बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
ब्राह्मण ५] शाङ्करभाष्यार्थ १२०१
ब्राह्मण ५] शाङ्करभाष्यार्थ १२०१
| अक्षरे । प्रतिष्ठे पादौ प्रतितिष्ठत्याभ्यामिति ।<br><br>तस्यास्य व्याहृत्यवयवस्य सत्यस्य ब्रह्मण उपनिषद्रहस्यमभिधानम्; येनाभिधानेनाभिधीयमानं तद् ब्रह्माभिमुखीभवति लोकवत् । कासौ ? इत्याह—अहरिति । अहरिति चैतद् रूपं हन्तेर्जहातेश्च । इति यो वेद स हन्ति जहाति च पाप्मानं य एवं वेद ॥ ३ ॥ | और दो ही ये अक्षर हैं । इन (चरणों) से पुरुष प्रतिष्ठित होता है—इस व्युत्पत्ति के अनुसार प्रतिष्ठा चरणको कहते हैं ।<br><br>उस इस व्याहृतिरूप अवयवोंवाले सत्य-ब्रह्मका उपनिषद्--रहस्य अर्थात् गूढ नाम, जिस नामसे पुकारे जानेपर वह ब्रह्म अन्य लोगोंके समान अभिमुख होता है । वह उपनिषद् क्या है, सो श्रुति बतलाती है—अहर् । 'अहर्' यह 'हन्'¹ और 'हा'² इन धातुओंका रूप है । जो ऐसा जानता है [अर्थात् अहर्संज्ञक ब्रह्मकी उपासना करता है] वह पापको मारता और त्याग देता है ॥ ३ ॥ |
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अहंसंज्ञक चाक्षुष पुरुषके व्याहृतिरूप अवयव
| एवम्— | इसी प्रकार— |
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योऽयं दक्षिणेऽक्षन् पुरुषस्तस्य भूरिति शिर एकꣳ शिर एकमेतदक्षरं भुव इति बाहू द्वौ बाहू द्वे एते अक्षरे स्वरिति प्रतिष्ठा द्वे प्रतिष्ठे द्वे एते अक्षरे तस्योपनिषदहमिति हन्ति पाप्मानं जहाति च य एवं वेद ॥ ४ ॥
जो यह दक्षिण नेत्रमें पुरुष है, उसका 'भूः' यह शिर है; शिर एक है और यह अक्षर भी एक है । 'भुवः' यह भुजा है, भुजाएँ दो हैं और ये अक्षर भी दो हैं । स्वः यह प्रतिष्ठा है, प्रतिष्ठा (चरण) दो हैं और ये
१. 'हन् हिंसागत्योः' ('हन्' धातु हिंसा और गमन अर्थमें है) ।
२. 'ओहाक् त्यागे' ('हा' धातु त्याग-अर्थमें है) ।
बृ० उ० ७६—
१२०२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ५
| १२०२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ५ |
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अक्षर भी दो हैं। 'अहम्' यह उसका उपनिषद् (गूढ नाम) है; जो ऐसा जानता है, वह पापको मारता और त्याग देता है ॥ ४ ॥
| योऽयं दक्षिणेऽक्षन् पुरुषस्तस्य भूरिति शिर इत्यादि सर्वं समानम्, तस्योपनिषदहमिति; प्रत्यगात्मभूतत्वात्। पूर्ववद् हन्तेर्जहातेश्चेति ॥ ४ ॥ | जो यह दक्षिणनेत्रमें पुरुष है, उसका 'भूः' यह शिर है—इत्यादि सब अर्थ पूर्ववत् है। उसका 'अहम्' यह उपनिषद् है; क्योंकि वह प्रत्यगात्मस्वरूप है। पूर्ववत् यानी 'अहर्' के समान 'अहम्' भी 'हन्' और 'हा' इन दोनों धातुओंका रूप है ॥ ४ ॥ |
इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये पञ्चमाध्याये पञ्चमं सत्यब्रह्मसंस्थानब्राह्मणम् ॥ ५ ॥
षष्ठ ब्राह्मण
हृदयस्थ मनोमय पुरुषकी उपासना
| उपाधीनामनेकत्वादनेकविशेषणत्वाच्च तस्यैव प्रकृतस्य ब्रह्मणो मनउपाधिविशिष्टस्योपासनं विधित्सन्नाह— | उपाधियां अनेक हैं और उनके बहुत-से विशेषण हैं, इसलिये उस मनउपाधिविशिष्ट प्रकृत ब्रह्मकी ही उपासनाका विधान करनेकी इच्छा-से श्रुति कहती है— |
मनोमयोऽयं पुरुषो भाःसत्यस्तस्मिन्नन्तर्हृदये यथा व्रीहिर्वा यवो वा स एष सर्वस्येशानः सर्वस्याधिपतिः सर्वमिदं प्रशास्ति यदिदं किञ्च ॥ १ ॥
ब्राह्मण ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२०३
ब्राह्मण ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२०३
प्रकाश ही जिसका सत्य ( स्वरूप ) है, ऐसा यह पुरुष मनोमय है। वह उस अन्तर्हृदयमें जैसा व्रीहि ( धान ) या यव ( जौ ) होता है, उतने ही परिमाणवाला है। वह यह सबका स्वामी और सबका अधिपति है, तथा यह जो कुछ है, सभीका प्रकर्षतया शासन करता है ॥ १ ॥
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| मनोमयो मनःप्रायो मनस्युपलभ्यमानत्वात् । मनसा चोपलभत इति मनोमयोऽयं पुरुषो भाःसत्यो भा एव सत्यं सद्भावः स्वरूपं यस्य सोऽयं भाःसत्यो भास्वर इत्येतत् । मनसः सर्वार्थविभासकत्वान्मनोमयत्वाच्चास्य भास्वरत्वम् । | मनमें उपलब्ध होनेवाला होनेसे यह मनोमय–मनःप्राय है। इसे मनसे उपलब्ध करते हैं, इसलिये यह पुरुष मनोमय है; तथा भाःसत्य है—भा ही सत्य—सद्भाव अर्थात् स्वरूप है जिसका, ऐसा यह पुरुष भाःसत्य अर्थात् भास्वर है। मनके सभी विषयोंका अवभासक तथा मनोमय होनेके कारण ही इसकी भास्वरता है। |
