बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
९८६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४
| ९८६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४ |
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| त्युक्तम्, स्वयंज्योतिरिति च । स्वयंज्योतिष्ट्वं नाम चैतन्यात्मस्वभावता । यदि ही अग्न्युष्णत्वादिवच्चैतन्यात्मस्वभाव आत्मा स कथमेकत्वेऽपि हि स्वभावं जह्यात्, न जानीयात् ? अथ न जहाति, कथमिह सुषुप्ते न पश्यति ? विप्रतिषिद्धमेतत्—चैतन्यमात्मस्वभावो न जानाति चेति । | सुषुप्तिमें जीव और परमात्माकी एकता हो जानेके कारण वह नहीं देखता तथा आत्मा स्वयंज्योति है—यह कहा गया; स्वयंज्योतिष्ट्वका अर्थ है चैतन्यात्मस्वरूपता । यदि अग्निके उष्णत्वादिके समान आत्मा चैतन्यस्वरूप है तो परमात्माके साथ एकत्व होनेपर भी वह अपने स्वभावको कैसे छोड़ देता है, जिससे कि वह नहीं जानता ? और यदि वह स्वभावको नहीं छोड़ता तो यहाँ सुषुप्तिमें देखता क्यों नहीं है ? वह चैतन्यस्वरूप है और दूसरेको नहीं जानता—यह कथन तो सर्वथा विरुद्ध है । |
| न विप्रतिषिद्धम्, उभयमप्येतदुपपद्यत एव । कथम्— | समाधान— यह विरुद्ध नहीं है, ये दोनों बातें भी सम्भव हो हैं । किस प्रकार— |
यद् वै तन्न पश्यति पश्यन् वै तन्न पश्यति न हि द्रष्टुर्दृष्टेर्विपरिलोपो विद्यतेऽविनाशित्वात् । न तु तद्द्वितीयमस्ति ततोऽन्यद् विभक्तं यत् पश्येत् ॥ २३ ॥
वह जो नहीं देखता सो देखता हुआ ही नहीं देखता; द्रष्टाकी दृष्टिका कभी लोप नहीं होता, क्योंकि वह अविनाशी है । उस समय उससे भिन्न कोई दूसरी वस्तु है ही नहीं, जिसे देखे ॥ २३ ॥
| यद् वै सुषुप्ते तन्न पश्यति पश्यन् वै तत्, तत्र पश्यन्नेव न पश्यति । यत् तत्र सुषुप्ते न | वह जो सुषुप्तिमें नहीं देखता सो निश्चय उस अवस्थामें देखता हुआ ही नहीं देखता । तुम जो ऐसा जानते हो कि वह सुषुप्तिमें नहीं |
| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९८७ |
| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९८७ | | :--- | :--- |
| संस्कृत | हिन्दी |
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| पश्यतीति जानीषे तन्न तथा गृह्णीयाः; कस्मात् ? पश्यन् वै भवति तत्र । | देखता सो वैसा मत समझो; क्यों ? क्योंकि वहां भी वह देखता ही रहता है। |
| नन्वेवं न पश्यतीति सुषुप्ते जानीमो यतो न चक्षुर्वा मनो वा दर्शने करणं व्यापृतमस्ति । व्यापृतेषु हि दर्शनश्रवणादिषु पश्यतीति व्यवहारो भवति शृणोतीति वा । न च व्यापृतानि करणानि पश्यामः; तस्मान्न पश्यत्येवायम् । | शङ्का—किंतु वह सुषुप्तिमें इस प्रकार नहीं देखता—ऐसा हम जानते हैं; क्योंकि वहां चक्षु या मन कोई भी इन्द्रिय दर्शनमें व्यापार करनेवाली नहीं होती । दर्शन और श्रवणादि इन्द्रियोंके व्यापार करनेपर ही 'देखता है' अथवा 'सुनता है' ऐसा व्यवहार होता है। और वहाँ हम इन्द्रियोंको व्यापारयुक्त नहीं देखते; इसलिये यह नहीं ही देखता है। |
| न हि; किं तर्हि ? पश्यन्नेव भवति, कथम् ? न हि यस्माद् द्रष्टुर्दर्शनकर्तुर्या दृष्टिस्तस्या दृष्टेर्विपरिलोपो विनाशः, स न विद्यते । यथाग्नेरौष्ण्यं यावदग्निभावि, तथाऽयं चात्मा द्रष्टाऽविनाशी, अतोऽविनाशित्वादात्मनो दृष्टिरप्यविनाशिनी, यावद्द्रष्टृभाविनी हि सा । | समाधान--नहीं; तो फिर क्या बात है ?—यह देखता ही है, किस प्रकार ? क्योंकि द्रष्टा-दर्शनक्रियाके कर्ताकी जो दृष्टि है, उस दृष्टिका जो विपरिलोप-विनाश है, वह नहीं होता। जिस प्रकार अग्निकी उष्णता अग्निकी सत्तातक रहनेवाली है, उस प्रकार यह द्रष्टा आत्मा तो अविनाशी है, अतः आत्माके अविनाशी होनेके कारण आत्माकी दृष्टि भी अविनाशिनी है—वह द्रष्टाकी स्थितितक रहनेवाली ही है। |
९८८ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ४
९८८ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ४
| ननु विप्रतिषिद्धमिदमभिधीयते द्रष्टुः सा दृष्टिर्न विपरिलुप्यत इति च। दृष्टिश्च द्रष्ट्रा क्रियते; दृष्टिकर्तृत्वाद्धि द्रष्टेत्युच्यते; क्रियमाणा च द्रष्ट्रा दृष्टिर्न विपरिलुप्यत इति चाशक्यं वक्तुम्। ननु न विपरिलुप्यत इति वचनादविनाशिनी स्यात्; न, वचनस्य ज्ञापकत्वात्। न हि न्यायप्राप्तो विनाशः कृतकस्य वचनशतेनापि वारयितुं शक्यते; वचनस्य यथाप्राप्तार्थज्ञापकत्वात्।<br><br>नैष दोषः; आदित्यादिप्रकाशकत्ववद् दर्शनोपपत्तेः; यथा आदित्यादयो नित्यप्रकाशस्वभावा एव सन्तः स्वाभाविके न नित्येनैव प्रकाशेन प्रकाशयन्ति, न ह्यप्रकाशात्मानः सन्तः प्रकाशं कुर्वन्तः प्रकाशयन्तीत्युच्यन्ते; किं | शङ्का- किंतु द्रष्टाकी वह दृष्टि है और उसका लोप नहीं होता—यह कथन तो परस्परविरुद्ध है। दृष्टि तो द्रष्टाद्वारा ही की जाती है; दृष्टिकर्ता होनेके कारण ही वह द्रष्टा कहा जाता है; द्रष्टाके द्वारा दृष्टि की जानेवाली है और उसका लोप नहीं होता--यह तो कहा ही नहीं जा सकता। यदि कहो कि 'न विपरिलुप्यते' इस वचनके अनुसार वह अविनाशिनी होनी ही चाहिये तो यह ठीक नहीं; क्योंकि वचन तो केवल ज्ञापक है कृतक वस्तुका विनाश न्यायप्राप्त है, अतः उसका सैकड़ों वचनोंसे भी निवारण नहीं किया जा सकता; क्योंकि वचन तो जो वस्तु जैसी प्राप्त हुई है, उसे वैसी ही सूचित कर देनेवाला है।