रार्थवत्त्वात् ॥ २ । ३ । ३३ ॥ कर्ता=कर्ता जीवात्मा है; शास्त्रार्थवत्त्वात्=क्योंकि विधि-निषेधबोधक शास्त्रकी इसीमें सार्थकता है । व्याख्या—श्रुतियोंमे जो बार-बार यह कहा गया है कि अमुक काम करना चाहिये, अमुक नहीं करना चाहिये । अमुक शुभकर्म करनेवालेको अमुक श्रेष्ठ फल मिलता है, अमुक पापकर्म करनेवालेको अमुक दुःख भोग करना पड़ता है, इत्यादि; यह जो शास्त्रका कथन है, वह किसी चेतनको कर्ता न माननेसे और जड प्रकृतिको कर्ता माननेसे भी व्यर्थ होता है; किन्तु शास्त्र-वचन कभी व्यर्थ नहीं हो सकता । इसलिये जीवात्माको ही समस्त कर्मोंका कर्ता मानना उचित है । इसके सिवा, श्रुति स्पष्ट शब्दोंमें जीवात्माको कर्ता बतलाती है; ( प्र० उ० ४ । ९ ) यहाँ यह ध्यानमें रखना चाहिये कि अनादिकालसे जो जीवात्माका कारण- शरीरके साथ सम्बन्ध है, उसीसे जीवको कर्ता माना गया है, स्वरूपसे वह कर्ता नहीं है; क्योकि श्रुतिमें उसका स्वरूप निष्क्रिय बताया गया है । ( श्वेता० ६ । १२ ) यह बात इस प्रकरणके अन्तमे सिद्ध की गयी है । सम्बन्ध—जीवात्माके कर्ता होनेमें दूसरा हेतु बताया जाता है— विहारोपदेशात् ॥ २ । ३ । ३४ ॥ विहारोपदेशात्=स्वप्नमें स्वेच्छासे विहार करनेका वर्णन होनेसे भी ( यह सिद्ध होता है कि जीवात्मा 'कर्ता' है ) । व्याख्या—शास्त्रके विधि-निषेधके सिवां, यह स्वप्नावस्थामें स्वेच्छापूर्वक घूमना- फिरना, खेल-तमाशा करना आदि कर्म करता है, ऐसा वर्णन है ( बृह० उ० ४ । ३ । १३; २ । १ । १८ ) इसलिये भी यह सिद्ध होता है कि जीवात्मा कर्ता है, जड प्रकृतिमें स्वेच्छापूर्वक कर्म करना नहीं बनता । सम्बन्ध—तीसरा कारण बताते हैं— उपादानात् ॥ २ । ३ । ३५ ॥
सूत्र ३३—३६ ] अध्याय २ १८३
सूत्र ३३—३६ ] अध्याय २ १८३ उपादानात्=इन्द्रियोंको ग्रहण करके विचरनेका वर्णन होनेसे (भी यही सिद्ध होता है कि इन्द्रिय आदिके सम्बन्धसे जीवात्मा 'कर्ता' है)। व्याख्या—यहाँ 'उपादान' शब्द उपादान कारणका वाचक नहीं; किन्तु 'ग्रहण' रूप क्रियाका बोधक है। श्रुतिमें कहा है कि--'स यथा महाराजो जान- पदान् गृहीत्वा स्वे जनपदे यथाकामं परिवर्तेतैवमेवैष एतत्प्राणान् गृहीत्वा स्वे शरीरे यथाकामं परिवर्तते ॥' (बृह० उ० २।१।१८) अर्थात् 'जिस प्रकार कोई महाराज प्रजाजनोंको साथ लेकर अपने देशमें इच्छानुसार भ्रमण करता है, वैसे ही यह जीवात्मा स्वप्नावस्थामे प्राणशब्दवाच्य इन्द्रियोंको ग्रहण करके इस शरीरमे इच्छानुसार विचरता है। इस प्रकार इन्द्रियोंके द्वारा कर्म करनेका वर्णन होनेसे यह सिद्ध होता है कि प्रकृति या इन्द्रियों स्वतन्त्र 'कर्ता' नहीं हैं; उनसे युक्त हुआ जीवात्मा ही कर्ता है (गीता १५।७, ९)। सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे जीवात्माका कर्तापन सिद्ध करते हैं— व्यपदेशाच्च क्रियायां न चेन्निर्देश- विपर्ययः ॥ २।३।३६॥ क्रियायाम्=क्रिया करनेमे; व्यपदेशात्=जीवात्माके कर्तापनका श्रुतिमें कथन है, इसलिये; च=भी (जीवात्मा कर्ता है); चेत्=यदि; न=जीवात्माको कर्ता बताना अभीष्ट न होता तो; निर्देशविपर्ययः=श्रुतिका सङ्केत उसके विपरीत होता। व्याख्या—श्रुतिमें कहा है कि 'विज्ञानं यज्ञं तनुते कर्माणि तनुतेऽपि च।' (तै० उ० २।५) अर्थात् 'यह जीवात्मा यज्ञका विस्तार करता है और उसके लिये कर्मोंका विस्तार करता है।' इस प्रकार जीवात्माको कर्मोंका विस्तार करनेवाला कहा जानेके कारण उसका कर्तापन सिद्ध होता है। यदि कहो 'विज्ञान' शब्द बुद्धिका वाचक है, अतः यहाँ बुद्धिको ही कर्ता बताया गया है तो यह कहना उस प्रसङ्गके विपरीत होगा; क्योंकि वहाँ विज्ञानमयके नामसे जीवात्माका ही प्रकरण है। यदि 'विज्ञान' नामसे बुद्धिको ग्रहण करना अभीष्ट होता तो मन्त्रमें 'विज्ञान' शब्दके साथ प्रथमा विभक्तिका प्रयोग न होकर करणद्योतक तृतीया विभक्तिका प्रयोग होता। सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि जीव यदि स्वतन्त्र कर्ता है, तब तो इसे अपने हितका ही काम करना चाहिये, अनिष्टकार्यमें इसकी