| तस्मिन्नन्तर्हृदये हृदयस्यान्तस्तस्मिन्नित्येतत्, यथा व्रीहिर्वा यवो वा परिमाणत एवं परिमाणस्तस्मिन्नन्तर्हृदये योगिभिर्दृश्यत इत्यर्थः । स एष सर्वस्येशानः सर्वस्य स्वभेदजातस्येशानः स्वामी । स्वामित्वेऽपि सति कश्चिदमात्यादितन्त्रोऽयं तु न तथा किं तर्ह्यधिपतिरधिष्ठाय पालयिता । | उस अन्तर्हृदयमें अर्थात् हृदय-का जो अन्तर्भाग है उसमें, जैसा कि परिमाणतः व्रीहि या यव होता है, उतने ही परिमाणवाला यह उस अन्तर्हृदयमें योगियोंद्वारा देखा जाता है—ऐसा इसका तात्पर्य है। वह यह सबका ईशान अर्थात् अपने [औपाधिक] भेदसमुदायका स्वामी है। स्वामी होनेपर भी कोई मन्त्री आदिके अधीन रहता है, किंतु यह ऐसा नहीं है। तो फिर क्या है? यह अधिपति अर्थात् अधिष्ठाता होकर पालन करनेवाला है। |
१२०४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ५
| १२०४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ५ |
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| सर्वमिदं प्रशास्ति यदिदं किञ्च यत् किञ्चित् सर्वं जगत् तत् सर्वं प्रशास्ति। एवं मनोमयस्योपासनात् तथारूपापत्तिरेव फलम्। "तं यथा यथोपासते तदेव भवति" इति ब्राह्मणम् ॥ १ ॥ | [ फल—] इन सबका प्रशासन करता है—यह जो कुछ है अर्थात् जितना कुछ भी यह जगत् है, उन सबका प्रकर्षतया शासन करता है। इस प्रकार मनोमय ब्रह्मकी उपासनासे तद्रूपताकी प्राप्तिरूप ही फल मिलता है। "उसकी जो जिस प्रकार उपासना करता है वही हो जाता है"—ऐसा ब्राह्मणवाक्य है ॥ १ ॥ |
इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये पञ्चमाध्याये षष्ठं मनोब्राह्मणम् ॥ ६ ॥
सप्तम ब्राह्मण
विद्युद्ब्रह्मकी उपासना
| तथैवोपासनान्तरं सत्यस्य ब्रह्मणो विशिष्टफलमारभ्यते— | इसी प्रकार सत्य-ब्रह्मकी विशिष्ट फलवाली एक दूसरी उपासनाका आरम्भ किया जाता है— |
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विद्युद् ब्रह्मेत्याहुर्विदानाद् विद्युद् विद्यत्येनं पाप्मनो य एवं वेद विद्युद् ब्रह्मेति विद्युद्ध्येव ब्रह्म ॥ १ ॥
विद्युत् ब्रह्म है—ऐसा कहते हैं। विदान (खण्डन या विनाश) करनेके कारण विद्युत् है। जो 'विद्युत् ब्रह्म है' ऐसा जानता है, वह इस आत्माके प्रतिकूलभूत पापोंका नाश कर देता है, क्योंकि विद्युत् ही ब्रह्म है ॥ १ ॥
| विद्युद् ब्रह्मेत्याहुः। विद्युतो ब्रह्मणो निर्वचनमुच्यते—विदानादवखण्डनात् तमसो मेघान्ध- | 'विद्युद् ब्रह्मेत्याहुः'—श्रुतिविद्युत्-ब्रह्मकी निरुक्ति (व्युत्पत्ति) बतलाती है—अन्धकारके विदान-खण्डनके कारण, क्योंकि यह मेघके अन्धकार- |
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[ ब्राह्मण ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १२५५ ]
[ ब्राह्मण ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १२५५ ]
| कारं विदार्य ह्यवभासतेऽतो विद्युत् । एवंगुणं विद्युद् ब्रह्मेति यो वेदासाविद्यत्यवखण्डयति विनाशयति पाप्मन एनमात्मानं प्रति प्रतिकूलभूताः पाप्मानो ये तान् सर्वान् पाप्मनोऽवखण्डयतीत्यर्थः । य एवं वेद विद्युद् ब्रह्मेति तस्यानुरूपं फलम् । विद्युद्धि यस्माद् ब्रह्म ॥ १ ॥ | को विदीर्ण करके प्रकाशित होती है, इसलिये विद्युत् है । ऐसे गुणवाले विद्युद् ब्रह्मको जो जानता है, वह पापको 'विद्यति—खण्डित अर्थात् नष्ट कर देता है । तात्पर्य यह है कि इस आत्माके प्रतिकूलभूत जितने पाप होते हैं, उन सबका यह खण्डन कर देता है। जो 'विद्युत् ब्रह्म है' ऐसा जानता है, यह उसका अनुरूप फल है। क्योंकि विद्युत् ही ब्रह्म है ॥ १ ॥ |
इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये पञ्चमाध्याये सप्तमं विद्युद्ब्राह्मणम् ॥ ७ ॥
अष्टम ब्राह्मण
धेनुरूपसे वाक् की उपासना
| पुनरुपासनान्तरं तस्यैव ब्रह्मणो वाग् वै ब्रह्मेति— | पुनः उस सत्यब्रह्मकी ही 'वाग्वै ब्रह्म' ऐसी अन्य उपासना आरम्भ की जाती है— |
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वाचं धेनुमुपासीत तस्याश्चत्वारः स्तनाः स्वाहाकारो वषट्कारो हन्तकारः स्वधाकारस्तस्यै द्वौ स्तनौ देवा उपजीवन्ति स्वाहाकारं च वषट्कारं च हन्तकारं मनुष्याः स्वधाकारं पितरस्तस्याः प्राण ऋषभो मनो वत्सः ॥ १ ॥
वाक्रूप धेनुकी उपासना करे। उसके चार स्तन हैं—स्वाहाकार, वषट्कार, हन्तकार और स्वधाकार। उसके दो स्तन स्वाहाकार और वषट्-
१२०६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ५
| १२०६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ५ |
