बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 1056, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 1056
| १०४२ | वृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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वैसा ही संकल्प करता है, जैसे संकल्पवाला होता है वैसा ही कर्म करता है और जैसा कर्म करता है, वैसा ही फल प्राप्त करता है ॥५॥
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
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| स वा अयम्, य एवं संसरत्यात्मा, ब्रह्मैव पर एव, योऽशनायाद्यतीतः। विज्ञानमयो विज्ञानं बुद्धिस्तेनोपलक्ष्यमाणस्तन्मयः। 'कतम आत्मेति योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु' (४।३।७) इति ह्युक्तम्। विज्ञानमयो विज्ञानप्रायः, यस्मात्तद्धर्मत्वमस्य विभाव्यते “ध्यायतीव लेलायतीव” (४।३।७) इति। | जो आत्मा इस प्रकार संसरित होता (इहलोक-परलोकमें गमनागमन करता) है, वह यह परब्रह्म ही है, जो कि क्षुधा-पिपासादि धर्मोंसे परे है। वह विज्ञानमय-विज्ञान बुद्धि को कहते हैं, उससे उपलक्षित होनेवाला अर्थात् तन्मय है। उसके विषयमें “यह आत्मा कौन है ? जो यह प्राणोंमें विज्ञानमय है” ऐसा कहा जा चुका है। विज्ञानमय अर्थात् विज्ञानप्राय; क्योंकि 'ध्यायतीव लेलायतीव” इत्यादि वाक्यसे इसका विज्ञानधर्मत्व प्रतीत होता है। |
| तथा मनोमयो मनःसंनिकर्षान्मनोमयः। तथा प्राणमयः प्राणः पञ्चवृत्तिस्तन्मयः, येन चेतनश्चलतीव लक्ष्यते। तथा चक्षुर्मयो रूपदर्शनकाले। एवं श्रोत्रमयः शब्दश्रवणकाले। एवं तस्य तस्येन्द्रियस्य व्यापारोद्भवे तत्तन्मयो भवति। | इसी प्रकार वह मनोमय है—मनकी संनिधिके कारण वह मनोमय है तथा प्राणमय है—प्राण पाँच वृत्तियोंवाला है, तन्मय वह है, जिससे कि वह चेतन चलता हुआ-सा देखा जाता है तथा रूपदर्शनके समय वह चक्षुर्मय है। एवं शब्द सुननेके समय वह श्रोत्रमय है। इसी प्रकार उस-उस इन्द्रियके व्यापारका प्रादुर्भाव होनेपर वह तत्तद्रूप हो जाता है ! |
| एवं बुद्धिप्राणद्वारेण चक्षुरादिकरणमयः सञ्शरीरारम्भक- | इस प्रकार बुद्धि और प्राणके द्वारा वह चक्षु आदि इन्द्रियमय होकर शरीरा- |