बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
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| १०१८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| सी भवति; यदोर्ध्वोच्छ्वासी, तदा भृशाहितसम्भारशकटवदुत्सर्जन् याति । जराभिभवो रोगादिपीडनं कार्श्यापत्तिश्च शरीरवतोऽवश्यम्भाविन एतेऽनर्था इति वैराग्यायेदमुच्यते । | लेने लगता है; और जिस समय ऊर्ध्वोच्छ्वास लेने लगता है, उस समय वह अत्यन्त भाराक्रान्त छकड़ेके समान शब्द करता हुआ प्रयाण करता है। देहधारीके लिये जरासे अभिभव, रोगादिकी पीड़ा और कृशताकी प्राप्ति—ये अनर्थ अवश्यम्भावी हैं; इसलिये वैराग्यके लिये ऐसा कहा जाता है। |
| यदासावुत्सर्जन् याति तदा कथं शरीरं विमुञ्चति ? इति दृष्टान्त उच्यते—तत्तत्र यथा आम्रं वा फलम्, उदुम्बरं वा पिप्पलं वा फलम्—विषमानेकदृष्टान्तोपादानं मरणस्यानियतनिमित्तत्वख्यापनार्थम्, अनियतानि हि मरणस्य निमित्तान्यसंख्यातानि च । एतदपि वैराग्यार्थमेव; यस्मादयमनेकमरणनिमित्तवांस्तस्मात् सर्वदा मृत्योरास्ये वर्तत इति—बन्धनात्—बध्यते येन वृन्तेन सह स बन्धनकारणो रसो यस्मिन् वा बध्यते इति वृन्तमेवोच्यते बन्धनम्,तस्माद् रसाद् वृन्ताद् वा | जिस समय वह शब्द करता हुआ प्रयाण करता है, उस समय किस प्रकार देहका त्याग करता है? इसमें दृष्टान्त कहा जाता है—सो जिस प्रकार आम्र-फल, उदुम्बर ( गूलर ) अथवा पिप्पलफल—यहाँ कई विषम दृष्टान्त मृत्युके अनियत-निमित्तत्वको सूचित करनेके लिये हैं, क्योंकि मृत्युके कारण अनिश्चित और अगणित हैं। यह कथन भी वैराग्यके लिये ही है; क्योंकि यह देह मरणके अनेकों कारणोंवाला है, इसलिये सर्वदा मृत्युके मुखमें ही पड़ा हुआ है। बन्धनसे—जिसके द्वारा फल वृन्तसे बँधा रहता है, वह बन्धनका कारणभूत रस अथवा जिसमें वह बँधा रहता है, वह वृन्त ही बन्धन कहा गया है, उस रस या वृन्तरूप |