बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 1054, कुल 1402 में से
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१०४० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| सुवर्णस्य मात्रामपादायापच्छिद्य गृहीत्वा अन्यत् पूर्वस्माद् रचनाविशेषान्नवतरमभिनवतरं कल्याणात् कल्याणतरं रूपं तनुते निर्मिनोति । एवमेवायमात्मेत्यादि पूर्ववत् ।<br><br>नित्योपात्तान्येव पृथिव्यादीन्याकाशान्तानि पञ्च भूतानि यानि 'द्वे वाव ब्रह्मणो रूपे' इति चतुर्थे व्याख्यातानि पेशःस्थानीयानि, तान्येवोपमृद्योपमृद्य, अन्यदन्यच्च देहान्तरं नवतरं कल्याणतरं रूपं संस्थानविशेषं देहान्तरमित्यर्थः, कुरुते । पित्र्यं वा पितृभ्यो हितं पितृलोकोपभोगयोग्यमित्यर्थः, गान्धर्वं गन्धर्वाणामुपभोगयोग्यम्, तथा देवानां दैवम्, प्रजापतेः प्राजापत्यम्, ब्रह्मण इदं ब्राह्मं वा; यथाकर्म यथाश्रुतमन्येषां वा भूतानां सम्बन्धि शरीरान्तरं कुरुत इत्यभिसम्बध्यते ॥ ४ ॥ | सुवर्णकी मात्राका अपादान-अपच्छेदन अर्थात् ग्रहण कर; पूर्वरचनाविशेषसे भिन्न दूसरा नवीनतर और कल्याणसे भी कल्याणतर रूप बनाता है, उसी प्रकार यह आत्मा--इत्यादि शेष अर्थ पूर्ववत् है।<br><br>आत्माके नित्यगृहीत जो पृथ्वीसे लेकर आकाशपर्यन्त सुवर्णस्थानीय पाँच भूत हैं, जिनकी 'द्वे वाव ब्रह्मणो रूपे' इस वाक्यसे चतुर्थ प्रपाठकमें व्याख्या की गयी है, उन्हींको बिगाड़-बिगाड़कर दूसरे-दूसरे देहान्तरको अर्थात् पूर्वापेक्षा नवीन और कल्याणतर रूप—संस्थानविशेष यानी देहान्तरको रच लेता है। पित्र्य—जो पितरोंके लिये उपयोगी हो अर्थात् पितृलोकके उपभोगके योग्य हो, गान्धर्व—जो गन्धर्वोंके उपभोगयोग्य हो, इसी प्रकार देवताओंके लिये उपयोगी—दैव, प्रजापतिके लिये उपयोगी—प्राजापत्य और जो ब्रह्माका है, उस ब्राह्म शरीरकी तथा इसी प्रकार कर्म और ज्ञानके अनुसार वह अन्य भूतोंसे सम्बद्ध शरीरान्तरकी रचना कर लेता है—इस प्रकार इसका सम्बन्ध है ॥ ४ ॥ |
१. उपनिषदके द्वितीय अध्यायमें।