बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 107, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | १०१ | | :--- | :--- | | स्य, जुह्वामिव फलश्रुतेरर्थवादत्वा-<br>नुपपत्तिः। <br><br> प्रतिषिद्धानिष्टफलसम्बन्धश्च वेदादेव विज्ञायते। न चानुष्ठेयः सः। न च प्रतिषिद्धविषये प्रवृत्तक्रियस्य अकरणादन्यदनुष्ठेयमस्ति। अकर्तव्यताज्ञाननिष्ठतैव हि परमार्थतः प्रतिषेधविधीनां स्यात्। <br><br> क्षुधार्तस्य प्रतिषेधज्ञानसंस्कृतस्य अभक्ष्येऽभोज्ये वा प्रत्युपस्थिते कलञ्जाभिशस्तान्नादौ 'इदं भक्ष्यमदो भोज्यम्' इति वा ज्ञानमुत्पन्नम्, तद्विषयया प्रतिषेधज्ञानस्मृत्या बाध्यते। मृगतृष्णिकायामिव पेयज्ञानं तद्विषययाथात्म्यविज्ञानेन। तस्मिन्बाधिते स्वाभाविकविपरीतज्ञानेऽनर्थकरी तल्लक्षणभोजनप्रवृत्तिर्न भवति। विपरीत- | विषयमें जिस प्रकार फलश्रुति अर्थवाद है उस प्रकार उसके अर्थवाद होनेकी भी सम्भावना नहीं है। <br><br> इसके सिवा प्रतिषिद्ध कर्मानुष्ठानसे अनिष्ट फलका सम्बन्ध होना भी वेदसे ही जाना जाता है और वह (प्रतिषिद्ध कर्म) अनुष्ठेय भी नहीं होता; तथा जो पुरुष क्रियामें प्रवृत्त है उसके लिये प्रतिषिद्ध विषयके न करनेसे ही दूसरे प्रकारका कर्म अनुष्ठेय नहीं हो जाता; क्योंकि वस्तुतः प्रतिषिद्धसम्बन्धी विधियोंका तात्पर्य उनकी अकर्त्तव्यताका ज्ञान करानेमें ही है। यदि प्रतिषेधज्ञानके संस्कारसे युक्त किसी क्षुधार्त्त पुरुषके सामने अभक्ष्य और अभोज्य कलञ्ज¹ या ²अभिशस्त अन्न उपस्थित हो तो उसे जो 'यह भक्ष्य है, यह भोज्य है' ऐसा ज्ञान उत्पन्न होगा। वह उसकी भोजनसम्बन्धिनी प्रतिषेधज्ञानस्मृतिसे बाधित हो जायगा, जिस प्रकार कि मृगतृष्णाके स्वरूपका ज्ञान होनेपर उसमें पेयबुद्धि नहीं रहती। उस स्वाभाविक विपरीत ज्ञानके बाधित हो जानेपर उसके भक्षण या भोजनमें अनर्थकारिणी प्रवृत्ति नहीं होती, क्योंकि वह प्रवृत्ति तो विपरीतज्ञानजनित थी |
१. मांस। २. ब्रह्महत्यादि पापसे दूषित पुरुषका अन्न।