१८४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ प्रवृत्ति नहीं होनी चाहिये; किन्तु ऐसा नहीं देखा जाता, इसका क्या कारण है ? इसपर कहते हैं— उपलब्धिवदनियमः ॥ २ । ३ । ३७ ॥ उपलब्धिवत्=सुख-दुःखादि भोगोंकी प्राप्तिकी भाँति; अनियमः=कर्म करनेमें भी नियम नहीं है । व्याख्या—जिस प्रकार इस जीवात्माको सुख-दुःख आदि भोगोंकी प्राप्ति होती है, उसमें यह निश्चित नियम नहीं है कि उसे अनुकूल-ही-अनुकूल भोग प्राप्त हो, प्रतिकूल न हो; इसी प्रकार कर्म करनेमें भी यह नियम नहीं है कि वह अपने हितकारक ही कर्म करे, अहितकारक न करे । यदि कहो कि फलभोगमें तो जीव प्रारब्धके कारण स्वतन्त्र नहीं है, उसके प्रारब्धानुसार परमेश्वरके विधानसे जैसे भोगोंका मिलना उचित होता है, वैसे भोग मिलते हैं; परन्तु नये कर्मोंके करनेमें तो वह स्वतन्त्र है, फिर अहितकर कर्ममें प्रवृत्त होना कैसे उचित है, तो इसका उत्तर यह है कि वह जिस प्रकार फल भोगनेमें प्रारब्धके अधीन है, वैसे ही नये कर्म करनेमें अनादिकालसे सञ्चित कर्मोंके अनुसार जो जीवात्माका स्वभाव बना हुआ है, उसके अधीन है; इसलिये यह सर्वथा हितमें ही प्रयुक्त हो, ऐसा नियम नहीं हो सकता । अतः कोई विरोध नहीं है । भगवान्का आश्रय लेकर यदि यह अपने स्वभावको सुधारनेमें लग जाय तो उसका सुधार कर सकता है । उसका पूर्णतया सुधार हो जानेपर अहितकारक कर्मोंमें होनेवाली प्रवृत्ति बंद हो सकती है । सम्बन्ध—उपर्युक्त कथनकी पुष्टिके लिये दूसरा हेतु प्रस्तुत करते हैं— शक्तिविपर्ययात् ॥ २ । ३ । ३८ ॥ शक्तिविपर्ययात्=शक्तिका विपर्यय होनेके कारण भी ( उसके द्वारा सर्वथा हिताचरण होनेका नियम नहीं हो सकता ) । व्याख्या—जीवात्माका जो कर्त्तापन है, वह स्वरूपसे नहीं है; किन्तु अनादि कर्मसंस्कार तथा इन्द्रियों और शरीर आदिके सम्बन्धसे है यह बात पहले बता आये हैं। इसलिये वह नियमितरूपसे अपने हितका आचरण नहीं कर सकता; क्योंकि प्रत्येक काम करनेमें सहकारी कारणोंकी और बाह्य सामग्रीकी आवश्यकता होती है; उन सबकी उपलब्धिमें यह सर्वथा परतन्त्र है। एवं अन्तःकरणकी, इन्द्रियोंकी और शरीरकी शक्ति भी कभी अनुकूल हो जाती है और कभी प्रतिकूल हो जाती है । इस प्रकार
सूत्र ३७—४० ] अध्याय २ १८५
सूत्र ३७—४० ] अध्याय २ १८५ शक्तिका विपर्यय होनेके कारण भी जीवात्मा अपने हितका आचरण करनेमे सर्वथा स्वतन्त्र नहीं है । सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि यदि जीवात्माका कर्तापन उसमें स्वरूपसे ही मान लिया जाय तो क्या हानि है ? इसपर कहते हैं— समाध्यभावाच्च ॥ २ । ३ । ३९ ॥ समाध्यभावात् = समाधि-अवस्थाका अभाव प्राप्त होनेसे; च = भी ( जीवात्माका कर्तापन स्वाभाविक नहीं मानना चाहिये ) । व्याख्या—समाधि-अवस्थामें कर्मोंका सर्वथा अभाव हो जाता है। यदि जीवमें कर्तापन उसका स्वाभाविक धर्म मान लिया जायगा तो समाधि-अवस्थाका होना सिद्ध नहीं होगा; क्योंकि जिस प्रकार जीवात्मामें चेतनता स्वरूपगत धर्म है, उसी प्रकार यदि कर्म भी हो तो वह कभी भी निष्क्रिय नहीं हो सकता; किन्तु वास्तवमें ऐसी बात नहीं है; जीवात्माका स्वरूप निष्क्रिय माना गया है, ( श्वेता० ६ । १२ ) अतः उसमे जो कर्तापन है, वह अनादिसिद्ध अन्तःकरण आदिके सम्बन्धसे है, स्वरूपगत नहीं है । सम्बन्ध—इस बातको दृढ़ करनेके लिये फिर कहा जाता है— यथा च तक्षोभयथा ॥ २ । ३ । ४० ॥ च=इसके सिवा; यथा=जैसे; तक्षा=कारीगर; उभयथा=कभी कर्म करता है, कभी नहीं करता, ऐसे दो प्रकारकी स्थितिमें देखा जाता है ( उसी प्रकार जीवात्मा भी दोनों प्रकारकी स्थितिमें रहता है, इसलिये उसका कर्तापन स्वरूपगत नहीं है ) । व्याख्या—जिस प्रकार रथ आदि वस्तुओंको बनानेवाला कारीगर जब अपने सहकारी नाना प्रकारके हथियारोंसे सम्पन्न होकर कार्यमें प्रवृत्त होता है, तब तो वह उस कार्यका कर्ता है और जब हथियारोंको अलग रखकर चुपचाप बैठ जाता है, तब उस क्रियाका कर्ता नहीं है । इस प्रकार यह जीवात्मा भी जब अन्तःकरण और इन्द्रियोंका अधिष्ठाता होता है, तब तो उनके द्वारा किये जानेवाले कर्मोंका वह कर्ता है और जब उनसे सम्बन्ध छोड़ देता है, तब कर्ता नहीं है । अतः जीवात्माका कर्तापन स्वभावसिद्ध नहीं है । इसके सिवा, यदि जीवात्माको स्वरूपसे कर्ता मान लिया जाय तो श्रीमद्भगवद्गीतादिका निम्नलिखित वर्णन सर्वथा असङ्गत ठहरेगा—
१८६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः । अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते ॥ 'हे अर्जुन ! वास्तवमें सम्पूर्ण कर्म प्रकृतिके गुणोंद्वारा किये हुए है, तो भी अहङ्कारसे मोहित हुए अन्तःकरणवाला पुरुष 'मै कर्ता हूँ' ऐसे मान लेता है।' (गी० ३।२७) नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् । पश्यञ्शृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपञ्श्वसन् ॥ प्रलपन्विसृजन् गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि । इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन् ॥ 'हे अर्जुन ! तत्त्वको जाननेवाला सांख्ययोगी तो देखता हुआ, सुनता हुआ, स्पर्श करता हुआ, सूँघता हुआ, भोजन करता हुआ, गमन करता हुआ, सोता हुआ, श्वास लेता हुआ, बोलता हुआ, त्यागता हुआ, ग्रहण करता हुआ तथा आँखोंको खोलता और मीचता हुआ भी सब इन्द्रियाँ अपने-अपने अर्थोंमे बर्त रही हैं, इस प्रकार समझता हुआ, निःसन्देह ऐसे माने कि मै कुछ भी नहीं करता हूँ।' ( गी० ५ । ८-९ ) प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः । यः पश्यति तथात्मानमकर्तारं स पश्यति ॥ 'जो पुरुष सम्पूर्ण कर्मोंको सब प्रकारसे प्रकृतिसे ही किये हुए देखता है अर्थात् इस बातको तत्त्वसे समझ लेता है कि प्रकृतिसे उत्पन्न हुए सम्पूर्ण गुण ही गुणोंमें बर्तते हैं तथा आत्माको अकर्ता देखता है, वही देखता है।' ( गी० १३ । २९ ) इसी प्रकार भगवद्गीतामें जगह-जगह जीवात्मामें कर्तापनका निषेध किया है, इससे यही सिद्ध होता है कि जीवात्माका कर्तापन अन्तःकरण और संस्कारोंके सम्बन्धसे है, केवल शुद्ध आत्मामें कर्तापन नहीं है ( गीता १८ । १६ ) । सम्बन्ध—पूर्वसूत्रोंसे यह निश्चय किया गया कि प्रकृति स्वतन्त्र कर्ता नहीं है तथा जीवात्माका जो कर्तापन है वह भी बुद्धि, मन और इन्द्रिय आदिके सम्बन्धसे है, स्वभावसे नहीं है, इस कारण यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि उपर्युक्त जीवात्माका कर्तापन स्वाधीन है या पराधीन, इसपर कहते हैं— परात्तु तच्छ्रुतेः ॥ २ । ३ । ४१ ॥ तत्=वह जीवात्माका कर्तापन; परात्=परमेश्वरसे; तु=ही है; श्रुतेः=क्योंकि श्रुतिके वर्णनसे यही सिद्ध होता है ।
सूत्र ४१ ] अध्याय २ १८७
सूत्र ४१ ] अध्याय २ १८७ व्याख्या—वृहदारण्यकमें कहा है कि 'जो जीवात्मामे रहकर उसका नियमन करता है, वह अन्तर्यामी तेरा आत्मा है' ( ३ । ७ । २२ ), छान्दोग्यमे कहा है कि 'मै इस जीवात्माके सहित प्रविष्ट होकर नामरूपको प्रकट करूँगा।' ( ६ । ३ । २ ) तथा केनोपनिषद्में जो यक्षकी आख्यायिका है, उसमे भी यह सिद्ध किया गया है कि 'अग्नि और वायु आदि देवताओमे अपना कार्य करनेकी स्वतन्त्र शक्ति नहीं है, उस परब्रह्मसे शक्ति पाकर ही वे अपना-अपना कार्य करनेमे समर्थ होते है ।' ( ३ । १—१० ) इत्यादि । श्रुतियोके इस वर्णनसे यही सिद्ध होता है कि जीवात्मा स्वतन्त्रतापूर्वक कुछ भी नहीं कर सकता, वह जो कुछ करता है, परब्रह्म परमेश्वरके सहयोगसे, उसकी दी हुई शक्तिके द्वारा ही करता है। जीवका कर्तापन ईश्वराधीन है, यह बात गीतामें स्पष्ट कही गयी है— ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति । भ्रामयन् सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ॥ 