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कारके उपजीवी देवगण हैं, हन्तकारके उपजीवी मनुष्य हैं और स्वधाकारके पितृगण। उस धेनुका प्राण वृषभ है और मन बछड़ा है ॥ १ ॥
| वागिति शब्दत्रयी तां वाचं धेनुं धेनुरिव धेनुर्यथा धेनुश्चतुर्भिः स्तनैः स्तन्यं पयः क्षरति वत्सायैवं वाग्धेनुर्वक्ष्यमाणैः स्तनैः पय इवान्नं क्षरति देवादिभ्यः। के पुनस्ते स्तनाः ? के वा ते येभ्यः क्षरति ? | वाक् यह शब्द अर्थात् त्रयी (तीन वेद—ऋक्, यजुः और साम) है; उस वाक्रूप धेनुकी जो उपासना करे, जो धेनुके सामान धेनु है। जिस प्रकार धेनु अपने चार स्तनोंसे बछड़ेके लिये स्तन्य अर्थात् दूध बहाती है, उसी प्रकार वाग्धेनु आगे बतलाये जानेवाले स्तनोंसे देवादिके लिये दूधके समान अन्न प्रकट करती है। वे स्तन कौन-से हैं ? और जिनके लिये वह दूध देती है, वे भी कौन-कौन हैं ? | | तस्या एतस्या वाचो धेन्वा द्वौ स्तनौ देवा उपजीवन्ति वत्सस्थानीयाः। कौ तौ ? स्वाहाकारं च वषट्कारं च; आभ्यां हि हविर्दीयते देवेभ्यः। हन्तकारं मनुष्याः—हन्तेति मनुष्येभ्योऽन्नं प्रयच्छन्ति। स्वधाकारं पितरः—स्वधाकारेण हि पितृभ्यः स्वधां प्रयच्छन्ति। | उस इस वाक्रूपी धेनुके दो स्तनोंके वत्सस्थानीय देवगण उपजीवी हैं। वे दो स्तन कौन-से हैं ? स्वाहाकार और वषट्कार; क्योंकि इन्हींके द्वारा देवताओंको हवि दी जाती है। हन्तकारके उपजीवी मनुष्य हैं, 'हन्त' ऐसा कहकर मनुष्योंको अन्न देते हैं। स्वधाकारके उपजीवी पितृगण हैं—स्वधाकारके द्वारा ही पितृगणको स्वधा (श्राद्धीय वस्तु) देते हैं। | | तस्या धेन्वा वाचः प्राण ऋषभः, प्राणेन हि वाक् प्रसूयते। मनो वत्सः, मनसा हि प्रस्त्राव्यते | उस धेनुरूप वाणीका प्राण वृषभ है, क्योंकि प्राणके द्वारा ही वाक् प्रसव करती है। मन उसका वत्स है, क्योंकि मनसे ही वह प्रस्त्रावित |
ब्राह्मण ९] शाङ्करभाष्यार्थ १२०७
ब्राह्मण ९] शाङ्करभाष्यार्थ १२०७
| मनसा ह्यालोचिते विषये वाक्प्रवर्तते; तस्मान्मनो वत्सस्थानीयम्। एवं वाग्धेनूपासकस्तद्भाव्यमेव प्रतिपद्यते ॥ १ ॥ | होती है [यानी पन्हाती है]। मनसे आलोचना किये हुए विषयमें ही वाणीकी प्रवृत्ति होती है, इसलिये मन वत्सस्थानीय है। इस प्रकार वाक्रूपी धेनुका उपासक तद्रूपताको (तदुपाधिक ब्रह्मभावको) ही प्राप्त होता है ॥ १ ॥ |
इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये पञ्चमाध्याये
अष्टमं वाग्धेनुब्राह्मणम् ॥ ८ ॥
नवम ब्राह्मण
पुरुषान्तर्गत वैश्वानराग्नि, उसका घोष और मरणकालका सूचक अरिष्ट
अयमग्निर्वैश्वानरो योऽयमन्तः पुरुषे येनेदमन्नं पच्यते यदिदमद्यते तस्यैष घोषो भवति यमेतत् कर्णावपिधाय शृणोति स यदोत्क्रमिष्यन् भवति नैनं घोषँ शृणोति ॥ १ ॥
जो यह पुरुषके भीतर है, यह अग्नि वैश्वानर है, जिससे कि यह अन्न, जो कि भक्षण किया जाता है, पकाया जाता है। उसीका यह घोष होता है, जिसे पुरुष कानोंको मूँदकर सुनता है। जिस समय पुरुष उत्क्रमण करनेवाला होता है, उस समय इस घोषको नहीं सुनता ॥ १ ॥
| अयमग्निर्वैश्वानरः-पूर्ववदुपासनान्तरम् 'अयमग्निर्वैश्वानरः।' कोऽयमग्निः ? इत्याह—योऽयमन्तः | 'अयमग्निः वैश्वानरः'-पूर्ववत् 'यह अग्नि वैश्वानर है' यह ब्रह्मकी एक अन्य उपासना है। वह अग्नि कौन-सा है? इसपर श्रुति कहती |
१२०८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ५
| १२०८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ५ |
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| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
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| पुरुषे । किं शरीरारम्भकः ? <br><br>नेत्युच्यते येनाग्निना वैश्वानराख्येनेदमन्नं पच्यते । किं तदन्नम् ? यदिदमद्यते भुज्यतेऽन्नं प्रजाभिर्जाठरोऽग्निरित्यर्थः । | है—जो कि यह पुरुषके भीतर है, क्या शरीरका आरम्भक अग्नि ? नहीं; कौन-सा है सो बतलाया जाता है—जिस वैश्वानरसंज्ञक अग्निसे यह अन्न पकाया जाता है । वह अन्न कौन-सा है ? जो यह अन्न प्रजाओंन्द्वारा 'अद्यते' भक्षण किया जाता है; [ उस अन्नको पचानेवाला ] अर्थात् जाठराग्नि । |
| तस्य साक्षादुपलक्षणार्थमिदमाह—तस्याग्नेरन्नं पचतो जाठरस्यैष घोषो भवति; कोऽसौ ? यं घोषम्, एतदिति क्रियाविशेषणम्, कर्णावपिधायाङ्गुलीभ्यामपिधानं कृत्वा शृणोति; तं प्रजापतिमुपासीत वैश्वानरमग्निम् । अत्रापि ताद्भाव्यं फलम् । तत्र प्रासङ्गिकमिदमरिष्टलक्षणमुच्यते—सोऽत्र शरीरे भोक्ता यदोत्क्रमिष्यन् भवति नैनं घोषं शृणोति ॥ १ ॥ | उसका साक्षात् उपलक्षण करानेके लिये श्रुति इस प्रकार कहती है—अन्न पचानेवाले उस जाठराग्निका यह घोष होता है; वह कौन-सा है ? जिस घोषको पुरुष दोनों कान मूँदकर अङ्गुलियोंसे ढक करके सुनता है; यहाँ 'एतत्' यह क्रियाविशेषण है; उस प्रजापतिरूप वैश्वानराग्निकी उपासना करे । यहाँ भी तद्रूपताकी प्राप्ति ही फल है । उसमें श्रुति यह प्रसङ्गप्राप्त अरिष्ट बतलाती है—यहाँ शरीरमें वह भोक्ता पुरुष जिस समय उत्क्रमण करनेवाला होता है, उस समय इस घोषको नहीं सुनता ॥ १ ॥ |
