बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 109, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 109
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०३
| संस्कृत मूल | हिन्दी अनुवाद |
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| न, विपरीतज्ञाननिमित्तत्वानर्थार्थत्वाभ्यां तुल्यत्वात्। कलञ्जभक्षणादिप्रवृत्तेः मिथ्याज्ञाननिमित्तत्वम्। अनर्थार्थत्वं च यथा, तथा शास्त्रविहितप्रवृत्तीनामपि। तस्मात् परमात्मयाथात्म्यविज्ञानवतः शास्त्रविहितप्रवृत्तीनामपि मिथ्याज्ञाननिमित्तत्वेन अनर्थार्थत्वेन च तुल्यत्वात् परमात्मज्ञानेन विपरीतज्ञाने निवर्तिते युक्त एवाभावः। | **सिद्धान्ती—**ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि विपरीतज्ञानके कारण और अनर्थके लिये होनेसे ये दोनों समान ही हैं। जिस प्रकार कलञ्जभक्षणादिकी प्रवृत्ति मिथ्याज्ञानके कारण और अनर्थकी हेतु होती है उसी प्रकार शास्त्रविहित प्रवृत्तियाँ भी हैं। अतः जिसे परमात्माके वास्तविक स्वरूपका ज्ञान हो गया है उसकी दृष्टिमें शास्त्रविहित प्रवृत्तियाँ भी मिथ्याज्ञानकी हेतु और अनर्थकी प्राप्ति करानेवाली होनेमें कलञ्जभक्षणादिके समान ही हैं, इसलिये परमात्मज्ञानसे उनके विपरीत ज्ञानकी निवृत्ति हो जानेपर उनका भी अभाव हो जाना उचित ही है। |
| ननु तत्र युक्तः, नित्यानां तु केवलशास्त्रनिमित्तत्वात्, अनर्थार्थत्वाभावाच्चाभावो न युक्त इति चेत् ? | **पूर्व०—**माना, वहाँ अभाव होना उचित है किंतु नित्य कर्मोंका त्याग करना तो उचित नहीं है; क्योंकि वे केवल शास्त्रविहित हैं और किसी प्रकारके अनर्थकी भी प्राप्ति करानेवाले नहीं हैं। ऐसा कहें तो ? |
| न अविद्यारागद्वेषादिदोषवतो विहितत्वात्। यथा स्वर्गकामादिदोषवतो दर्शपूर्णमासादीनि | **सिद्धान्ती—**यह बात नहीं है; उनका विधान भी अविद्या और राग-द्वेषादि दोषयुक्त पुरुषोंके ही लिये है। जिस प्रकार दर्शपूर्णमासादि |