'हे अर्जुन ! शरीररूपी यन्त्रमें आरूढ़ हुए सब प्राणियोंको अपनी मायासे गुणोंके अनुसार चलाता हुआ ईश्वर सबके हृदयमे निवास करता है ।' ( गी० १८ । ६१ ) विष्णुपुराणमें जहाँ प्रह्लादका प्रसङ्ग आया है, वहाँ प्रह्लादने अपने पितासे कहा है—'पिताजी ! वे भगवान् विष्णु केवल मेरे ही हृदयमे नहीं हैं, अपितु समस्त लोकोंको सब ओरसे व्याप्त करके स्थित हो रहे हैं, वे ही सर्वव्यापी परमेश्वर मुझे और आपके सहित अन्य सब प्राणियोंको भी समस्त चेष्टाओंमें नियुक्त करते हैं ।' (विष्णु० १ । १७ । २६)*। इससे भी यह सिद्ध होता है कि जीवात्माका कर्तापन सर्वथा ईश्वराधीन है। यह जो कुछ करता है, उसीकी दी हुई शक्तिसे करता है, तथापि अभिमानवश अपनेको कर्ता मानकर फँस जाता है ( गीता ३ । २७ ) । सम्बन्ध—पूर्वसूत्रमें जीवात्माका कर्तापन ईश्वराधीन बताया गया, इसे सुनकर यह जिज्ञासा होती है कि ईश्वर पहले तो जीवोंसे शुभाशुभ कर्म करवाता
- न केवलं मद्धृदयं स विष्णुराक्रम्य लोकानखिलानवस्थितः । स मां त्वदादींश्च पितः समस्तान् समस्तचेष्टासु युनक्ति सर्वगः ॥
३८८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ है और फिर उसका फल-भोग करवाता है, यह माननेसे ईश्वरमें विषमता और निर्दयताका दोष आयेगा, उसका निराकरण कैसे होगा, इसपर कहते हैं— कृतप्रयत्नापेक्षस्तु विहितप्रतिषिद्धावैयर्थ्या- दिभ्यः ॥ २ । ३ । ४२ ॥ तु=किन्तु; कृतप्रयत्नापेक्षः=ईश्वर जीवके पूर्वकृत कर्म-संस्कारोंकी अपेक्षा रखते हुए ही उसको नवीन कर्मोंमें नियुक्त करता है, इसलिये तथा; विहितप्रति- षिद्धावैयर्थ्यादिभ्यः=विधि-निषेध शास्त्रकी सार्थकता आदि हेतुओसे भी ईश्वर सर्वथा निर्दोष है । व्याख्या—ईश्वरद्वारा जो जीवात्माको नवीन कर्म करनेकी शक्ति देकर उसे नवीन कर्मोंमें नियुक्त किया जाता है, वह उस जीवात्माके जन्म-जन्मान्तरमे सञ्चित किये हुए कर्म-संस्कारसे उत्पन्न स्वभावकी अपेक्षासे ही किया जाता है, बिना अपेक्षाके नहीं । इसलिये ईश्वर सर्वथा निर्दोष है तथा ऐसा करनेसे ही शास्त्रोंमें अच्छे काम करनेके लिये कहे हुए विधि-वाक्योंकी और पापाचरण न करनेके लिये कहे हुए निषेध-वाक्योंकी सार्थकता सिद्ध होती है । तथा ईश्वरने जीवको अपने स्वभावका सुधार करनेके लिये जो स्वतन्त्रता प्रदान की है, वह भी सार्थक होती है । इसलिये ईश्वरका यह कर्म न्याय ही है । इसी भावको स्पष्ट करनेके लिये गीतामे भगवान्ने कहा है कि— स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा । कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत् ॥ 'हे कुन्तीपुत्र ! अपने जन्म-जन्मान्तरके कर्मसंस्काररूप स्वभावजनित कर्मोंद्वारा बँधा हुआ तू जिस कामको नहीं करना चाहता उसे भी परवश हुआ अवश्य करेगा ।' ( गी० १८ । ६० ) इसके बाद ही यह भी कहा है कि 'सबके हृदयमे स्थित परमेश्वर सबसे चेष्टा कराता है ।' इससे भी यही सिद्ध होता है कि परब्रह्म परमेश्वर जीवोद्वारा जन्म-जन्मान्तरमें किये हुए कर्मोंकी अपेक्षासे ही उनको कर्म करनेकी शक्ति आदि प्रदान करके स्वाभाविक स्वधर्मरूप नवीन कर्मोंमें नियुक्त करते हैं । इसलिये ईश्वर सर्वथा निर्दोष हैं । सम्बन्ध—पूर्वप्रकरणमें यह सिद्ध किया गया कि जीवात्मा कर्ता है और
सूत्र ४२-४३ ] अध्याय २ १८९
