बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 1134, कुल 1402 में से
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११२० बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ४
| मुक्तः संन्यासी, तितिक्षुर्द्वन्द्वसहिष्णुः, समाहितः—इन्द्रियान्तःकरणचलनरूपाद् व्यावृत्य ऐकाग्र्यरूपेण समाहितो भूत्वा; तदेतदुक्तं पुरस्तात्—"बाल्यं च पाण्डित्यं च निर्विद्य" इति; आत्मन्येव स्वे कार्यकारणसंघाते आत्मानं प्रत्यक्चेतयितारं पश्यति । | एषणाओंसे सर्वथा निवृत्त संन्यासी, तितिक्षु-द्वन्द्व ( सुख-दुःख, सर्दी-गर्मी आदि ) सहन करनेवाला और समाहित—इन्द्रिय और अन्तःकरणके चलन्यरूपसे व्यावृत होकर ऐकाग्र्यरूपसे समाहित हो—यही बात पहले "बाल्य और पाण्डित्यको पूर्णतया जानकर" इस वाक्यद्वारा कही गयी है – आत्मामें अर्थात् देहेन्द्रियसंघातरूप अपनेमें अन्तर्वर्ती चेतन आत्माको देखता है । |
| तत्र किं तावन्मात्रं परिच्छिन्नम् ? नेत्युच्यते—सर्वं समस्तमात्मानमेव पश्यति, नान्यद् आत्मव्यतिरिक्तं वालाग्रमात्रमप्यस्तीत्येवं पश्यति; मननान्मुनिर्भवति जाग्रत्स्वप्नसुषुप्ताख्यं स्थानत्रयं हित्वा । | तो क्या उस शरीरमें वह उतने ही परिमाणवाले परिच्छिन्न आत्माको देखता है ? इसपर कहा जाता है 'नहीं,' वह सबको आत्मा ही देखता है । आत्माके अतिरिक्त दूसरी कोई वस्तु बालके अग्रभागके बराबर भी नहीं है—इस प्रकार वह देखता है । वह जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति संज्ञक तीनों अवस्थाओंको छोड़कर मनन करनेके कारण मुनि हो जाता है । |
| एवं पश्यन्तं ब्राह्मणं नैनं पाप्मा पुण्यपापलक्षणस्तरति, न प्राप्नोति; अयं तु ब्रह्मवित् सर्वं पाप्मानं तरति—आत्मभावेनैव व्याप्नोति, अतिक्रामति । नैनं पाप्मा कृताकृतलक्षणस्तपति । | इस प्रकार देखनेवाले इस ब्राह्मणको पुण्य-पापरूपी दोष नहीं तरता--नहीं प्राप्त होता । किंतु यह ब्रह्मवेत्ता तो सम्पूर्ण पापको तर जाता है--उसे आत्मभावसे ही व्याप्त--आक्रान्त कर लेता है। इसे कृताकृतरूप पाप |