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इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये पञ्चमाध्याये
नवमं वैश्वानराग्निब्राह्मणम् ॥ ९ ॥
दशम ब्राह्मण
दशम ब्राह्मण
प्रकरणान्तर्गत उपासनाओंसे प्राप्त होनेवाली गति
| सर्वेषामस्मिन् प्रकरण उपास-<br>नानां गतिरियं फलं चोच्यते— | इस प्रकरणमें बतलायी गयी समस्त उपासनाओंका यह गतिरूप फल बतलाया जाता है— |
यदा वै पुरुषोऽस्माल्लोकात् प्रैति स वायुमागच्छति तस्मै स तत्र विजिहीते यथा रथचक्रस्य खं तेन स ऊर्ध्व आक्रमते स आदित्यमागच्छति तस्मै स तत्र विजिहीते यथा लम्बरस्य खं तेन स ऊर्ध्व आक्रमते स चन्द्रमसमागच्छति तस्मै स तत्र विजिहीते यथा दुन्दुभेः खं तेन स ऊर्ध्व आक्रमते स लोकमागच्छत्यशोकमहिमं तस्मिन् वसति शाश्वतीः समाः ॥१॥
जिस समय यह पुरुष इस लोकसे मरकर जाता है, उस समय वह वायुको प्राप्त होता है। वहाँ वह वायु उसके लिये छिद्रयुक्त हो जाता—मार्ग दे देता है, जैसा कि रथके पहियेका छिद्र होता है। उसके द्वारा वह ऊर्ध्व होकर चढ़ता है। वह सूर्यलोकमें पहुँच जाता है। वहाँ सूर्य उसके लिये वैसा ही छिद्ररूप मार्ग देता है, जैसा कि लम्बर नामके बाजेका छिद्र होता है। उसमें होकर वह ऊपरको ओर चढ़ता है। वह चन्द्र-लोकमें पहुँच जाता है। वहाँ चन्द्रमा भी उसके लिये छिद्रयुक्त हो मार्ग देता है, जैसा कि दुन्दुभिका छिद्र होता है। उसके द्वारा वह ऊपरकी ओर चढ़ता है। वह अशोक (मानसिक दुःखसे रहित) और अहिम (शारीरिक दुःखशून्य) लोकमें पहुँच जाता है और उसमें सदा—अनन्त वर्षोंतक अर्थात् ब्रह्माके अनेक कल्पोंतक निवास करता है ॥१॥
| १२१० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ५ |
| १२१० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ५ |
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| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| यदा वै पुरुषो विद्वानस्माल्लोकात् प्रैति शरीरं परित्यजति स तदा वायुमागच्छत्यन्तरिक्षे तिर्यग्भूतो वायुः स्तिमितोऽभेद्यस्तिष्ठति, स वायुस्तत्र स्वात्मनि तस्मै संप्राप्ताय विजिहीते स्वात्मावयवान् विगमयतिच्छिद्रीकरोत्यात्मानमित्यर्थः । किं-परिमाणं छिद्रम् ? इत्युच्यते— यथा रथचक्रस्य खं छिद्रं प्रसिद्धपरिमाणम् । | जिस समय पुरुष अर्थात् उपासक इस लोकसे मरकर जाता है, शरीर-त्याग करता है, उस समय वह वायुको प्राप्त होता है, आकाशमें तिर्यग्भूत (तिरछा होकर स्थित) वायु घनीभूत अर्थात् अभेद्यरूपसे विद्यमान है; वह वायु वहाँ अपनेमें प्राप्त हुए उस उपासकके लिये 'विजिहीते' अपने अवयवोंका विच्छेद कर देता है अर्थात् अपनेको छिद्रयुक्त कर देता है। कितना बड़ा छिद्र करता है, सो बतलाया जाता है--जैसा कि रथके पहियेका छिद्र होता है, वैसे प्रसिद्ध परिमाण-वाला छिद्र कर देता है। |
| तेनच्छिद्रेण स विद्वानूर्ध्व आक्रमत ऊर्ध्वः सन् गच्छति स आदित्यमागच्छति । आदित्यो ब्रह्मलोकं जिगमिषोर्मार्गनिरोधं कृत्वा स्थितः सोऽप्येवंविद उपासकाय द्वारं प्रयच्छति । तस्मै स तत्र विजिहीते, यथा लम्बरस्य खं वादित्रविशेषस्य-च्छिद्रपरिमाणं तेन स ऊर्ध्व आक्रमते स चन्द्रमसमागच्छति । | उस छिद्रद्वारा वह विद्वान् ऊर्ध्व होकर चढ़ता है, अर्थात् ऊर्ध्वोन्मुख होकर जाता है, वह आदित्यलोकमें पहुँच जाता है। आदित्य ब्रह्मलोकको जानेवालेका मार्ग रोककर स्थित है। वह भी इस प्रकार जाननेवाले उस उपासकको मार्ग दे देता है। उसके लिये वहाँ वह अपने [ मण्डल ] को छिद्रयुक्त कर देता है; जैसा कि लम्बर नामक एक वाद्यविशेषके छिद्रका परिमाण होता है। उसके द्वारा वह ऊपरकी ओर चढ़ता है, वह चन्द्रलोकमें पहुँच जाता है। |
| ब्राह्मण ११ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | १२११ |
| ब्राह्मण ११ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | १२११ |
