ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१९२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ इस प्रकार स्मृतियोंद्वारा समर्थन किया जानेसे भी यह सिद्ध होता है कि जीवात्मा परमेश्वरका अंश है । सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि यदि जीवात्मा ईश्वरका ही अंश है, तब तो जीवके शुभाशुभ कर्मोंसे और सुख-दुःखादि भोगोंसे ईश्वरका भी सम्बन्ध होता होगा, इसपर कहते हैं— प्रकाशादिवन्नैवं परः ॥ २ । ३ । ४६ ॥ परः=परमेश्वर; एवम्=इस प्रकार जीवात्माके दोषोंसे सम्बद्ध; न=नहीं होता; प्रकाशादिवत्=जिस प्रकार कि प्रकाश आदि अपने अंशके दोषोंसे लिप्त नहीं होते । व्याख्या—जिस प्रकार प्रकाश सूर्य तथा आकाश आदि भी अपने अंश इन्द्रिय आदिके दोषोंसे लिप्त नहीं होते, वैसे ही ईश्वर भी जीवोंके शुभाशुभ कर्म- फलरूप सुख-दुःखादि दोषोंसे लिप्त नहीं होता । श्रुतिमें कहा है— सूर्यो यथा सर्वलोकस्य चक्षुर्न लिप्यते चाक्षुषैर्बाह्यदोषैः । एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा न लिप्यते लोकदुःखेन बाह्यः ॥ 'जिस प्रकार समस्त लोकोंके चक्षुःस्वरूप सूर्यदेव चक्षुमें होनेवाले दोषोंसे लिप्त नहीं होता, वैसे ही समस्त प्राणियोंके अन्तरात्मा अद्वितीय परमेश्वर लोगोंके दुःखोंसे लिप्त नहीं होता ।' ( क० उ० २ । २ । ११ ) सम्बन्ध—इसी बातको स्मृतिप्रमाणसे पुष्ट करते हैं— स्मरन्ति च ॥ २ । ३ । ४७ ॥ स्मरन्ति=यही बात स्मृतिकार कहते हैं; च=और ( श्रुतिमें भी कही गयी है ) । व्याख्या—श्रीमद्भगवद्गीतादिमे भी ऐसा ही वर्णन मिलता है— अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः । शरीरस्थोऽपि कौन्तेय , न करोति न लिप्यते ॥ 'अर्जुन ! यह अविनाशी परमात्मा अनादि और गुणातीत होनेके कारण शरीरमें स्थित हुआ भी न तो स्वयं कर्ता है और न सुख-दुःखादि फलोंसे लिप्त ही होता है ।' ( गीता १३ । ३१ ) इसी प्रकार दूसरी जगह भी कहा है कि 'उन दोनोंमें जो परमात्मा नित्य और निर्गुण कहा गया है, वह जिस प्रकार