<br><br>समाधान— यह दोष नहीं है; क्योंकि आदित्यादिके प्रकाशकत्वके समान इसका देखना भी उपपन्न ही है। जिस प्रकार आदित्यादि नित्यप्रकाशस्वभाव होते हुए ही अपने नित्यस्वाभाविक प्रकाशसे प्रकाश करते हैं, वे स्वयं अप्रकाशस्वरूप होकर उससे अपनेसे भिन्न प्रकाश उत्पन्न करके प्रकाशित करते हैं--ऐसा उनके विषयमें नहीं कहा जाता तो, |
| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९८९ |
| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९८९ |
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| संस्कृत मूल (भाष्य) | हिन्दी भाष्यार्थ |
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| तर्हि ? स्वभावेनैव नित्येन प्रकाशेन । तथायामप्यात्मा अविपरिलुप्तस्वभावया दृष्ट्या नित्यया द्रष्टेत्युच्यते । | फिर क्या बात है ? वे अपने स्वभावरूप नित्यप्रकाशसे प्रकाशित करते हैं । इसी प्रकार यह आत्मा भी अपनी अविनाशस्वरूपा नित्यदृष्टिके कारण 'द्रष्टा' ऐसा कहा जाता है । |
| गौणं तर्हि द्रष्टृत्वम् । | **शङ्का—**तब तो इसका द्रष्टृत्व गौण है । |
| न, एवमेव मुख्यत्वोपपत्तेः; यदि ह्यन्यथाप्यात्मनो द्रष्टृत्वं दृष्टम्, तदास्य द्रष्टृत्वस्य गौणत्वम्, न त्वात्मनोऽन्यो दर्शनप्रकारोऽस्ति; तदेवमेव मुख्यं द्रष्टृत्वमुपपद्यते नान्यथा—यथा आदित्यादीनां प्रकाशयितृत्वं नित्येनैव स्वाभाविकेनाक्रियमाणेन प्रकाशेन, तदेव च प्रकाशयितृत्वं मुख्यं प्रकाशयितृत्वान्तरानुपपत्तेः; तस्मान्न 'द्रष्टुर्दृष्टेर्विपरिलुप्यते' इति न विप्रतिषेधगन्धोऽप्यस्ति । | **समाधान—**नहीं, इसी प्रकार तो इसका मुख्यत्व सिद्ध हो सकता है; यदि आत्माका द्रष्टृत्व किसी दूसरे भी प्रकारसे देखा गया होता तो इसके द्रष्टृत्वकी गौणता हो सकती थी, किंतु आत्माके दर्शनका कोई अन्य प्रकार तो है नहीं; अतः इसी प्रकार आत्माका मुख्य द्रष्टृत्व उपपन्न हो सकता है, किसी अन्य प्रकारसे नहीं; जिस प्रकार कि आदित्यादिका प्रकाशकत्व अपने स्वरूपभूत, नित्य एवं अकृत्रिम प्रकाशके कारण है, और यही प्रकाशकत्व मुख्य भी है; क्योंकि उसका कोई अन्य प्रकाशक होना सम्भव नहीं है, अतः 'द्रष्टाकी दृष्टिका सर्वथा लोप नहीं होता' इस उक्तिमें विरोधका लेश भी नहीं है । |
| ननु—अनित्यक्रियाकर्तृविषय एव तृच्प्रत्ययान्तस्य शब्दस्य प्रयोगो दृष्टः, यथा छेत्ता भेत्ता | **शङ्का—**किंतु तृच्प्रत्ययान्त शब्दका प्रयोग तो अनित्य क्रियाके कर्ताके विषयमें ही देखा गया है, जैसे छेत्ता, भेत्ता, गन्ता इत्यादि, उन्हींके |
९९० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| ९९० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| गन्तेति, तथा द्रष्टेत्यत्रापीति चेत् ? | समान द्रष्टा पदमें भी समझना चाहिये—ऐसा कहें तो ? |
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| न, प्रकाशयितेति दृष्टत्वात् । | समाधान—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि [ नित्यप्रकाशस्वरूप आदित्यादिके विषयमें ] 'प्रकाशयिता' ऐसा प्रयोग देखा जाता है। |
| भवतु प्रकाशकेष्वन्यथासम्भवात्, न स्वात्मनीति चेत् ? | शङ्का—प्रकाशकोंमें कोई अन्य प्रकार न हो सकनेके कारण वहाँ भले ही ऐसा प्रयोग हो जाय, परंतु आत्माके विषयमें तो ऐसा नहीं हो सकता। |
| न, दृष्ट्यविपरिलोपश्रुतेः । | समाधान--नहीं, क्योंकि यहां भी आत्मदृष्टिके लोप न होनेका प्रतिपादन करनेवाली श्रुति है। |
| पश्यामि न पश्यामीत्यनुभवदर्शनान्नेति चेत् ? | शङ्का—मैं देखता हूँ, मैं नहीं देखता—ऐसा विपरीत अनुभव देखा जानेके कारण आत्माकी दृष्टि नित्य नहीं हो सकती—ऐसा कहें तो ? |
| न, करणव्यापारविशेषापेक्षत्वात्; उद्धृतचक्षुषां च स्वप्ने आत्मदृष्टेरविपरिलोपदर्शनात् । | समाधान—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि यह अनुभव तो [ चक्षु ] इन्द्रियके विशेष व्यापारकी अपेक्षासे है; इसके सिवा जिनकी आँखें नष्ट हो गयी हैं, उनकी भी स्वप्नमें आत्म-दृष्टिका अविपरिलोप ( सद्भाव ) देखा जाता है। अतः आत्माकी दृष्टि |
| तस्मादविपरिलुप्तस्वभावैवात्मनो दृष्टिः, अतस्तयाविपरिलुप्तया | तो अविपरिलुप्तस्वभावा ही है, इसलिये यह पुरुष उस अविनाशिनी |
१. कभी नष्ट न होनेवाली ।
| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९९१ |
| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९९१ |
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| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-भाष्यार्थ |
