भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1158, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1158
१६४४बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ४

| (जाबालोप० ४) इति "द्वावेव पन्थानावतुनिष्क्रान्ततरौ भवतः क्रियापथश्चैव पुरस्तात् संन्यासश्च तयोः संन्यास एवातिरेचयति" इति "न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैकेऽमृतत्वमानशुः" (महानारा० १०।५) इत्यादीनि। <br><br> तथा स्मृतयश्च—"ब्रह्मचर्यवान् प्रव्रजति", अविशीर्णब्रह्मचर्यो यमिच्छेत् तमावसेत्" तस्याश्रमविकल्पमेके ब्रुवते" <br><br> तथा—"वेदानधीत्य ब्रह्मचर्येण पुत्रपौत्रानिच्छेत् पावनार्थं पितॄणाम्। अग्नीनाधाय विधिवच्चेष्टयज्ञो वनं प्रविश्याथ मुनिर्बुभूषेत् ॥" "प्राजापत्यां निरूप्येष्टिं सर्ववेदसदक्षिणाम्। आत्मन्यग्नीन् समारोप्य ब्राह्मणः प्रव्रजेद् गृहात् ॥" इत्याद्याः। | हो जाय," ये "दो ही मार्ग अभ्युदय और निःश्रेयसके प्रधान साधन हैं, पहले कर्ममार्ग और फिर संन्यास, उनमें संन्यासहीको श्रुति अधिक ठहराती है", "कर्मसे, प्रजासे अथवा धनसे नहीं, किन्हीं-किन्हींने एकमात्र त्यागसे ही अमृतत्व प्राप्त किया है" इत्यादि। <br><br> इसी प्रकार "ब्रह्मचर्यवान् पुरुष परिव्राजक होता है", "जिसका ब्रह्मचर्य खण्डित नहीं हुआ है, वह जिस आश्रममें चाहे उसीमें निवास करे" "कोई-कोई उसके लिये आश्रमका विकल्प बतलाते हैं"¹ तथा "ब्रह्मचर्यके द्वारा वेदाध्ययन कर फिर पितृगणका उद्धार करनेके लिये पुत्र-पौत्रोंकी इच्छा करे और विधिवत् अग्न्याधान कर यज्ञानुष्ठान करनेके अनन्तर वनमें प्रवेश कर [अर्थात् वानप्रस्थ होकर] मुनि (संन्यासी) होनेकी इच्छा करे।।" "जिसमें सर्वस्व दक्षिणामें दे दिया जाता है, ऐसी प्राजापत्य-इष्टि (यज्ञ) करके अग्नियोंको आत्मामें स्थापित कर ब्राह्मणको घरसे निकल [कर संन्यासी हो] जाना चाहिये" इत्यादि स्मृतियाँ भी हैं। |


१. अर्थात् वह क्रमशः एक आश्रमसे दूसरेमें जाय अथवा बिना क्रमके ब्रह्मचर्यसे ही संन्यासी हो जाय। ये तीनों स्मृतिवाक्य आश्रमका विकल्प बतलानेवाले हैं। आगेके वाक्य क्रम सूचित करते हैं; इस प्रकार इनमें परस्परविरोध है।