सूत्र ४२-४३ ] अध्याय २ १८९ परमेश्वर उसको कर्मोंमें नियुक्त करनेवाला है, इससे जीवात्मा और परमात्माका भेद सिद्ध होता है। श्रुतियोंमें भी जगह-जगह भेदका प्रतिपादन किया गया है (श्वेता० उ० ४।६-७) परन्तु कहीं-कहीं अभेदका भी प्रतिपादन है (बृह० उ० ४।४।५) तथा समस्त जगत्का कारण एक परब्रह्म परमेश्वर ही बताया गया है, इससे भी अभेद सिद्ध होता है। अतः उक्त विरोधका निराकरण करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है— अंशो नानाव्यपदेशादन्यथा चापि दाशकितवादित्व- मधीयत एके ॥ २ । ३ । ४३ ॥ नानाव्यपदेशात् = श्रुतिमें जीवोंको बहुत और अलग-अलग बताया गया है, इसलिये; च=तथा; अन्यथा=दूसरे प्रकारसे; अपि=भी; (यही सिद्ध होता है कि) अंशः =जीव ईश्वरका अंश है; एके=क्योंकि एक शाखावाले; दाशकित- वादित्वम्=ब्रह्मको दाशकितव आदिरूप कहकर; अधीयते=अध्ययन करते हैं। व्याख्या—श्वेताश्वतरोपनिषद् (६।१२-१३) में कहा है कि— एको वशी निष्क्रियाणां बहूनामेकं बीजं बहुधा यः करोति । तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम् ॥ नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानामेको बहूनां यो विदधाति कामान् । तत्कारणं सांख्ययोगाधिगम्यं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ॥ ‘बहुत-से निष्क्रिय जीवोंपर शासन करनेवाला जो एक परमेश्वर एक बीज (अपनी प्रकृति)को अनेक प्रकारसे विस्तृत करता है, उस अपने हृदयमें स्थित परमेश्वरको जो ज्ञानीजन निरन्तर देखते हैं, उन्हींको सदा रहनेवाला सुख मिलता है, दूसरोंको नहीं। जो एक नित्य चेतन परब्रह्म परमेश्वर बहुत-से नित्य चेतन जीवोंके कर्मफलभोगोंका विधान करता है, वही सबका कारण है, उस ज्ञानयोग और कर्मयोगद्वारा प्राप्त किये जानेयोग्य परमदेव परमेश्वरको जानकर जीवात्मा समस्त बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है।’ इस प्रकार श्रुतिमें जीवोंके नानात्वका प्रतिपादन किया गया है; साथ ही उसको नित्य और चेतन भी कहा गया है और ईश्वरको जगत्का कारण बताया गया है। इससे यह सिद्ध होता है कि जीवगण परमेश्वरके अंश हैं। केवल इतनेसे ही नहीं, प्रकारान्तरसे भी जीवगण ईश्वरके अंश
१९० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ सिद्ध होते हैं; क्योंकि अथर्ववेदकी शाखावालोके ब्रह्मसूक्तमें यह पाठ है कि 'ब्रह्म दाशा ब्रह्म दासा ब्रह्मैवेमे कितवाः' अर्थात् 'ये केवट ब्रह्म हैं, दास ब्रह्म हैं तथा ये जुआरी भी ब्रह्म ही है ।' इस प्रकार जीवोंके बहुत्व और ब्रह्मरूपताका भी वर्णन होनेसे यही सिद्ध होता है कि जीव ईश्वरके अंश हैं। यदि जीवोंको परमेश्वरका अंश न मानकर सर्वथा भिन्न तत्त्व माना जाय तो जो पूर्वोक्त श्रुतियोंमें ब्रह्मको जगत्का एकमात्र कारण कहा गया है और उन दाश, कितवोंको ब्रह्म कहा गया है, उस कथनमें विरोध आयेगा, इसलिये सर्वथा भिन्न तत्त्व नहीं माना जा सकता । इसलिये अंश मानना ही युक्तिसंगत है, किन्तु जिस प्रकार साकार वस्तुके टुकड़ोंको उसका अंश कहा जाता है, वैसे भी जीवोंको ईश्वरका अंश नहीं कहा जा सकता; क्योंकि अवयवरहित अखण्ड परमेश्वरके खण्ड नहीं हो सकते । अतएव कार्यकारणभावसे ही जीवोंको परमेश्वरका अंश मानना उचित है । तथा वह कार्यकारणभाव भी इसी रूपमें है कि प्रलयकालमें अव्यक्तरूपसे परब्रह्म परमेश्वरमें विलीन रहनेवाले नित्य और चेतन जीव सृष्टिकालमें उसी परमेश्वरसे प्रकट हो जाते हैं और पुनः संहारके समय उन्हींमें उन जीवोंका लय होता है तथा उनके शरीरोंकी उत्पत्ति भी उस ब्रह्मसे ही होती है । यह बात श्रीमद्भगवद्गीतामें इस प्रकार स्पष्ट की गयी है— मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन्गर्भं दधाम्यहम् । संभवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत ॥ सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः संभवन्ति याः । तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता ॥ 