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| दृष्ट्या स्वयंज्योतिःस्वभावया पश्यन्नेव भवति सुषुप्ते ।<br>कथं तर्हि न पश्यतीति ? | स्वयंज्योतिःस्वरूपा दृष्टिसे स्वप्नमें देखता ही रहता है ।<br>शङ्का—तो फिर 'नहीं देखता' ऐसा क्यों कहा जाता है ? |
| उच्यते—न तु तदस्ति । किं तत् ? द्वितीयं विषयभूतम् । किं विशिष्टम् ? ततो द्रष्टुरन्यदन्यत्वेन विभक्तं यत् पश्येद् यदुपलभेत । यद्धि तद्विशेषदर्शनकारणमन्तःकरणं चक्षूरूपं च, तदविद्ययान्यत्वेन प्रत्युपस्थापितमासीत् । तदेतस्मिन् काल एकीभूतम्, आत्मनः परेण परिष्वङ्गात् । द्रष्टुर्हि परिच्छिन्नस्य विशेषदर्शनाय करणमन्यत्वेन व्यवतिष्ठते । अयं तु स्वेन सर्वात्मना सम्परिष्वक्तः स्वेन परेण प्राज्ञेनात्मना प्रिययेव पुरुषः; तेन न पृथक्त्वेन व्यवस्थितानि करणानि विषयाश्च । तदभावाद् विशेषदर्शनं नास्ति, करणादिकृतं हि तन्नात्मकृतम्; | समाधान—बतलाते हैं—यहां तो वह वस्तु ही नहीं है । वह कौन ? दूसरी विषयभूत वस्तु । किस विशेषणसे युक्त ? उस द्रष्टासे अन्य अर्थात् अन्यरूपसे विभक्त, जिसे कि वह देखे-उपलब्ध करे। क्योंकि जो उस विशेष दर्शनका कारण चक्षुरूप अन्तःकरण था, वह अविद्याके द्वारा अन्यरूपसे प्रस्तुत किया हुआ था । इस समय प्रत्यगात्माका परमात्माके साथ आलिङ्गन होनेके कारण वह एकरूप हो गया है । परिच्छिन्न द्रष्टाके विशेष दर्शनके लिये ही इन्द्रियाँ अन्य रूपसे स्थित होती हैं । किंतु इस समय, जैसे पुरुष अपनी प्रियासे आलिङ्गित हाता है, उसी प्रकार यह स्वयं सर्वात्मभावसे अपने परमरूप प्राज्ञात्मासे आलिङ्गित रहता है; इसलिये उस अवस्थामें इन्द्रिय और विषय पृथक्रूपसे विद्यमान नहीं रहते और उनका अभाव होनेके कारण विशेषदर्शन भी नहीं होता, क्योंकि वह तो इन्द्रियादिका किया हुआ ही होता है, आत्माका किया |
९९२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४
९९२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४
| आत्मकृतामिव प्रत्यवभासते; <br><br> तस्मात् तत्कृतेयं भ्रान्तिरात्मनो <br><br> दृष्टिः परिलुप्यत इति ॥२३॥ | हुआ नहीं होता; आत्माका किया हुआ-सा तो भासता ही है, अतः उसीके कारण ऐसी भ्रान्ति होती है कि आत्माकी दृष्टिका लोप होता है ॥ २३ ॥ |
यद् वै तन्न जिघ्रति जिघ्रन् वै तन्न जिघ्रति न हि घ्रातुर्घ्रातेर्विपरिलोपो विद्यतेऽविनाशित्वान्न तु तद्द्वितीयमस्ति ततोऽन्यद् विभक्तं यज्जिघ्रेत् ॥ २४ ॥
यद् वै तन्न रसयते रसयन् वै तन्न रसयते न हि रसयितू रसयतेर्विपरिलोपो विद्यतेऽविनाशित्वान्न तु तद्द्वितीयमस्ति ततोऽन्यद् विभक्तं यद् रसयेत् ॥२५॥
यद् वै तन्न वदति वदन् वै तन्न वदति न हि वक्तुर्वक्तेर्विपरिलोपो विद्यतेऽविनाशित्वान्न तु तद् द्वितीयमस्ति ततोऽन्यद् विभक्तं यद् वदेत् ॥ २६॥
यद् वै तन्न शृणोति शृण्वन् वै तन्न शृणोति न हि श्रोतुः श्रुतेर्विपरिलोपो विद्यतेऽविनाशित्वान्न तु तद् द्वितीयमस्ति ततोऽन्यद् विभक्तं यच्छृणुयात् ॥ २७ ॥
यद् वै तन्न मनुते मन्वानो वै तन्न मनुते न हि मन्तुर्मतेर्विपरिलोपो विद्यतेऽविनाशित्वान्न तु तद्द्वितीयमस्ति ततोऽन्यद् विभक्तं यन्मन्वीत ॥२८॥
यद् वै तन्न स्पृशति स्पृशन् वै तन्न स्पृशति न हि स्प्रष्टुः स्पृष्टेर्विपरिलोपो विद्यतेऽविनाशित्वान्न तु तद्द्वितीयमस्ति ततोऽन्यद् विभक्तं यत् स्पृशेत् ॥ २६ ॥ यद् वै तन्न
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९९३
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९९३
विजानाति विजानन् वै तन्न विजानाति न हि विज्ञातुर्विज्ञातेर्विपरिलोपो विद्यतेऽविनाशित्वान्न तु तद्द्वितीयमस्ति ततोऽन्यद् विभक्तं यद् विजानीयात् ॥३०॥
वह जो नहीं सूँघता सो सूँघता हुआ ही नहीं सूँघता। सूँघनेवालेकी गन्धग्रहणशक्तिका सर्वथा लोप नहीं होता, क्योंकि वह अविनाशी है। उस अवस्थामें उससे भिन्न कोई दूसरी वस्तु है ही नहीं, जिसे सूँघे ॥ २४ ॥ वह जो रसास्वाद नहीं करता सो रसास्वाद करता हुआ ही नहीं करता। रसास्वाद करनेवालेकी रसग्रहणशक्तिका सर्वथा लोप नहीं होता, क्योंकि वह अविनाशी है। उस अवस्थामें उससे भिन्न कोई दूसरा पदार्थ है ही नहीं, जिसका रस ग्रहण करे ॥ २५ ॥ वह जो नहीं बोलता सो बोलता हुआ ही नहीं बोलता। वक्ताकी वचन-शक्तिका सर्वथा लोप नहीं होता, क्योंकि वह अविनाशी है। उस अवस्थामें उससे भिन्न दूसरा कुछ है ही नहीं, जिसके विषयमें वह बोले ॥ २६ ॥ वह जो नहीं सुनता सो सुनता हुआ ही नहीं सुनता। श्रोताकी श्रवणशक्तिका सर्वथा लोप नहीं होता, क्योंकि वह अविनाशी है। उस अवस्थामें उससे भिन्न दूसरी कोई वस्तु है ही नहीं, जिसके विषयमें वह सुने ॥ २७ ॥ वह जो मनन नहीं करता सो मनन करता हुआ ही मनन नहीं करता। मनन करनेवालेकी मननशक्तिका सर्वथा लोप नहीं होता, क्योंकि वह अविनाशी है। उस अवस्थामें उससे भिन्न कोई दूसरी वस्तु है ही नहीं, जिसके विषयमें वह मनन करे ॥ २८ ॥ वह जो स्पर्श नहीं करता सो स्पर्श करता हुआ ही स्पर्श नहीं करता। स्पर्श करनेवालेकी स्पर्शशक्तिका सर्वथा लोप नहीं होता, क्योंकि वह अविनाशी है। उस अवस्थामें उससे भिन्न कोई दूसरा पदार्थ है ही नहीं, जिसे वह स्पर्श करे ॥ २६ ॥ वह जो नहीं जानता सो नहीं जानता हुआ ही नहीं जानता। विज्ञाताकी विज्ञाति (विज्ञानशक्ति) का सर्वथा लोप नहीं होता, क्योंकि वह अविनाशी है। उस अवस्थामें उससे भिन्न कोई दूसरा पदार्थ ही नहीं होता, जिसे वह विशेषरूपसे जाने ॥ ३० ॥