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| सोऽपि तस्मै तत्र विजिहीते, यथा दुन्दुभेः खं प्रसिद्धम्, तेन स ऊर्ध्व आक्रमते । स लोकं प्रजापतिलोकमागच्छति; किंविशिष्टम् ? अशोकं मानसेन दुःखेन विवर्जितमित्येतत्; अहिमं हिमवर्जितं शारीरदुःखवर्जितमित्यर्थः; तं प्राप्य तस्मिन् वसति शाश्वतीर्नित्याः समाः संवत्सरानित्यर्थः । ब्रह्मणो बहून् कल्पान् वसतीत्येतत् ॥ १ ॥ | वहां वह भी उसके लिये अपने-को छिद्रयुक्त कर देता है, जैसा कि दुन्दुभिका छिद्र प्रसिद्ध है, उसके द्वारा वह ऊपरकी ओर चढ़ता है । वह लोक अर्थात् प्रजापतिलोकमें आ जाता है; कैसे लोकमें ? 'अशोकम्' अर्थात् मानसिक दुःखसे रहित और 'अहिमम्'—हिमवर्जित अर्थात् शारीरिक दुःखसे रहित लोकमें । वहाँ पहुँचकर वह उसमें 'शाश्वतीः समाः'—नित्य अर्थात् अनन्त वर्षोंतक बसता है । तात्पर्य यह कि ब्रह्माके अनेकों कल्पोंतक वहाँ निवास करता है ॥ १ ॥ |
इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये पञ्चमाध्याये
दशमं गतिब्राह्मणम् ॥ १० ॥
एकादश ब्राह्मण
व्याधि, श्मशानगमन और अग्निदाहमें परम तपोहृष्टिका विधान
एतद्वै परमं तपो यद् व्याहितस्तप्यते परमँ० हैव लोकं जयति य एवं वेदैतद्वै परमं तपो यं प्रेतमरण्यँ० हरन्ति परमँ० हैव लोकं जयति य एवं वेदैतद्वै परमं तपो यं प्रेतमग्नावभ्यादधति परम ँ० हैव लोकं जयति य एवं वेद ॥ १ ॥
१२१२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ५
| १२१२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ५ |
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व्याधियुक्त पुरुषको जो ताप होता है—यह निश्चय ही परम तप है, जो ऐसा जानता है, वह परम लोकको ही जीत लेता है। मृत पुरुषको जो वनको ले जाते हैं, यह निश्चय ही परम तप है; जो ( म्रियमाण व्यक्ति ) ऐसा जानता है, वह परम लोकको ही जीत लेता है। मरे हुए मनुष्यको सब प्रकार जो अग्निमें रखते हैं, यह निश्चय ही परम तप है; जो ऐसा जानता है, वह परम लोकको ही जीत लेता है ॥ १ ॥
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| एतद् वै परमं तपः । किं तत् ? यद् व्याहितो व्याधितो ज्वरादिपरिगृहीतः सन् यत् तप्यते तदेतत् परमं तप इत्येवं चिन्तयेत्; दुःखसामान्यात् । तस्यैवं चिन्तयतो विदुषः कर्मक्षयहेतुस्तदेव तपो भवत्यनिन्दतोऽविषीदतः; स एव च तेन विज्ञानतपसा दग्धकिल्बिषः परमं हैव लोकं जयति य एवं वेद ।<br><br>तथा मुमूर्षुरादावेव कल्पयति; किम् ? एतद् वै परमं तपो यं प्रेतं मां ग्रामादरण्यं हरन्ति ऋत्विजोऽन्त्यकर्मणे तद् ग्रामादरण्यगमनसामान्यात् परमं मम तत् तपो | यह निश्चय परम तप है। वह क्या है ? व्याहित-व्याधित अर्थात् ज्वरादिसे ग्रस्त हुआ पुरुष जो ताप होता है, यह परम तप है—ऐसा चिन्तन करे; क्योंकि ताप और तप इनमें समान ही क्लेश है। इस प्रकार चिन्तन करनेवाले उस विद्वान्का, जो कि स्वतः प्राप्त हुए रोगादिकी निन्दा नहीं करता तथा उससे विषादको प्राप्त नहीं होता, वही तप कर्मक्षयका हेतु हो जाता है। जो इस प्रकार जानता है, वह उस विज्ञानरूप तपके द्वारा पापोंको दग्ध करके परम लोकपर विजय प्राप्त कर लेता है।<br><br>इसी प्रकार मरणासन्न पुरुष आरम्भमें ही कल्पना करता है; क्या कल्पना करता है ? मर जानेपर मुझे ऋत्विगगण अन्त्येष्टिकर्मके लिये जो ग्रामसे वनमें ले जायँगे, यह निश्चय ही परम तप होगा—ग्रामसे वन-गमनमें समानता होनेके कारण वह मेरा परम तप हो जायगा। यह |
| ब्राह्मण १२ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | १२१३ |
| ब्राह्मण १२ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | १२१३ |
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| भविष्यति । ग्रामादरण्यगमनं परमं तप इति हि प्रसिद्धम् । परमं हैव लोकं जयति य एवं वेद ।<br><br>तथैतद्वै परमं तपो यं प्रेतमग्नावभ्यादधति; अग्निप्रवेशसामान्यात्, परमं हैव लोकं जयति य एवं वेद ॥ १ ॥ | तो प्रसिद्ध ही है, कि ग्रामसे वनमें जाना परम तप है। जो ऐसा जानता है, वह निश्चय ही परम लोकको जीत लेता है ।<br><br>तथा जिस मृतकको सब ओरसे अग्निमें रखते हैं—यह भी उसके लिये परमतप होता है, क्योंकि अग्निप्रवेशसे इसकी समानता है । जो ऐसा जानता है, वह निश्चय ही परम् लोकको जीत लेता है ॥ १ ॥ |
इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये पञ्चमाध्याये एकादशं तपोब्राह्मणम् ॥ ११ ॥
द्वादश ब्राह्मण
अन्न-प्राणरूप ब्रह्मकी उपासना और तद्विषयक आख्यान
| अन्नं ब्रह्मेति—तथैतदुपासनान्तरं विधित्सन्नाह— | 'अन्नं ब्रह्म'—इस प्रकार इस अन्य उपासनाका विधान करनेकी इच्छासे वेद कहता है— |
