भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 119, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 119

ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ ११३


शृणोति तदात्मने। ते विदुरनेन वै न उद्गात्रात्येष्य-
न्तीति तमभिद्रुत्य पाप्मनाविध्यन्स यः स पाप्मा यदे-
वेदमप्रतिरूपं शृणोति स एव स पाप्मा ॥ ५॥

फिर उन्होंने श्रोत्रसे कहा, "तुम हमारे लिये उद्गान करो।" तब श्रोत्रने 'तथास्तु' कहकर उनके लिये उद्गान किया। श्रोत्रमें जो भोग है उसे उसने देवताओंके लिये आगान किया और वह जो शुभ श्रवण करता है उसे अपने लिये गाया। असुरोंने जाना कि इस उद्गाताके द्वारा देवगण हमारा अतिक्रमण करेंगे। अतः उसके पास जाकर उन्होंने उसे पापसे विद्ध कर दिया। यह जो अननुरूप श्रवण करता है, यही वह पाप है, यही वह पाप है ॥ ५ ॥

अथ ह मन ऊचुस्त्वं न उद्गायेति । तथेति तेभ्यो
मन उद्गायद्यो मनसि भोगस्तं देवेभ्य आगायद्यत्कल्याणं
संकल्पयति तदात्मने । ते विदुरनेन वै न उद्गात्रात्ये-
ष्यन्तीति तमभिद्रुत्य पाप्मनाविध्यन्स यः स पाप्मा
यदेवेदमप्रतिरूपं संकल्पयति स एव स पाप्मैवमु खल्वेता
देवताः पाप्मभिरुपासृजन्नेवमेनाः पाप्मनाविध्यन् ॥६॥

फिर उन्होंने मनसे कहा, "तुम हमारे लिये उद्गान करो।" तब मनने 'तथास्तु' कहकर उनके लिये उद्गान किया। मनमें जो भोग है उसे उसने देवताओंके लिये आगान किया और वह जो शुभ संकल्प करता है उसे अपने लिये गाया। असुरोंको मालूम हुआ कि इस उद्गाताके द्वारा देवगण हमारा अतिक्रमण करेंगे। अतः उसके पास जाकर उन्होंने उसे पापसे विद्ध कर दिया। यह जो अननुरूप संकल्प करता है यही वह पाप है, यही वह पाप है। इस प्रकार निश्चय ही इन देवताओंको पापका संसर्ग हुआ और ऐसे ही [असुरोंने] इन्हें पापसे विद्ध किया ॥ ६ ॥

बृ० उ० ८—