बृ० उ० ६३—
९९४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| ९९४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| समानमन्यत्, यद्वै तन्न जिघ्रति । यद्वै तन्न रसयते । यद्वै तन्न वदति । यद्वै तन्न शृणोति । यद्वै तन्न मनुते । यद्वै तन्न स्पृशति । यद्वै तन्न विजानातीति । मननविज्ञानयोः दृष्ट्यादिसहकारित्वेऽपि सति चक्षुरादिनिरपेक्षो भूतभविष्यद्वर्तमानविषयव्यापारो विद्यत इति पृथग्ग्रहणम् । | 'यद्वै तन्न जिघ्रति' 'यद्वै तन्न रसयते' 'यद्वै तन्न वदति' 'यद्वै तन्न शृणोति' 'यद्वै तन्न मनुते' 'यद्वै तन्न स्पृशति' और 'यद्वै तन्न विजानाति' इत्यादि अन्य मन्त्रोंका अर्थ पूर्ववत् है । मनन और विज्ञान यद्यपि दृष्टि आदिके सहकारी हैं, तथापि इनका चक्षु आदि इन्द्रियोंसे निरपेक्ष रहकर भूत, भविष्यत् और वर्तमान विषयसम्बन्धी व्यापार रहता ही है, इसलिये इनका पृथक् ग्रहण किया गया है । |
| किं पुनर्हष्ट्यादीनामग्नेरौष्ण्यप्रकाशनज्वलनादिवद्धर्मभेदः, आहोस्विदभिन्नस्यैव धर्मस्य परोपाधिनिमित्तं धर्मान्यत्वमिति ? | प्रश्न—क्या अग्निके धर्म उष्णता, प्रकाशन और ज्वलनादिके समान दृष्ट्यादि धर्मोंका भेद है, अथवा एक [ धर्मीसे ] अभिन्न धर्मका ही अन्य उपाधिके कारण विभिन्नधर्मत्व है ? |
| अत्र केचिद् व्याचक्षते—<br>आत्मवस्तुनः स्वत एवैकत्वं नानात्वं च; यथा गोगोद्रव्यतयैकत्वम्, सास्नादीनां धर्माणां परस्परतो भेदः । यथा स्थूलेष्वेकत्वं नानात्वं च, तथा निरवयवेष्वमूर्तवस्तुष्वेकत्वं नानात्वं चानुमेयम् । सर्वत्राव्यभि- | **उत्तर—**इस विषयमें कोई-कोई ऐसी व्याख्या करते हैं—आत्मवस्तुका एकत्व और नानात्व स्वतः ही है; जिस प्रकार गौका गोद्रव्यरूपसे एकत्व है और उसके सास्नादि धर्मोंका परस्पर भेद है । जिस प्रकार स्थूल पदार्थोंमें एकत्व और नानात्व हैं, उसी प्रकार निरवयव और सूक्ष्म वस्तुओंमें भी एकत्व और नानात्वका अनुमान करना चाहिये । इस नियमका सर्वत्र |
१. गौके गलेकी लटकती हुई खालको सास्ना कहते हैं । गौके सास्ना, सींग, खुर आदि धर्मोंका परस्पर भेद है ।
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ९९५
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ९९५
| शाङ्करभाष्यम् | शाङ्करभाष्यार्थ |
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| चारदर्शनादात्मनोऽपि तद्वदेव दृष्ट्यादीनां परस्परं नानात्वम्, आत्मना चैकत्वमिति । | अव्यभिचार देखा जाता है; अतः इसी न्यायसे आत्माकी भी दृष्टि आदिका तो परस्पर नानात्व है और आत्मदृष्टिसे एकत्व है । |
| न, अन्यपरत्वात् । न हि [आत्मनि दृष्ट्यादिशक्तिभेदकल्पना-निरसनम्] दृष्ट्यादिधर्मभेदप्रदर्शनपरमिदं वाक्यं यद्वै तदित्यादि । किं तर्हि ? यदि चैतन्यात्मज्योतिः, कथं न जानाति सुषुप्ते ? नूनमतो न चैतन्यात्मज्योतिः, इत्येवमाशङ्काप्राप्तौ, तन्निराकरणायैतदारब्धं यद् वै तदित्यादि । यदस्य जाग्रत्स्वप्नयोश्चक्षुराद्यनेकोपाधिद्वारं चैतन्यात्मज्योतिःस्वाभाव्यमुपलक्षितं दृष्ट्याद्यभिधेयव्यवहारापन्नम्, सुषुप्ते उपाधिभेदव्यापारनिवृत्तावनुद्भास्यमानत्वादनुपलक्ष्यमाणस्वभावमप्युपाधिभेदेन भिन्नमिव यथाप्राप्तानुवादेनैव विद्यमानत्वमुच्यते । | किंतु ऐसी बात नहीं है, क्योंकि इन वाक्योंका तात्पर्य और ही है। ये 'यद् वै तत्' इत्यादि वाक्य दृष्ट्यादि धर्मोंका भेद प्रदर्शित करनेके लिये नहीं हैं। तो फिर किस लिये है ?-[ बताते हैं, सुनो— ] यदि चैतन्यात्मज्योति है तो वह सुषुप्तमें क्यों नहीं जानती ? अतः निश्चय ही चैतन्यात्मज्योति है नहीं; ऐसी आशङ्का प्राप्त होनेपर, उसका निराकरण करनेके लिये ही 'यद् वै तत्' इत्यादि वाक्यका आरम्भ किया गया है । जागरित और स्वप्नावस्थाओंमें जो इसकी चैतन्यात्मज्योतिःस्वभावता चक्षु आदि अनेकों उपाधियोंके द्वारा दृष्टि आदि नामके व्यवहारको प्राप्त हुई देखी गयी है, सुषुप्तिमें उपाधिभेद-रूप व्यापारकी निवृत्ति हो जानेपर वह अभिव्यक्त नहीं होती और इसलिये उसका स्वभाव भी उपलक्षित नहीं होता, तो भी यथाप्राप्त भेदका अनुवाद करते हुए उपाधिभेदसे भिन्न हुएके समान ही उसकी विद्यमानता बतलायी गयी है; अतः उस अवस्थामें |
| ९९६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४] |
| ९९६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४] | | :--- | :--- |
