बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 1036, कुल 1402 में से
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| १०२२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| मनेतारस्ते पूर्वमेव राज्ञ आग- | लोगों) को कहते हैं–वे पहलेहीसे |
| मनं बुद्ध्वा, अन्नैर्भोज्यभक्ष्या- | राजाके आनेका समाचार जानकर |
| दिप्रकारैः, पानैर्मदिरादिभिः, | भक्ष्यभोज्यादिरूप अन्न और मदिरा |
| आवसथैश्च प्रासादादिभिः प्रति- | आदि पान तथा महल आदि आवसथ (निवासस्थान) के सहित 'प्रतिकल्पन्ते' अर्थात् तैयार किये |
| कल्पन्ते निष्पन्नैरेव प्रतीक्षन्ते | हुए इन अन्न-पानादिके सहित 'यह |
| 'अयं राजा आयात्ययमागच्छ- | राजा आता है, राजा आता है' |
| ति' इत्येवं वदन्तः । | इस प्रकार कहते हुए प्रतीक्षा करते हैं। |
| यथायं दृष्टान्तः, एवं हैवंविदं | जैसा यह दृष्टान्त है, उसी |
| कर्मफलस्य वेदितारं संसारिण- | प्रकार इस ऐसा जाननेवाले अर्थात् |
| मित्यर्थः, कर्मफलं हि प्रस्तुतं | कर्मफलके ज्ञाता संसारीकी–यह |
| तदेवंशब्देन परामृश्यते, सर्वाणि | कर्मफलका ही प्रसङ्ग है, इसलिये 'एवं' शब्दसे उसीका परामर्श |
| भूतानि शरीरकर्तृणि करणानु- | किया गया है—शरीरकी रचना करनेवाले सम्पूर्ण भूत और इन्द्रियों- |
| ग्रहीतृणि चादित्यादीनि, तत्क- | के अनुग्राहक सूर्यादि देवता, उसके |
| र्मप्रयुक्तानि कृतैरेव कर्मफलोप- | कर्मोंसे प्रेरित होकर उसके किये |
| भोगसाधनैः प्रतीक्षन्ते । 'इदं | हुए कर्मफलभोगके साधनोंके सहित प्रतीक्षा करते हैं। वे 'यह ब्रह्म |
| ब्रह्म भोक्तृ कर्तृ चास्माकमायातितथेद्मागच्छति' इत्येवमेव च | अर्थात् कर्ता-भोक्ता जीव हमारे 'पास आ रहा है तथा यह आ रहा है' ऐसा भाव रखकर उसकी |
| कृत्वा प्रतीक्षन्त इत्यर्थः ॥३७॥ | प्रतीक्षा करते हैं–ऐसा इसका तात्पर्य है ॥ ३७ ॥ |
प्राणोंके देहान्तरगमनका प्रकार
| तमेवं जिगमिषुं के सह गच्छन्ति ? ये वा गच्छन्ति ते | इस प्रकार जानेके लिये तैयार हुए उस जीवके साथ कौन जाते हैं? और जो परलोक-शरीरकी रचना |