बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 1215, कुल 1402 में से
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ब्राह्मण ५] शाङ्करभाष्यार्थ १२०१
| अक्षरे । प्रतिष्ठे पादौ प्रतितिष्ठत्याभ्यामिति ।<br><br>तस्यास्य व्याहृत्यवयवस्य सत्यस्य ब्रह्मण उपनिषद्रहस्यमभिधानम्; येनाभिधानेनाभिधीयमानं तद् ब्रह्माभिमुखीभवति लोकवत् । कासौ ? इत्याह—अहरिति । अहरिति चैतद् रूपं हन्तेर्जहातेश्च । इति यो वेद स हन्ति जहाति च पाप्मानं य एवं वेद ॥ ३ ॥ | और दो ही ये अक्षर हैं । इन (चरणों) से पुरुष प्रतिष्ठित होता है—इस व्युत्पत्ति के अनुसार प्रतिष्ठा चरणको कहते हैं ।<br><br>उस इस व्याहृतिरूप अवयवोंवाले सत्य-ब्रह्मका उपनिषद्--रहस्य अर्थात् गूढ नाम, जिस नामसे पुकारे जानेपर वह ब्रह्म अन्य लोगोंके समान अभिमुख होता है । वह उपनिषद् क्या है, सो श्रुति बतलाती है—अहर् । 'अहर्' यह 'हन्'¹ और 'हा'² इन धातुओंका रूप है । जो ऐसा जानता है [अर्थात् अहर्संज्ञक ब्रह्मकी उपासना करता है] वह पापको मारता और त्याग देता है ॥ ३ ॥ |
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अहंसंज्ञक चाक्षुष पुरुषके व्याहृतिरूप अवयव
| एवम्— | इसी प्रकार— |
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योऽयं दक्षिणेऽक्षन् पुरुषस्तस्य भूरिति शिर एकꣳ शिर एकमेतदक्षरं भुव इति बाहू द्वौ बाहू द्वे एते अक्षरे स्वरिति प्रतिष्ठा द्वे प्रतिष्ठे द्वे एते अक्षरे तस्योपनिषदहमिति हन्ति पाप्मानं जहाति च य एवं वेद ॥ ४ ॥
जो यह दक्षिण नेत्रमें पुरुष है, उसका 'भूः' यह शिर है; शिर एक है और यह अक्षर भी एक है । 'भुवः' यह भुजा है, भुजाएँ दो हैं और ये अक्षर भी दो हैं । स्वः यह प्रतिष्ठा है, प्रतिष्ठा (चरण) दो हैं और ये
१. 'हन् हिंसागत्योः' ('हन्' धातु हिंसा और गमन अर्थमें है) ।
२. 'ओहाक् त्यागे' ('हा' धातु त्याग-अर्थमें है) ।
बृ० उ० ७६—