'हे अर्जुन ! मेरी महत् ब्रह्मरूप प्रकृति अर्थात् त्रिगुणमयी माया सम्पूर्ण भूतोंकी योनि है अर्थात् गर्भाधानका स्थान है और मैं उस योनिमें चेतनरूप बीजंको स्थापित करता हूँ, उस जड-चेतनके संयोगसे सब भूतोंकी उत्पत्ति होती है । तथा हे अर्जुन ! नाना प्रकारकी सब योनियोंमें जितनी मूर्तियाँ अर्थात् शरीर उत्पन्न होते हैं, उन सबकी त्रिगुणमयी मेरी प्रकृति तो गर्भको धारण करनेवाली माता है और मैं बीजको स्थापित करनेवाला पिता हूँ ।' ( गी० १४ । ३-४ ) इसलिये पिता और सन्तानकी भाँति जीवोंको ईश्वरका अंश मानना ही शास्त्रके कथनानुसार ठीक मालूम होता है और ऐसा होनेसे जीव तथा ब्रह्मका अभेद कहनेवाली श्रुतियोंकी भी सार्थकता हो जाती है ।
सूत्र ४४-४५ अध्याय २ १९१
सूत्र ४४-४५ अध्याय २ १९१ सम्बन्ध—प्रमाणान्तरसे जीवके अंशत्वको सिद्ध करते हैं— मन्त्रवर्णाच्च ॥ २ । ३ । ४४ ॥ मन्त्रवर्णात् = मन्त्रके शब्दोंसे; च = भी (यही बात सिद्ध होती है)। व्याख्या—मन्त्रमे कहा है कि पहले जो कुछ वर्णन किया गया है उतना तो इस परब्रह्म परमेश्वरका महत्त्व है ही; वह परमपुरुष उससे अधिक भी है, समस्त जीव-समुदाय इस परब्रह्मका एक पाद (अंश) है और इसके तीन पाद अमृत- स्वरूप दिव्य (सर्वथा अलौकिक अपने ही विज्ञानानन्दस्वरूपमे) हैं।'* (छा० उ० ३ । १२ । ६) । इस प्रकार मन्त्रके शब्दोंमे स्पष्ट ही समस्त जीवोंको ईश्वरका अंश बताया गया है। इससे भी यही सिद्ध होता है कि जीवगण परमेश्वरके अंश हैं। सम्बन्ध—उसी बातको स्मृतिप्रमाणसे सिद्ध करते हैं— अपि च स्मर्यते ॥ २ । ३ । ४५ ॥ अपि = इसके सिवा; स्मर्यते च = (भगवद्गीता आदिमे) यही स्मरण भी किया गया है। व्याख्या—यह बात केवल मन्त्रमे ही नहीं कही गयी है, अपि तु गीता (१५ । ७) मे साक्षात् भगवान् श्रीकृष्णने भी इसका अनुमोदन किया है— 'ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः ।' 'इस जीवलोकमे यह जीव-समुदाय मेरा ही अंश है।' इसी प्रकार दसवें अध्यायमे अपनी मुख्य-मुख्य विभूतियो अर्थात् अंशसमुदायका वर्णन करके अन्त (१० । ४२) मे कहा है कि— अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन । विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् ॥ 'अर्जुन ! तुझे इस बहुत भेदोंको अलग-अलग जाननेसे क्या प्रयोजन है, तू बस इतना ही समझ ले कि मैं अपनी शक्तिके किसी एक अंशसे इस समस्त जगत्को भलीभाँति धारण किये हुए स्थित हूँ।' दूसरी जगह भी ऐसा ही वर्णन आता है—'हे मैत्रेय ! एक पुरुष जीवात्मा जो कि अविनाशी, शुद्ध, नित्य और सर्वव्यापी है, वह भी सर्वभूतमय विज्ञानानन्दघन परमात्माका अंश ही है।'†
- यह मन्त्र पहले पृष्ठ १६ मे आ गया है। † एकः शुद्धोऽक्षरो नित्यः सर्वव्यापी तथा पुमान् । सोऽप्यंशः सर्वभूतस्य मैत्रेय परमात्मनः ॥ (वि० पु० ६ । ४ । ३६)
१९२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ इस प्रकार स्मृतियोंद्वारा समर्थन किया जानेसे भी यह सिद्ध होता है कि जीवात्मा परमेश्वरका अंश है । सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि यदि जीवात्मा ईश्वरका ही अंश है, तब तो जीवके शुभाशुभ कर्मोंसे और सुख-दुःखादि भोगोंसे ईश्वरका भी सम्बन्ध होता होगा, इसपर कहते हैं— प्रकाशादिवन्नैवं परः ॥ २ । ३ । ४६ ॥ परः=परमेश्वर; एवम्=इस प्रकार जीवात्माके दोषोंसे सम्बद्ध; न=नहीं होता; प्रकाशादिवत्=जिस प्रकार कि प्रकाश आदि अपने अंशके दोषोंसे लिप्त नहीं होते । व्याख्या—जिस प्रकार प्रकाश सूर्य तथा आकाश आदि भी अपने अंश इन्द्रिय आदिके दोषोंसे लिप्त नहीं होते, वैसे ही ईश्वर भी जीवोंके शुभाशुभ कर्म- फलरूप सुख-दुःखादि दोषोंसे लिप्त नहीं होता । श्रुतिमें कहा है— सूर्यो यथा सर्वलोकस्य चक्षुर्न लिप्यते चाक्षुषैर्बाह्यदोषैः । एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा न लिप्यते लोकदुःखेन बाह्यः ॥ 