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अन्नं ब्रह्मेत्येक आहुस्तन्न तथा पूयति वा अन्नमृते प्राणात् प्राणो ब्रह्मेत्येक आहुस्तन्न तथा शुष्यति वै प्राण ऋतेऽन्नादेते ह त्वेव देवते एकधाभूयं भूत्वा परमतां गच्छतस्तद्ध स्माह प्रातृदः पितरं किं स्विदेवैवंविदुषे साधु कुर्यां कमेवास्मा असाधु
१२१४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ५
| १२१४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ५ |
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कुर्यामिति स ह स्माह पाणिना मा प्रातृद कस्त्वेनयोरे- कधाभूयं भूत्वा परमतां गच्छतीति तस्मा उ हैतदुवाच वीत्यन्नं वै व्यन्ने हीमानि सर्वाणि भूतानि विष्टानि रमिति प्राणो वै रं प्राणे हीमानि सर्वाणि भूतानि रमन्ते सर्वाणि ह वा अस्मिन् भूतानि विशन्ति सर्वाणि भूतानि रमन्ते य एवं वेद ॥ १ ॥
कोई कहते हैं कि अन्न ब्रह्म है; किंतु ऐसी बात नहीं है; क्योंकि प्राणके बिना अन्न सड़ जाता है। कोई कहते हैं-प्राण ब्रह्म है; किंतु ऐसी बात नहीं है, क्योंकि अन्नके बिना प्राण सूख जाता है। परंतु ये दोनों देव एकरूपताको प्राप्त होकर परम भावको प्राप्त होते हैं—ऐसा निश्चय कर प्रातृद ऋषिने अपने पितासे कहा था—‘इस प्रकार जाननेवाले-का मैं क्या शुभ करूँ अथवा क्या अशुभ करूँ ? [ क्योंकि कृतकृत्य हो जानेके कारण उसका तो न कोई शुभ किया जा सकता है और न अशुभ ही ।]’ पिताने हाथसे निवारण करते हुए कहा—‘प्रातृद ! ऐसा मत कहो। इन दोनोंकी एकरूपताको प्राप्त होकर कौन परमताको प्राप्त होता है ?’ अतः उससे उस (प्रातृदके पिता) ने ‘वि’ ऐसा कहा। ‘वि’ यही अन्न है। वि-रूप अन्नमें ही ये सब भूत प्रविष्ट हैं। ‘रम्’ यह प्राण है, क्योंकि रं अर्थात् प्राणमें ही ये सब भूत रमण करते हैं। जो ऐसा जानता है, उसमें ये सब भत प्रविष्ट होते हैं और सभी भूत रमण करते हैं ॥ १ ॥
| अन्नं ब्रह्मान्नमद्यते यत् तद् ब्रह्मेत्येक आचार्या आहुस्तन्न तथा ग्रहीतव्यमन्नं ब्रह्मेति । अन्ये चाहुः—प्राणो ब्रह्मेति, तच्च तथा न ग्रहीतव्यम् । | अन्न ब्रह्म है। अन्न जो कि खाया जाता है, वह ब्रह्म है—ऐसा किन्हीं आचार्योंका कथन है; किंतु ‘अन्न ब्रह्म है’ इसे इसी रूपमें नहीं स्वीकार करना चाहिये। दूसरे कहते हैं—प्राण ब्रह्म है; इसे भी इस रूपमें नहीं स्वीकार करना चाहिये। |
| ब्राह्मण १२ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | १२१५ |
| ब्राह्मण १२ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | १२१५ |
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| किमर्थं पुनरन्नं ब्रह्मेति न ग्राह्यम्; यस्मात् पूयति क्लियते पूतिभावमापद्यत ऋते प्राणात्, तत् कथं ब्रह्म भवितुमर्हति ? ब्रह्म हि नाम तद् यदविनाशि। | किंतु 'अन्न ब्रह्म है' ऐसा क्यों नहीं समझना चाहिये ? क्योंकि प्राणके बिना यह सड़ता है, इसमें पानी छूटने लगता है अर्थात् यह पूतिभाव—दुर्गन्धको प्राप्त हो जाता है। फिर यह किस प्रकार ब्रह्म हो सकता है ? ब्रह्म तो वही हो सकता है, जो अविनाशी हो। | | अस्तु तर्हि प्राणो ब्रह्म, नैवम्; यस्माच्छुष्यति वै प्राणः शोषमुपैति ऋतेऽन्नात्, अत्ता हि प्राणः; अतोऽन्नेनाद्येन विना न शक्नोत्यात्मानं धारयितुम्; तस्माच्छुष्यति वै प्राण ऋतेऽन्नात् । अत एकैकस्य ब्रह्मता नोपपद्यते यस्मात् तस्मादेते ह त्वेवान्नप्राणदेवते एकधाभूयमेकधाभावं भूत्वा गत्वा परमतां परमत्वं गच्छतो ब्रह्मत्वं प्राप्नुतः। | अच्छा तो प्राण ही ब्रह्म रहे, ऐसा नहीं; क्योंकि अन्नके बिना प्राण सूख जाता है—शुष्कताको प्राप्त हो जाता है। प्राण तो अन्न भक्षण करनेवाला है; अतः अपने भक्ष्य अन्नके बिना वह अपनेको धारण करनेमें समर्थ नहीं है, इसीसे अन्नके बिना प्राण सूख जाता है। अतः इनमेंसे एक-एकका ब्रह्मत्व सम्भव नहीं है, इसलिये ये अन्न और प्राण--दो देवता एकरूप होकर—एकभावको प्राप्त होकर परमता----परमभावको प्राप्त होते अर्थात् ब्रह्मत्वको प्राप्त हो जाते हैं। | | तदेतदेवमध्यवस्य ह स्माह स्म प्रातृदो नाम पितरमात्मनः किंस्वित् स्विदिति वितर्के, यथा मया ब्रह्म परिकॢप्तमेवंविदुषे | इसे इस प्रकार निश्चय कर प्रातृद नामके ऋषिने अपने पितासे कहा—'किंस्वित्' (कौन सा)—इसमें 'स्वित्' यह वितर्कभाव सूचित करनेके लिये है, मैंने जिस प्रकार ब्रह्मकी कल्पना की है, उस प्रकार जाननेवालेका मैं |
१२१६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ५
| १२१६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ५ |
