बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 1012, कुल 1402 में से
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१९८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| आकाशस्य तावत् सर्वगतत्वं नाम न स्वतो धर्मोऽस्ति । सर्वोपाधिसंश्रयाद्धि सर्वत्र स्वेन रूपेण सत्त्वमपेक्ष्य सर्वगतत्वव्यवहारः। न त्वाकाशः क्वचिद् गतो वा अगतो वा स्वतः। गमनं हि नाम देशान्तरस्थस्य देशान्तरेण संयोगकारणम्, सा च क्रिया नैवाविशेषे सम्भवति; एवं धर्मभेदा नैव सन्त्याकाशे । | आकाशका जो सर्वगतत्व है, वह स्वतः उसका धर्म नहीं है। सम्पूर्ण उपाधियोंका आश्रय होनेके कारण ही जो उसकी स्वरूपसे सर्वत्र सत्ता है, उसकी अपेक्षासे उसके सर्वगतत्वका व्यवहार होता है। स्वतः आकाश तो न कहीं गया है और न नहीं गया है, किसी देशान्तरमें स्थित वस्तुके किसी अन्य देशसे संयोग होनेका जो कारण है, उसे ही गमन कहते हैं। वह गमनक्रिया किसी निर्विशेष वस्तुमें होनी सम्भव नहीं है, इस प्रकार आकाशमें धर्मभेद हैं ही नहीं। |
| तथा परमाण्वादावपि । परमाणुर्नाम पृथिव्या गन्धघनायाः परमसूक्ष्मोऽवयवो गन्धात्मक एव। न तस्य पुनर्गन्धवत्त्वं नाम शक्यते कल्पयितुम् । अथ तस्यैव रसादिमत्त्वं स्यादिति चेन्न, तत्राप्यबादिसंसर्गनिमित्तत्वात् । तस्मान्न निरवयवस्यानेकधर्मवत्त्वे दृष्टान्तोऽस्ति । | इसी प्रकार परमाणु आदिमें भी समझना चाहिये। गन्धघनभूता पृथिवीका जो अत्यन्त सूक्ष्म गन्धात्मक अवयव है, उसे ही परमाणु कहते हैं। उसीके गन्धवत्त्व ( गन्धगुणयुक्त होने ) की कल्पना नहीं की जा सकती। यदि कहो कि उसीका रसादियुक्त होना तो सम्भव है ही, तो यह कथन ठीक नहीं, क्योंकि उसमें जो रसादिमत्त्व है, वह जलादिके संसर्गके कारण है। अतः निरवयव वस्तुके अनेक धर्मयुक्त होनेमें कोई दृष्टान्त नहीं है। |
| एतेन दृगादिशक्तिभेदानां पृथक्चक्षूरूपादि भेदेन परिणाम- | इसीसे परमात्मामें दृष्टि आदि शक्तिभेदोंके जो चक्षु एवं रूपादि- |