'जिस प्रकार समस्त लोकोंके चक्षुःस्वरूप सूर्यदेव चक्षुमें होनेवाले दोषोंसे लिप्त नहीं होता, वैसे ही समस्त प्राणियोंके अन्तरात्मा अद्वितीय परमेश्वर लोगोंके दुःखोंसे लिप्त नहीं होता ।' ( क० उ० २ । २ । ११ ) सम्बन्ध—इसी बातको स्मृतिप्रमाणसे पुष्ट करते हैं— स्मरन्ति च ॥ २ । ३ । ४७ ॥ स्मरन्ति=यही बात स्मृतिकार कहते हैं; च=और ( श्रुतिमें भी कही गयी है ) । व्याख्या—श्रीमद्भगवद्गीतादिमे भी ऐसा ही वर्णन मिलता है— अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः । शरीरस्थोऽपि कौन्तेय , न करोति न लिप्यते ॥ 'अर्जुन ! यह अविनाशी परमात्मा अनादि और गुणातीत होनेके कारण शरीरमें स्थित हुआ भी न तो स्वयं कर्ता है और न सुख-दुःखादि फलोंसे लिप्त ही होता है ।' ( गीता १३ । ३१ ) इसी प्रकार दूसरी जगह भी कहा है कि 'उन दोनोंमें जो परमात्मा नित्य और निर्गुण कहा गया है, वह जिस प्रकार
सूत्र ४६—४९ ] अध्याय २ १९३
सूत्र ४६—४९ ] अध्याय २ १९३ कमलका पत्ता जलमे रहता हुआ जलसे लिप्त नहीं होता, वैसे ही वह जीवके कर्मफलोसे लिप्त नही होता ( महाभारत शान्तिपर्व ३५१ । १४—१५) । इसी प्रकार श्रुतिमें भी कहा है कि 'उन दोनोंमेंसे एक जीवात्मा तो पीपलके फलोंको अर्थात् कर्मफलरूप सुख-दुःखोंको भोगता है और परमेश्वर न भोगता हुआ देखता रहता है । (मु० उ० ३ । १ । १) इससे भी यही सिद्ध होता है कि परमात्मा किसी प्रकारके दोषोंसे लिप्त नहीं होता । सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि 'जब सभी जीव एक ही परमेश्वरके अंश हैं, तब किसी एकके लिये जिस कामको करनेकी आज्ञा दी जाती है, दूसरे- के लिये उसीका निषेध क्यों किया जाता है ? शास्त्रमें जीवोंके लिये भिन्न-भिन्न आदेश दिये जानेका क्या कारण है ?' इसपर कहते हैं— अनुज्ञापरिहारौ देहसम्बन्धाज्ज्योतिरा- दिवत् ॥ २ । ३ । ४८ ॥ अनुज्ञापरिहारौ=विधि और निषेध; ज्योतिरादिवत्=ज्योति आदिकी भाँति; देहसम्बन्धात्=शरीरोंके सम्बन्धसे हैं। व्याख्या—भिन्न-भिन्न प्रकारके शरीरोंके साथ जीवात्माओंका सम्बन्ध होनेसे उनके लिये अनुज्ञा और निषेधका भेद अनुचित नहीं है । जैसे, श्मशानकी अग्निको त्याज्य और यज्ञकी अग्निको ग्राह्य बताया जाता है तथा जैसे शूद्रको सेवा करने- के लिये आज्ञा दी है और ब्राह्मणके लिये सेवा-वृत्तिका निषेध किया गया है, इसी प्रकार सभी जगह समझ लेना चाहिये । शरीरोंके सम्बन्धसे यथायोग्य भिन्न-भिन्न प्रकारका विधि-निषेधरूप आदेश उचित ही है, इसमें कोई विरोध नहीं है । सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि उक्त प्रकारसे विधि-निषेधकी व्यवस्था होनेपर भी जीवात्माओंको विभु माननेसे उनका और उनके कर्मोंका अलग-अलग विभाग कैसे होगा ? इसपर कहते हैं— असन्ततेश्चाव्यतिकरः ॥ २ । ३ । ४९ ॥ च=इसके सिवा; असन्ततेः =( शरीरोंके आवरणसे ) व्यापकताका निरोध होनेके कारण; अव्यतिकरः =उनका तथा उनके कर्मोंका मिश्रण नहीं होगा । व्याख्या—जिस प्रकार कारणशरीरका आवरण होनेसे सब जीवात्मा विभु होते वे० द० १३—
