बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 103, कुल 1402 में से
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ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ ९७
| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
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| दिषु चाग्नित्वादेर्गौणत्वान्मुख्याग्न्यादिसद्भाववन्नामादिषु ब्रह्मत्वस्य गौणत्वान्मुख्यब्रह्मसद्भावोपपत्तिः । | प्रकार पञ्चाग्नि आदिमें अग्नित्वकी गौणता होनेसे मुख्याग्नि आदिका सद्भाव सिद्ध होता है उसी प्रकार नामादिमें ब्रह्मत्वकी गौणता होनेसे मुख्य ब्रह्मकी सत्ता सिद्ध होती है। |
| क्रियार्थैश्चाविशेषाद्विद्यार्थानाम् | इसके सिवा ज्ञानसम्बन्धी वाक्योंकी कर्मपरक वाक्योंसे समानता होनेके कारण भी [ यही सिद्ध होता है ]। |
| (बुद्धयुत्पादकत्वे ज्ञानवाक्यानां क्रियार्थवाक्यैः सामान्यम्)<br><br>यथा च दर्शपूर्णमासादिक्रियेदम्फला विशिष्टेतिकर्त्तव्यताका एवंक्रमप्रयुक्ताङ्गा च इत्येतदलौकिकं वस्तु प्रत्यक्षाद्यविषयं तथाभूतं च वेदवाक्यैरेव ज्ञाप्यते। तथा, परमात्मेश्वरदेवतादिवस्तु अस्थूलादिधर्मकमशनायाद्यतीतं चेत्येवमादिविशिष्टमिति वेदवाक्यैरेव ज्ञाप्यते, इत्यलौकिकत्वात्तथाभूतमेव भवितुमर्हतीति। | जिस प्रकार दर्शपूर्णमासादि क्रिया इस फलवाली है, [ अमुक-अमुक प्रकारसे ] विशिष्ट इतिकर्तव्यता¹ वाली है और इस प्रकारके क्रमसे उसके अङ्गोंका प्रयोग होना चाहिये—ये सब अलौकिक बातें, जो प्रत्यक्षादि प्रमाणकी विषय नहीं हैं किंतु यथार्थ हैं, वेदवाक्योंसे ही जनायी जाती हैं, उसी प्रकार परमात्मा, ईश्वर एवं देवतादि पदार्थ स्थूलत्वादि धर्मोंसे रहित एवं क्षुधादिसे अतीत हैं तथा इस प्रकारके गुणोंसे विशिष्ट हैं—ये बातें वेदवाक्योंसे ही जानी जा सकती हैं। अतः अलौकिक होनेके कारण वे सत्य ही होनी चाहिये। |
| न च क्रियार्थैर्वाक्यैर्ज्ञानवाक्यानां बुद्धयुत्पादकत्वे विशेषोऽस्ति । | इसके सिवा क्रियार्थवाक्योंसे ज्ञानसम्बन्धी वाक्योंका बुद्धि उत्पन्न करनेमें कोई भेद भी नहीं |
१. करणके सहायकरूपसे अपेक्षित कार्य 'इतिकर्तव्यता' कहलाते हैं, जैसे 'यवैर्यजेत्' इस यव-यागमें करणभूत 'यव' का प्रोक्षण आदि कार्य 'इतिकर्तव्यता' है।
बृ० उ० ७—