| तत्र दृष्ट्यादिधर्मभेदकल्पना विवक्षितार्थानभिज्ञतया ।<br><br>सैन्धवघनवत् प्रज्ञानैकरसघनश्रुतिविरोधाच्च; “विज्ञानमानन्दम्” (बृ०उ० ३।९।२८) “सत्यं ज्ञानम्” (तै०उ० २।१।१) “प्रज्ञानं ब्रह्म” (ऐ०उ० ३।१।३) इत्यादिश्रुतिभ्यश्च । | दृष्ट्यादि धर्मभेदकी कल्पना विवक्षित अर्थको न जाननेके कारण ही है।<br><br>‘आत्मा लवणखण्डके समान प्रज्ञानैकरसघनस्वरूप है’ ऐसा प्रतिपादन करनेवाली श्रुतिसे विरोध होनेके कारण भी यह कल्पना उचित नहीं है। तथा “ब्रह्म विज्ञान और आनन्दस्वरूप है” “ब्रह्म सत्य ज्ञान और अनन्त है” एवं “प्रज्ञान ब्रह्म है” इत्यादि श्रुतियोंसे विरोध होनेके कारण भी यह ठीक नहीं है। | | शब्दप्रवृत्तेश्च; लौकिकी च शब्दप्रवृत्तिश्चक्षुषा रूपं विजानाति, श्रोत्रेण शब्दं विजानाति, रसनेनान्नस्य रसं विजानाति, इति च सर्वत्रैव च दृष्ट्यादिशब्दाभिधेयानां विज्ञानशब्दवाच्यतामेव दर्शयति; शब्दप्रवृत्तिश्च प्रमाणम् । | शब्दकी प्रवृत्तिसे भी [चैतन्यके भेदकी कल्पना ठीक नहीं है]; ‘नेत्रसे रूपको जानता है, श्रोत्रसे शब्दको जानता है, रसनासे अन्नके रसको जानता है’ ऐसी शब्दकी लौकिकी प्रवृत्ति भी सर्वत्र ही दृष्टि आदि शब्दोंके वाच्योंको विज्ञान शब्दकी वाच्यता दिखलाती है और शब्दकी प्रवृत्ति भी प्रमाण ही है। | | दृष्टान्तोपपत्तेश्च, यथा हि लोके स्वच्छस्वाभाव्ययुक्तः स्फटिकस्तन्निमित्तमेव केवलं हरितनीललोहिताद्युपाधिभेदसंयोगात् तदाकारत्वं भजते; न च स्वच्छस्वाभाव्यव्यतिरेकेण हरित- | इस विषयमें दृष्टान्त भी बन सकता है; जिस प्रकार लोकमें स्वच्छस्वभावयुक्त स्फटिक मणि हरित, नील एवं लोहितादि उपाधियोंके संसर्गसे केवल उन्हींके कारण उनके आकारकी हो जाती है; स्वतः स्फटिकके तो स्वच्छस्वरूपत्वके सिवा हरित, |
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९९७
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९९७
| नीललोहितादिलक्षणा धर्मभेदाः स्फटिकस्य कल्पयितुं शक्यन्ते; तथा चक्षुराद्युपाधिभेदसंयोगात् प्रज्ञानघनस्वभावस्यैव आत्मज्योतिषो दृष्ट्यादिशक्तिभेद उपलक्ष्यते; प्रज्ञानघनस्य स्वच्छस्वाभाव्यात् स्फटिकस्वच्छस्वाभाव्यवत् । | नील एवं लोहितादि धर्मभेदकी कल्पना की ही नहीं जा सकती, उसी प्रकार चक्षु आदि उपाधिभेदके संयोगसे ही प्रज्ञानघनस्वरूप आत्मज्योतिके दृष्टि आदि शक्तिभेद उपलक्षित होते हैं; क्योंकि स्फटिककी स्वच्छस्वभावताके समान प्रज्ञानघन भी स्वच्छस्वभाव है । | | स्वयं ज्योतिष्ट्वाच्च; यथा च आदित्यज्योतिरवभास्यभेदैः संयुज्यमानं हरितनीलपीतलोहितादिभेदैरविभाज्यं तदाकाराभासं भवति, तथा च कृत्स्नं जगदवभासयच्चक्षुरादीनि च तदाकारं भवति । तथा चोक्तम्—<br>“आत्मनैवायं ज्योतिषास्ते” (४।३।६) इत्यादि । | स्वयंज्योति होनेके कारण भी आत्मभेद अनुपपन्न है, जिस प्रकार सूर्यका प्रकाश प्रकाश्यभेदोंसे संयुक्त होनेपर हरित, नील, पीत एवं लोहितादि भेदोंसे अभिन्न और उन्हींके आकारका भासता है, उसी प्रकार सम्पूर्ण जगत् और चक्षु आदिको प्रकाशित करनेवाली चैतन्यात्मज्योति तदाकार हो जाती है । ऐसा ही कहा भी है—“सुषुप्तिमें यह आत्मज्योतिके द्वारा ही बैठता है” इत्यादि । | | न च निरवयवेष्वनेकात्मकता शक्यते कल्पयितुम्, दृष्टान्ताभावात् । यदप्याकाशस्य सर्वगतत्वादिधर्मभेदः परिकल्प्यते, परमाण्वादीनां च गन्धरसाद्यनेकगुणत्वम्, तदपि निरूप्यमाणं परोपाधिनिमित्तमेव भवति । | इसके सिवा निरवयव पदार्थोंमें अनेकरूपताकी कल्पना भी नहीं की जा सकती, क्योंकि ऐसा कोई दृष्टान्त नहीं है । आकाशके जो सर्वगतत्वादि धर्मभेद और परमाणु आदिके जो गन्ध-रस आदि अनेक गुणयुक्त होनेकी कल्पना की जाती है, वह भी विचार करनेपर अन्य उपाधिके कारण ही है । |
१९८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
१९८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| संस्कृत | हिन्दी |
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| आकाशस्य तावत् सर्वगतत्वं नाम न स्वतो धर्मोऽस्ति । सर्वोपाधिसंश्रयाद्धि सर्वत्र स्वेन रूपेण सत्त्वमपेक्ष्य सर्वगतत्वव्यवहारः। न त्वाकाशः क्वचिद् गतो वा अगतो वा स्वतः। गमनं हि नाम देशान्तरस्थस्य देशान्तरेण संयोगकारणम्, सा च क्रिया नैवाविशेषे सम्भवति; एवं धर्मभेदा नैव सन्त्याकाशे । | आकाशका जो सर्वगतत्व है, वह स्वतः उसका धर्म नहीं है। सम्पूर्ण उपाधियोंका आश्रय होनेके कारण ही जो उसकी स्वरूपसे सर्वत्र सत्ता है, उसकी अपेक्षासे उसके सर्वगतत्वका व्यवहार होता है। स्वतः आकाश तो न कहीं गया है और न नहीं गया है, किसी देशान्तरमें स्थित वस्तुके किसी अन्य देशसे संयोग होनेका जो कारण है, उसे ही गमन कहते हैं। वह गमनक्रिया किसी निर्विशेष वस्तुमें होनी सम्भव नहीं है, इस प्रकार आकाशमें धर्मभेद हैं ही नहीं। |