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| किंस्वित् साधु कुर्यां साधु शोभनं पूजां कां त्वस्मै पूजां कुर्या-मित्यभिप्रायः, किमेवास्मै विदुषेऽसाधु कुर्यां कृतकृत्योऽसावित्य-भिप्रायः। अन्नप्राणौ सहभूतौ ब्रह्मेति विद्वानासावसाधुकरणेन खण्डितो भवति, नापि साधु-करणेन महीकृतः। | क्या साधु करूँ ? साधु--शोभन अर्थात् पूजा; तात्पर्य यह है कि उसकी मैं क्या तो पूजा करूँ और क्या ऐसा जाननेवालेका मैं असाधु करूँ ? अभिप्राय यह है कि वह तो कृतकृत्य है। अन्न और प्राण-ये मिलकर ब्रह्म हैं--ऐसा जो जानने-वाला है वह पुरुष अशुभ करनेसे तो खण्डित नहीं होता और शुभ करनेसे महान् नहीं होता। | | तमेवंवादिनं स पिता ह स्माह पाणिना हस्तेन निवारयन् मा प्रातृद मैवं वोचः। कस्त्वेनयो-रन्नप्राणयोरेकधाभूयं भूत्वा परमतां कस्तु गच्छति न कश्चि-दपि विद्वाननेन ब्रह्मदर्शनेन परमतां गच्छति। तस्मान्मैवं वक्तुमर्हसि कृतकृत्योऽसाविति। | इस प्रकार कहनेवाले उस पुत्र-को हाथसे रोकते हुए पिताने कहा, 'प्रातृद ! नहीं, ऐसा मत कहो। इन अन्न और प्राणको एकरूपताको प्राप्त होकर कौन परम-भावको प्राप्त करता है ? इस ब्रह्मदर्शनके द्वारा कोई भी विद्वान् परम-भावको प्राप्त नहीं कर सकता। इसलिये तुम्हें ऐसा नहीं कहना चाहिये कि यह कृत्यकृत्य है।' | | यद्येवं ब्रवीतु भवान् कथं पर-मतां गच्छतीति ? तस्मा उ है-तद् वक्ष्यमाणं वच उवाच। किं तत् ? वीति। किं तद् वीत्युच्यते—अन्नं वै वि। अन्ने हि यस्मादिमानि सर्वाणि भूतानि विष्टान्याश्रितान्यतोऽन्नं वीत्युच्यते। | यदि ऐसी बात है तो आप बतलाइये कि किस प्रकार परम-भाव प्राप्त करता है ? तब उसके प्रति उसके पिताने यह आगे कहा जानेवाला वचन कहा। वह वचन क्या था ? वह था 'वि'। वह 'वि' क्या है सो बतलाते हैं—अन्न ही 'वि' है, क्योंकि अन्नमें ही ये समस्त भूत विष्ट--आश्रित हैं, इसलिये अन्न 'वि' इस प्रकार कहा जाता है। |
ब्राह्मण १२ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२१७
ब्राह्मण १२ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२१७
| किं च रमिति–रमिति चोक्तवान् पिता। किं पुनस्तद् रम् ? प्राणो वै रम्; कुत इत्याह प्राणे हि यस्माद् बलाश्रये सति सर्वाणि भूतानि रमन्तेऽतो रं प्राणः। सर्वभूताश्रयगुणमन्नं सर्वभूतरतिगुणश्च प्राणः। न हि कश्चिदनायतनो निराश्रयो रमते; नापि सत्यप्यायतनेऽप्राणो दुर्बलो रमते; यदा त्वायतनवान् प्राणी बलवांश्च तदा कृतार्थमात्मानं मन्यमानो रमते लोकः; “युवा स्यात् साधुयुवाऽध्यायकः” (तै० उ० २।८।१) इत्यादिश्रुतेः। | इसके सिवा ‘रम्’ यह कहा—पिताने ‘रम्’ ऐसा भी कहा, सो वह ‘रम्’ क्या है? प्राण ही ‘रम्’ है। क्यों, सो बतलाते हैं—क्योंकि बलके आश्रयभूत प्राणके रहनेपर ही सब भूत रमण करते हैं, इसलिये प्राण ‘रम्’ है। इस प्रकार अन्न समस्त भूतोंके आश्रयरूप गुणवाला है और प्राण समस्त भूतोंके रतिरूप गुणवाला। बिना आयतन अर्थात् बिना आश्रयके भी कोई रमण नहीं कर सकता और आश्रयके होनेपर भी प्राणहीन अर्थात् बलहीन भी रमण नहीं कर सकता। जिस समय प्राणी आश्रयसे युक्त और बलवान् होता है तभी अपनेको कृतार्थ मानता हुआ वह रमण करता है; जैसा कि “युवक हो, अच्छा युवक हो और विद्यावान् हो” इत्यादि श्रुतिसे ज्ञात होता है। | | इदानीमेवंविदः फलमाह— | अब श्रुति इस प्रकार जाननेवाले उपासकका फल बतलाती है— | | सर्वाणि ह वा अस्मिन् भूतानि विशन्त्यन्नगुणज्ञानात् सर्वाणि भूतानि रमन्ते प्राणगुणज्ञानाद् य एवं वेद ॥ १ ॥ | जो ऐसा जानता है, उसमें अन्नगुणका ज्ञान होनेके कारण समस्त भूत प्रवेश करते हैं तथा प्राणगुणका ज्ञान होनेके कारण समस्त भूत रमण करते हैं ॥ १ ॥ |
इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये पञ्चमाध्याये
द्वादशमन्नप्राणब्राह्मणम् ॥ १२ ॥
बृ० उ० ७७—
त्रयोदश ब्राह्मण
त्रयोदश ब्राह्मण
उक्थदृष्टिसे प्राणोपासना
उक्थं प्राणो वा उक्थं प्राणो हीदँ सर्वमुत्थापयत्युद्धास्मादुक्थविद् वीरस्तिष्ठत्युक्थस्य सायुज्यँ सलोकतां जयति य एवं वेद ॥ १ ॥
'उक्थ' इस प्रकार प्राणकी उपासना करे। प्राण ही उक्थ है, क्योंकि प्राण ही इन सबको उत्थापित करता है। इस उपासकसे उक्थवेत्ता पुत्र उत्पन्न होता है। जो ऐसी उपासना करता है, वह प्राणके सायुज्य और सालोक्यको प्राप्त करता है ॥ १ ॥