१९४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ हुए भी प्रलयकालमे एक नहीं हो जाते, उनका विभाग विद्यमान रहता है (ब्र० सू० २ । ३ । ३०) वैसे ही सृष्टिकालमे शरीरोके सम्बन्धसे सब जीवोकी परस्पर व्याप्ति न होनेके कारण उनके कर्मोंका मिश्रण नहीं होता, विभाग बना रहता है; क्योकि शरीर, अन्तःकरण और अनादि कर्मसंस्कार आदिके सम्बन्धसे उनकी व्यापकता परमेश्वरकी भाँति नहीं है, किन्तु सीमित है, अतएव जिस प्रकार शब्दमात्रकी आकाशमे व्याप्ति होते हुए भी प्रत्येक शब्दका परस्पर मिश्रण नहीं होता, उनकी भिन्नता बनी रहती है तभी तो एक ही कालमे भिन्न-भिन्न देशोंमें बोले हुए शब्दोको भिन्न-भिन्न स्थानोमे भिन्न-भिन्न मनुष्य रेडियोंद्वारा अलग-अलग सुन सकते हैं, इसमे कोई अड़चन नहीं आती । उन शब्दोका विभुत्व और अमिश्रण दोनों रह सकते है, वैसे ही आत्माओका भी विभुत्व उनके अमिश्रणमे बाधक नहीं है; क्योकि आत्मतत्त्व तो शब्दकी अपेक्षा अत्यन्त सूक्ष्म है, उसके विभु होते हुए परस्पर मिश्रण न होनेमे तो कहना ही क्या है !' सम्बन्ध—यहाँतक जीवात्मा परमात्माका अंश है तथा वह नित्य और विभु है, इस सिद्धान्तका श्रुति-स्मृतियोंके प्रमाणसे और युक्तियोंद्वारा भी भलीभाँति प्रतिपादन किया गया तथा अंशांशिभावके कारण अभेदप्रतिपादक श्रुतियोंकी भी सार्थकता सिद्ध की गयी । अब जो लोग जीवात्माका स्वरूप अन्य प्रकारसे मानते हैं, उनकी वह मान्यता ठीक नहीं है; इस बातको सिद्ध करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ करते हैं— आभासा एव च ॥ २ । ३ । ५० ॥ च=इसके सिवा; (अन्य प्रकारकी मान्यताके समर्थनमे दिये जानेवाले युक्ति- प्रमाण) आभासाः=आभासमात्र; एव=ही है । व्याख्या—जो लोग जीवात्माको उस परब्रह्मका अंश नहीं मानते, सब जीवो- को अलग-अलग स्वतन्त्र मानते हैं, उन्होंने अपनी मान्यताको सिद्ध करनेके लिये जो युक्ति-प्रमाण दिये हैं, वे सब-के-सब आभासमात्र है; अतः उनका कथन ठीक नहीं है । जीवात्माओको परमात्माका अंश मानना ही युक्तिसङ्गत है; क्योकि ऐसा माननेपर ही समस्त श्रुतियोंके वर्णनकी एकवाक्यता हो सकती है । सम्बन्ध—परब्रह्म परमेश्वरको श्रुतिमें अखण्ड और अवयवरहित बताया गया है, इसलिये उसका अंश नहीं हो सकता । फिर भी जो जीवोंको उस
सूत्र ५०-५२ ] अध्याय २ १९५
सूत्र ५०-५२ ] अध्याय २ १९५ परमात्माका अंश कहा जाता है, वह अंशांशिभाव वास्तविक नहीं है, घटाकाशकी भाँति उपाधिके निमित्तसे प्रतीत होता है, ऐसा माना जाय तो क्या आपत्ति है? अदृष्टानियमात् ॥ २ । ३ । ५१ ॥ अदृष्टानियमात् = अदृष्ट अर्थात् जन्मान्तरमे किये हुए कर्मफलभोगकी कोई नियत व्यवस्था नहीं हो सकेगी; इसलिये (उपाधिके निमित्तसे जीवोंको परमात्माका अंश मानना युक्तिसंगत नहीं है ) । व्याख्या—जीवोंको परमात्माका अंश न मानकर अलग-अलग स्वतन्त्र माननेसे तथा घटाकाशकी भाँति उपाधिके निमित्तसे जीवगणको परमात्माका अंश माननेसे भी जीवोंके कर्मफल-भोगकी व्यवस्था नहीं हो सकेगी; क्योकि यदि जीवोको अलग-अलग स्वतन्त्र मानते हैं, तब उनके कर्म-फल-भोगकी व्यवस्था कौन करेगा। जीवात्मा स्वयं अपने कर्मोंका विभाग करके ऐसा नियम बना ले कि अमुक कर्म- का अमुक फल मुझे अमुक प्रकारसे भोगना है, तो यह सम्भव नहीं है। कर्म जड हैं, अत. वे भी अपने फलका भोग करानेकी व्यवस्था स्वयं नहीं कर सकते। यदि ऐसा माने कि एक ही परमात्मा घटाकाशकी भाँति अनादिसिद्ध शरीरादिकी उपाधियोंके निमित्तसे नाना जीवोंके रूपमे प्रतीत हो रहा है, तो भी उन जीवोंके कर्मफलभोगकी व्यवस्था नहीं हो सकती; क्योकि इस मान्यताके अनुसार जीवात्मा और परमात्माका भेद वास्तविक न होनेके कारण समस्त जीवोंके कर्मोंका विभाग करना, उनके भोगनेवाले जीवोंका विभाग करना तथा परमात्माको उन सबसे अलग रहकर उनके कर्मफलोका व्यवस्थापक मानना सम्भव न होगा। अतः श्रुतिके कथनानुसार यही मानना ठीक है कि सर्वशक्तिमान् परब्रह्म परमेश्वर ही सबके कर्मफलोंकी यथायोग्य व्यवस्था करता है। तथा सब जीव उसीसे प्रकट होते हैं, इसलिये पिता-पुत्रकी भाँति उसके अंश हैं। सम्बन्ध—केवल कर्मफलभोगमें ही नहीं, सङ्कल्प आदिमें भी उसी दोषकी प्राप्ति दिखाते हैं— अभिसन्ध्यादिष्वपि चैवम् ॥ २ । ३ । ५२ ॥ च=इसके सिवा; एवम्=इसी प्रकार; अभिसन्ध्यादिषु=सङ्कल्प आदिमें; अपि=भी ( अव्यवस्था होगी ) ।