| तथा परमाण्वादावपि । परमाणुर्नाम पृथिव्या गन्धघनायाः परमसूक्ष्मोऽवयवो गन्धात्मक एव। न तस्य पुनर्गन्धवत्त्वं नाम शक्यते कल्पयितुम् । अथ तस्यैव रसादिमत्त्वं स्यादिति चेन्न, तत्राप्यबादिसंसर्गनिमित्तत्वात् । तस्मान्न निरवयवस्यानेकधर्मवत्त्वे दृष्टान्तोऽस्ति । | इसी प्रकार परमाणु आदिमें भी समझना चाहिये। गन्धघनभूता पृथिवीका जो अत्यन्त सूक्ष्म गन्धात्मक अवयव है, उसे ही परमाणु कहते हैं। उसीके गन्धवत्त्व ( गन्धगुणयुक्त होने ) की कल्पना नहीं की जा सकती। यदि कहो कि उसीका रसादियुक्त होना तो सम्भव है ही, तो यह कथन ठीक नहीं, क्योंकि उसमें जो रसादिमत्त्व है, वह जलादिके संसर्गके कारण है। अतः निरवयव वस्तुके अनेक धर्मयुक्त होनेमें कोई दृष्टान्त नहीं है। |
| एतेन दृगादिशक्तिभेदानां पृथक्चक्षूरूपादि भेदेन परिणाम- | इसीसे परमात्मामें दृष्टि आदि शक्तिभेदोंके जो चक्षु एवं रूपादि- |
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थे ९९९
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थे ९९९
| भेदकल्पना परमात्मनि प्रत्युक्ता ॥ २४-३० ॥ | भेदके परिणामभेदोंकी कल्पना की गयी है, उसका भी खण्डन कर दिया गया¹ ॥ २४-३० ॥ |
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जागरित और स्वप्नमें पुरुषको विशेष ज्ञान होनेमें हेतु
| जाग्रत्स्वप्नयोरिव यद् विजानीयात्तद् द्वितीयं प्रविभक्तमन्यत्वेन नास्तीत्युक्तम् । अतः सुषुप्ते न विजानाति विशेषम् ।<br><br>ननु यद्यस्यायमेव स्वभावः किन्निमित्तमस्य विशेषविज्ञानं स्वभावपरित्यागेन ? अथ विशेषविज्ञानमेवास्य स्वभावः; कस्मादेष विशेषं न विजानातीति ?<br><br>उच्यते, शृणु — | जागरित और स्वप्नके समान जिसे पुरुष जाने, ऐसी उससे अन्य-रूपसे विभक्त कोई दूसरी वस्तु नहीं है-यह बात ऊपर कही गयी । इसलिये सुषुप्तिमें उसे किसी विशेष-का ज्ञान नहीं होता ।<br><br>शङ्का-किंतु इसका यदि यही स्वभाव है तो अपने स्वभावको छोड़कर इसे विशेष ज्ञान होता ही क्यों है ? और यदि विशेष विज्ञान ही इसका स्वभाव है तो इसे सुषुप्ति-में विशेषका ज्ञान क्यों नहीं होता ?<br><br>समाधान-बतलाते हैं, सुनो- |
यत्र वा अन्यदिव स्यात् तत्रान्योऽन्यत् पश्येदन्योऽन्यज्जिघ्रेदन्योऽन्यद् रसयेदन्योऽन्यद् वदेदन्योऽन्यच्छृणुयादन्योऽन्यन्मन्वीतान्योऽन्यत् स्पृशेदन्योऽन्यद् विजानीयात् ॥ ३१ ॥
जहां (जागरित या स्वप्नावस्थामें) आत्मासे भिन्न अन्य-सा होता है वहाँ अन्य अन्यको देख सकता है, अन्य अन्यको सूँघ सकता है, अन्य
१. भर्तृप्रपञ्चका मत है कि परमात्मामें दृष्टि, घ्राति इत्यादि भिन्न-भिन्न शक्तियाँ हैं । उनमें दृष्टिका चक्षु और रूपाकारसे परिणाम होता है तथा घ्रातिका घ्राणेन्द्रिय और गन्धाकारसे । इसी प्रकार अन्यान्य शक्तियोंके भी पृथक्-पृथक् परिणाम होते है , इस कल्पनाका 'परमात्मा निरवयव और एकरस है' इस युक्ति-से निराकरण करा दिया गया ।
१००० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४
| १००० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४ |
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अन्यको चख सकता है, अन्य अन्यको बोल सकता है, अन्य अन्यको सुन सकता है, अन्य अन्यका मनन कर सकता है, अन्य अन्यका स्पर्श कर सकता है, अन्य अन्यको जान सकता है ॥ ३१ ॥
| यत्र यस्मिञ्जागरिते स्वप्ने वा अन्यदिव आत्मनो वस्त्वन्तरमिवाविद्यया प्रत्युपस्थापितं भवति, तत्र तस्मादविद्याप्रत्युपस्थापितादन्यः अन्यमिव आत्मानं मन्यमानः, असत्यात्मनः प्रविभक्ते वस्त्वन्तरे, असति चात्मनि ततः प्रविभक्ते, अन्योऽन्यत् पश्येदुपलभेत। तच्च दर्शितं स्वप्ने प्रत्यक्षतो 'घ्नन्तीव जिनन्तीव' इति। तथान्योऽन्यञ्जिघ्रेद् रसयेद् वदेच्छृणुयान्मन्वीत स्पृशेद्विजानीयादिति ॥ ३१ ॥ | जहाँ-जिस जागरित या स्वप्नमें अन्यके समान अर्थात् अविद्याद्वारा उपस्थित की हुई आत्मासे भिन्न कोई और वस्तु होती है, वहाँ आत्मासे भिन्न किसी अन्य वस्तुके न होनेपर तथा आत्माके उससे भिन्न न होनेपर भी उस अविद्याद्वारा प्रस्तुत की हुई वस्तुसे अपनेको अन्यवत् मानता हुआ अन्य अन्यको देखता अर्थात् उपलब्ध करता है। यह बात स्वप्नावस्थामें 'मानो मारते हैं, मानो वशमें करते हैं' इस अनुभवद्वारा प्रत्यक्ष दिखायी गयी है। इसी प्रकार अन्य अन्यको सूँघ सकता है, चख सकता है, बोल सकता है, सुन सकता है, मनन कर सकता है, स्पर्श कर सकता है, जान सकता है ॥ ३१ ॥ |
सुषुप्तिगत आत्माकी अभिन्न स्थिति
| यत्र पुनः साविद्या सुषुप्ते वस्त्वन्तरप्रत्युपस्थापिका शान्ता, तेनान्यत्वेन अविद्याप्रविभक्तस्य वस्तुनोऽभावात् तत् केन कं पश्येज्जिघ्रेद् विजानीयाद् वा ? अतः— | किंतु जहाँ सुषुप्तावस्थामें अन्य वस्तुको प्रस्तुत करनेवाली वह अविद्या शान्त हो जाती है, वहाँ उससे भिन्न रूपसे अविद्याद्वारा विभक्त वस्तुका अभाव हो जानेके कारण वह किस इन्द्रियसे किसे देखे, सूँघे अथवा जाने ? इसलिये— |
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १००१