| उक्थं तथोपासनान्तरम् । उक्थं शस्त्रम्; तद्धि प्रधानं महाव्रते क्रतौ । किं पुनस्तदुक्थम् ? प्राणो वा उक्थम्; प्राणश्च प्रधान इन्द्रियाणामुक्थं च शस्त्राणामत उक्थमित्युपासीत ।<br><br>कथं प्राण उक्थम् ? इत्याह— प्राणो हि यस्मादिदं सर्वमुत्थापयति; उत्थापनादुक्थं प्राणः; न ह्यप्राणः कश्चिदुत्तिष्ठति ।<br><br>तदुपासनफलमाह—उद्धास्मादेवंविद उक्थवित् प्राणविद् वीरः | इसी प्रकार उक्थ' एक अन्य उपासना है। उक्थ शस्त्र है, वही महाव्रत क्रतुमें प्रधान होता है। अच्छा तो वह उक्थ क्या है ? प्राण ही उक्थ है; प्राण इन्द्रियोंमें प्रधान है और उक्थ शस्त्रोंमें प्रधान है; इसलिये प्राण उक्थ है—ऐसी उपासना करे।<br><br>प्राण उक्थ किस प्रकार है ? सो श्रुति बतलाती है—क्योंकि प्राण ही इस सबको उठाता है; उठानेके कारण प्राण उक्थ है; क्योंकि कोई भी प्राणहीन उठ नहीं सकता।<br><br>अब श्रुति उसकी उपासनाका फल बतलाती है—इस प्रकार उपासना करनेवालेसे उक्थवित्-प्राणवित् वीर |
ब्राह्मण १३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १२१९
ब्राह्मण १३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १२१९
| पुत्र उत्तिष्ठति ह–दृष्टमेतत् फलम् ।<br><br>अदृष्टं तूक्थस्य सायुज्यं सलोकतां<br><br>जयति य एवं वेद ॥ १ ॥ | यानी पुत्र उत्पन्न होता है—यह इसका प्रत्यक्ष फल है। परोक्ष फल यह है कि जो ऐसा जानता है, वह उक्थके सायुज्य और सलोकताको प्राप्त होता है ॥ १ ॥ |
यजुर्दृष्टिसे प्राणोपासना
यजुः प्राणो वै यजुः प्राणे हीमानि सर्वाणि भूतानि युज्यन्ते युज्यन्ते हास्मै सर्वाणि भूतानि श्रैष्ठ्याय यजुषः सायुज्यँ सलोकतां जयति य एवं वेद ॥ २ ॥
'यजुः' इस प्रकार प्राणकी उपासना करे। प्राण ही यजु है, क्योंकि प्राणमें ही इन सब भूतोंका योग होता है। सम्पूर्ण भूत इसकी श्रेष्ठताके कारण इससे संयुक्त होते हैं। जो ऐसी उपासना करता है, वह यजुके सायुज्य और सलोकताको प्राप्त होता है ॥ २ ॥
| यजुरिति चोपासीत प्राणम्;<br><br>प्राणो वै यजुः; कथं यजुः प्राणः?<br><br>प्राणे हि यस्मात् सर्वाणि भूतानि युज्यन्ते। न ह्यसति प्राणे केनचित् कस्यचिद् योगसामर्थ्यम्; अतो युनक्तीति प्राणो यजुः ।<br><br>एवंविदः फलमाह—युज्यन्त उद्यच्छन्त इत्यर्थः। हास्मा एवंविदे सर्वाणि भूतानि श्रैष्ठ्यं श्रेष्ठ- | 'यजुः' इस प्रकार भी प्राणकी उपासना करे; प्राण ही यजु है; प्राण यजु किस प्रकार है? क्योंकि प्राणमें ही समस्त प्राणियोंका योग होता है। प्राणके न रहनेपर किसीके साथ किसीका योग होनेका सामर्थ्य नहीं है; अतः योग करता है, इसलिये प्राण यजु है।<br><br>इस प्रकार उपासना करनेवालेका श्रुति फल बतलाती है—इस प्रकार उपासना करनेवालेको सम्पूर्ण भूत |
| १२२० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ५ |
| १२२० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ५ |
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| भावस्तस्मै श्रैष्ठ्याय श्रेष्ठभावायायं नः श्रेष्ठो भवेदिति । यजुषः प्राणस्य सायुज्यमित्यादि सर्वं समानम् ॥ २ ॥ | श्रैष्ठ्य-श्रेष्ठभावका नाम श्रेष्ठ्य है, उस श्रैष्ठ्य यानी श्रेष्ठ-भावके लिये—यह हममें श्रेष्ठ हो, इस निमित्तसे युक्त होते अर्थात् उद्यम करते हैं। तथा वह यजुरूप प्राणका सायुज्य प्राप्त करता है—इत्यादि सब अर्थ पूर्ववत् है ॥ २ ॥ |
सामदृष्टिसे प्राणोपासना
साम प्राणो वै साम प्राणे हीमानि सर्वाणि भूतानि सम्यञ्चि सम्यञ्चि हास्मै सर्वाणि भूतानि श्रैष्ठ्याय कल्पन्ते साम्नः सायुज्यँ सलोकतां जयति य एवं वेद ॥ ३ ॥
'साम' इस प्रकार प्राणकी उपासना करे। प्राण ही साम है, क्योंकि प्राणमें ही ये सब भूत सुसंगत होते हैं। समस्त भूत उसके लिये सुसंगत होते हैं तथा उसकी श्रेष्ठताके लिये समर्थ होते हैं। जो इस प्रकार उपासना करता है, वह सामके सायुज्य और सलोकताको प्राप्त होता है ॥ ३ ॥
| सामेति चोपासीत प्राणम् । प्राणो वै साम । कथं प्राणः साम ? प्राणे हि यस्मात् सर्वाणि भूतानि सम्यञ्चि संगच्छन्ते; संगमनात् साम्यापात्तहेतुत्वात् साम प्राणः। सम्यञ्चि संगच्छन्ते हास्मै सर्वाणि भतानि। न केवलं संगच्छन्त एव, श्रेष्ठ भावाय चास्मै कल्पन्ते समर्थ्यन्ते साम्नः सायुज्यमित्यादि पूर्ववत् ॥ ३ ॥ | 'साम' इस प्रकार भी प्राणकी उपासना करे। प्राण ही साम है। प्राण साम किस प्रकार है ? क्यों-कि प्राणमें ही सब भूत संगत होते हैं; सङ्गमन अर्थात् साम्यप्राप्तिके कारण प्राण साम है। सम्पूर्ण भूत उसके साथ संगत हो जाते हैं; केवल संगत ही नहीं होते, इसके श्रेष्ठभावके लिये भी समर्थ होते हैं। सामके सायुज्यको प्राप्त होता है—इत्यादि अर्थ पूर्ववत् है ॥ ३ ॥ |