बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 1000, कुल 1402 में से
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| ९८६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४ |
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| त्युक्तम्, स्वयंज्योतिरिति च । स्वयंज्योतिष्ट्वं नाम चैतन्यात्मस्वभावता । यदि ही अग्न्युष्णत्वादिवच्चैतन्यात्मस्वभाव आत्मा स कथमेकत्वेऽपि हि स्वभावं जह्यात्, न जानीयात् ? अथ न जहाति, कथमिह सुषुप्ते न पश्यति ? विप्रतिषिद्धमेतत्—चैतन्यमात्मस्वभावो न जानाति चेति । | सुषुप्तिमें जीव और परमात्माकी एकता हो जानेके कारण वह नहीं देखता तथा आत्मा स्वयंज्योति है—यह कहा गया; स्वयंज्योतिष्ट्वका अर्थ है चैतन्यात्मस्वरूपता । यदि अग्निके उष्णत्वादिके समान आत्मा चैतन्यस्वरूप है तो परमात्माके साथ एकत्व होनेपर भी वह अपने स्वभावको कैसे छोड़ देता है, जिससे कि वह नहीं जानता ? और यदि वह स्वभावको नहीं छोड़ता तो यहाँ सुषुप्तिमें देखता क्यों नहीं है ? वह चैतन्यस्वरूप है और दूसरेको नहीं जानता—यह कथन तो सर्वथा विरुद्ध है । |
| न विप्रतिषिद्धम्, उभयमप्येतदुपपद्यत एव । कथम्— | समाधान— यह विरुद्ध नहीं है, ये दोनों बातें भी सम्भव हो हैं । किस प्रकार— |
यद् वै तन्न पश्यति पश्यन् वै तन्न पश्यति न हि द्रष्टुर्दृष्टेर्विपरिलोपो विद्यतेऽविनाशित्वात् । न तु तद्द्वितीयमस्ति ततोऽन्यद् विभक्तं यत् पश्येत् ॥ २३ ॥
वह जो नहीं देखता सो देखता हुआ ही नहीं देखता; द्रष्टाकी दृष्टिका कभी लोप नहीं होता, क्योंकि वह अविनाशी है । उस समय उससे भिन्न कोई दूसरी वस्तु है ही नहीं, जिसे देखे ॥ २३ ॥
| यद् वै सुषुप्ते तन्न पश्यति पश्यन् वै तत्, तत्र पश्यन्नेव न पश्यति । यत् तत्र सुषुप्ते न | वह जो सुषुप्तिमें नहीं देखता सो निश्चय उस अवस्थामें देखता हुआ ही नहीं देखता । तुम जो ऐसा जानते हो कि वह सुषुप्तिमें नहीं |