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १००१
सलिल एको द्रष्टाऽद्वैतो भवत्येष ब्रह्मलोकः सम्राडिति हैनमनुशशास याज्ञवल्क्य एषास्य परमा गतिरेषास्य परमा सम्पदेषोऽस्य परमो लोक एषोऽस्य परम आनन्द एतस्यैवानन्दस्यान्यानि भूतानि मात्रामुपजीवन्ति ॥ ३२ ॥
जैसे जलमें वैसे ही सुषुप्तिमें एक अद्वैत द्रष्टा है। हे सम्राट् ! यह ब्रह्मलोक है—ऐसा याज्ञवल्क्यने जनकको उपदेश दिया। यह इस (पुरुष) की परमगति है, यह इसकी परम सम्पत्ति है, यह इसका परम लोक है, यह इसका परमानन्द है। इस आनन्दकी मात्राके आश्रित ही अन्य प्राणी जीवन धारण करते हैं ॥ ३२ ॥
| स्वेनैव हि प्राज्ञेनात्मना स्वयंज्योतिःस्वभावेन सम्परिष्वक्तः समस्तः सम्प्रसन्न आप्तकाम आत्मकामः सलिलवत्स्वच्छीभूतः सलिल इव सलिल एको द्वितीयस्याभावात्। अविद्यया हि द्वितीयः प्रविभज्यते; सा च शान्तात्र अत एकः। द्रष्टा दृष्टेरविपरिलुप्तत्वादात्मज्योतिःस्वभावायाः, अद्वैतो द्रष्टव्यस्य द्वितीयस्याभावात्। | अपने ही स्वयंज्योतिःस्वभाव प्राज्ञात्मासे सम्यक् प्रकारसे आलिङ्गित, अपरिच्छिन्न, सम्यक् प्रसादयुक्त, आप्तकाम, आत्मकाम, जलके समान स्वच्छ, मानो जलमें [अर्थात् जैसे जलमें प्रतिबिम्बित उसका साक्षी शुद्ध जलरूप ही है वैसा ही] एक द्रष्टा है, क्योंकि उससे भिन्न दूसरेकी सत्ता नहीं है। दूसरेका विभाग तो अविद्याद्वारा ही होता है और वह यहाँ शान्त हो गयी है; इसलिये एक द्रष्टा है। आत्मज्योतिःस्वभावा दृष्टिका लोप न होनेके कारण वह द्रष्टा है तथा अन्य द्रष्टव्यका अभाव होनेके कारण वह अद्वैत है। |
| १००२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
| १००२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| Sanskrit | Hindi |
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| एतदमृतमभयम् । एष ब्रह्मलोको ब्रह्मव लोको ब्रह्मलोकः। पर एवायमस्मिन् काले व्यावृत्तकार्यकरणोपाधिभेदः स्वे आत्मज्योतिषि शान्तसर्वसम्बन्धो वर्तते हे सम्राट् ! इति हैवं हैन॑ जनकमनुशशास अनुशिष्टवान् याज्ञवल्क्य इति श्रुतिवचनमेतत् । | यह अमृत और अभय है। यह ब्रह्मलोक है—जहाँ ब्रह्म ही लोक है ऐसा यह ब्रह्मलोक है। हे सम्राट् ! इस समय अपनी देहेन्द्रियरूप उपाधिसे छूटकर सब सम्बन्धोंसे मुक्त हो परमात्मा ही अपनी आत्मज्योतिमें वर्तमान रहता है। इस प्रकार याज्ञवल्क्यने इस जनकको अनुशासन—उपदेश किया—यह श्रुतिका वाक्य है। |
| कथं वानुशशास ? एषास्य विज्ञानमयस्य परमा गतिः। यास्त्वन्या देहग्रहणलक्षणा ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्ता अविद्याकल्पितास्ता गतयोऽतोऽपरमा अविद्याविषयत्वात् । इयं तु देवत्वादिगतीनां कर्मविद्यासाध्यानां परमोत्तमा यः समस्तात्मभावः, यत्र नान्यत् पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद् विजानातीति । | किस प्रकार उपदेश किया ?—इस विज्ञानमयकी यह परम गति है। इससे भिन्न जो ब्रह्मासे लेकर स्तम्बपर्यन्त शरीरग्रहणरूपा गतियां हैं वे अविद्याकल्पित हैं, अतः अविद्याकी विषय होनेके कारण वे अपरमा (निकृष्ट) हैं। किंतु यह जो सर्वात्मभाव है, वह कर्म और उपासनाद्वारा साध्य देवत्वादि गतियोंसे परम—उत्तम है, जहाँ कि पुरुष किसी अन्यको नहीं देखता, किसी अन्यको नहीं सुनता और न किसी अन्यको जानता है। |
| एषैव चपरमा सम्पत् सर्वासां सम्पदां विभूतीनामियं परमा स्वाभाविकत्वादस्याः; कृतका ह्यन्याः सम्पदः। तथैषोऽस्यपरमो लोकः, येऽन्ये कर्मफलाश्रया | यही परम सम्पत् है, सम्पूर्ण सम्पदाओं अर्थात् विभूतियोंमें यह श्रेष्ठ है; क्योंकि यह स्वाभाविक है और दूसरे प्रकारकी सम्पत्तियाँ कृत्रिम हैं तथा यह इसका परम लोक है, दूसरे जो कर्मफलके आश्रित |
| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थं | १००३ |
| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थं | १००३ |
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| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| लोकास्तेऽस्मदपरमाः । अयं तु न केनचन कर्मणा मीयते, स्वाभाविकत्वात्; एषोऽस्य परमो लोकः । | लोक हैं, वे इससे निकृष्ट हैं। किंतु यह स्वाभाविक होनेके कारण किसी भी कर्मद्वारा प्राप्त नहीं होता; अतः यह इसका परम लोक है। |
| तथैषोऽस्य परम आनन्दः । यान्यन्यानि विषयेन्द्रियसम्बन्धजनितान्यानन्दजातानि तान्यपेक्ष्य एषोऽस्य परम आनन्दो नित्यत्वात् । "यो वै भूमा तत् सुखम्" (छा० उ० ७।२३।१) इति श्रुत्यन्तरात् । यत्रान्यत् पश्यत्यन्यद् विजानाति तदल्पं मर्त्यममुख्यं सुखम्, इदं तु तद्विपरीतम्, अत एवैषोऽस्य परम आनन्दः । | तथा यह इसका परम आनन्द है। दूसरे जो विषय और इन्द्रियोंके सम्बन्धसे होनेवाले आनन्द हैं, उनकी अपेक्षा यह उत्कृष्ट आनन्द है, क्योंकि यह नित्य है, जैसा कि "जो भूमा है, निश्चय वही सुख है" इस अन्य श्रुतिसे सिद्ध होता है। जहाँ अन्यको देखता है, अन्यको जानता है, वह अल्प, मर्त्य और अमुख्य सुख है, किंतु यह उससे विपरीत है, इसीसे यह इसका परम आनन्द है। |
| एतस्यैवानन्दस्य मात्रां कलामविद्याप्रत्युपस्थापितां विषयेन्द्रियसम्बन्धकालविभाव्यामन्यानि भूतान्युपजीवन्ति । कानि तानि ? तत एवानन्दादविद्यया प्रविभज्यमानस्वरूपाण्यन्यत्वेन तानि ब्रह्मणः परिकल्प्यमानान्यन्यानि सन्त्युपजीवन्ति भूतानि विषयेन्द्रियसम्पर्कद्वारेण विभाव्यमानाम् ॥ ३२ ॥ | इसी आनन्दकी अविद्याद्वारा प्रस्तुत तथा विषय और इन्द्रियोंके सम्बन्धके समय होनेवाली मात्रा कलाके आश्रित दूसरे जीव जीवन धारण करते हैं। वे जीव कौन हैं? जो उस आनन्दसे ही अविद्यावश विभक्त स्वरूप तथा ब्रह्मसे पृथक्-रूपसे परिकल्पित अन्य जीव हैं, वे विषय और इन्द्रियोंके सम्पर्क-द्वारा उस आनन्दकी कल्पित मात्रा-के उपजीवी होते हैं ॥ ३२ ॥ |
१००४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| १००४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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निष्पाप और निष्काम श्रोत्रियके सार्वभौम आनन्दका दिग्दर्शन
| यस्य परमानन्दस्य मात्रा अवयवा ब्रह्मादिभिर्मनुष्यपर्यन्तैर्भूतैरुपजीव्यन्ते, तदानन्दमात्राद्वारेण मात्रिणं परमानन्दमधिजिगमयिषन्नाह, सैन्धवलवणशकलैरिव लवणशैलम् । | ब्रह्मासे लेकर मनुष्यपर्यन्त सभी जीव जिस परमानन्दकी मात्रा-अवयवके उपजीवी हैं उस आनन्दकी मात्राके द्वारा सेंधा नमकके टुकड़ेसे नमकके पर्वतका ज्ञान करानेके समान उसके मात्री (अंशी) परमानन्दका बोध करानेकी इच्छासे श्रुति कहती है— |
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स यो मनुष्याणाꣳ राद्धः समृद्धो भवत्यन्येषामधिपतिः सर्वैर्मानुष्यकैर्भोगैः सम्पन्नतमः स मनुष्याणां परम आनन्दोऽथ ये शतं मनुष्याणामानन्दाः स एकः पितॄणां जितलोकानामानन्दोऽथ ये शतं पितॄणां जितलोकानामानन्दाः स एको गन्धर्वलोक आनन्दोऽथ ये शतं गन्धर्वलोक आनन्दाः स एकः कर्मदेवानामानन्दो ये कर्मणा देवत्वमभिसम्पद्यन्तेऽथ ये शतं कर्मदेवानामानन्दाः स एक आजानदेवानामानन्दो यश्च श्रोत्रियोऽवृजिनोऽकामहतोऽथ ये शतमाजानदेवानामानन्दाः स एकः प्रजापतिलोक आनन्दो यश्च श्रोत्रियोऽवृजिनोऽकामहतोऽथ ये शतं प्रजापतिलोक आनन्दाः स एको ब्रह्मलोक आनन्दो यश्च श्रोत्रियोऽवृजिनोऽकामहतोऽथैष एव परम आनन्द एष ब्रह्मलोकः सम्राडिति होवाच याज्ञवल्क्यः सोऽहं भगवते सहस्रं ददाम्यत ऊर्ध्वं विमोक्षायैव ब्रूहीत्यत्र ह याज्ञवल्क्यो
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १००५
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १००५
बिभयाञ्चकार मेधावी राजा सर्वेभ्यो मान्तेभ्य उदरौ- त्सीदिति ॥ ३३ ॥
वह जो मनुष्योंमें सब अङ्गोंसे पूर्ण समृद्ध, दूसरोंका अधिपति और मनुष्यसम्बन्धी सम्पूर्ण भोगसामग्रियोंद्वारा सबसे अधिक सम्पन्न होता है, वह मनुष्योंका परम आनन्द है। अब जो मनुष्योंके सौ आनन्द हैं, वह पितृलोकको जीतनेवाले पितृगणका एक आनन्द है। और जो पितृलोकको जीतनेवाले पितरोंके सौ आनन्द हैं, वह गन्धर्वलोकका एक आनन्द है। तथा जो गन्धर्वलोकके सौ आनन्द हैं, वह कर्मदेवोंका, जो कि कर्मके द्वारा देवत्वको प्राप्त होते हैं, एक आनन्द है। जो कर्मदेवोंके सौ आनन्द हैं, वह आजान (जन्मसिद्ध) देवोंका एक आनन्द है और जो निष्पाप, निष्काम श्रोत्रिय है [उसका भी वह आनन्द है] जो आजानदेवोंके सौ आनन्द हैं, वह प्रजापतिलोकका एक आनन्द है और जो निष्पाप निष्काम श्रोत्रिय है [उसका भी वह आनन्द हे] जो प्रजापतिलोकके सौ आनन्द हैं, वह ब्रह्मलोकका एक आनन्द है और जो निष्पाप निष्काम श्रोत्रिय है [उसका भी वह आनन्द है] तथा यही परम आनन्द है। हे सम्राट्! यह ब्रह्मलोक है—ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा। [जनक बोले-] 'मैं श्रीमान्को सहस्र [गौएँ] देता हूँ, अब आगे भी आप मोक्षके लिये ही उपदेश करें।' यह सुनकर याज्ञवल्क्यजी डर गये कि इस बुद्धिमान् राजाने तो मुझे सम्पूर्ण प्रश्नोंके निर्णयपर्यन्त [उत्तर देनेको] बाँध लिया ॥ ३३ ॥
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
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| स यः कश्चिन्मनुष्याणां मध्ये राद्धः संसिद्धोऽविकलः समग्रावयव इत्यर्थः, समृद्ध उपभोगोपकरणसम्पन्नो भवति; किञ्चान्येषां समानजातीयानामधिपतिः स्वतन्त्रः पतिर्न माण्डलिकः, सर्वैः समस्तैः, मानुष्यकैरिति | मनुष्योंमें जो कोई राद्ध—संसिद्ध—अविकल अर्थात् सम्पूर्ण अवयवोंसे युक्त, समृद्ध—भोगसामग्रीसे सम्पन्न तथा अन्य सजातीय पुरुषोंका अधिपति-स्वतन्त्र स्वामी होता है, माण्डलिक नहीं; एवं सम्पूर्ण मानुष्यक (मनुष्यसम्बन्धी) भोगोंसे—'मानुष्यकैः' |
१. जो सम्पूर्ण भूमण्डलका मालिक न होकर किसी छोटेसे मण्डलका शासक हो, उसे माण्डलिक कहते हैं।