भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1230, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1230
१२१६बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ५

| किंस्वित् साधु कुर्यां साधु शोभनं पूजां कां त्वस्मै पूजां कुर्या-मित्यभिप्रायः, किमेवास्मै विदुषेऽसाधु कुर्यां कृतकृत्योऽसावित्य-भिप्रायः। अन्नप्राणौ सहभूतौ ब्रह्मेति विद्वानासावसाधुकरणेन खण्डितो भवति, नापि साधु-करणेन महीकृतः। | क्या साधु करूँ ? साधु--शोभन अर्थात् पूजा; तात्पर्य यह है कि उसकी मैं क्या तो पूजा करूँ और क्या ऐसा जाननेवालेका मैं असाधु करूँ ? अभिप्राय यह है कि वह तो कृतकृत्य है। अन्न और प्राण-ये मिलकर ब्रह्म हैं--ऐसा जो जानने-वाला है वह पुरुष अशुभ करनेसे तो खण्डित नहीं होता और शुभ करनेसे महान् नहीं होता। | | तमेवंवादिनं स पिता ह स्माह पाणिना हस्तेन निवारयन् मा प्रातृद मैवं वोचः। कस्त्वेनयो-रन्नप्राणयोरेकधाभूयं भूत्वा परमतां कस्तु गच्छति न कश्चि-दपि विद्वाननेन ब्रह्मदर्शनेन परमतां गच्छति। तस्मान्मैवं वक्तुमर्हसि कृतकृत्योऽसाविति। | इस प्रकार कहनेवाले उस पुत्र-को हाथसे रोकते हुए पिताने कहा, 'प्रातृद ! नहीं, ऐसा मत कहो। इन अन्न और प्राणको एकरूपताको प्राप्त होकर कौन परम-भावको प्राप्त करता है ? इस ब्रह्मदर्शनके द्वारा कोई भी विद्वान् परम-भावको प्राप्त नहीं कर सकता। इसलिये तुम्हें ऐसा नहीं कहना चाहिये कि यह कृत्यकृत्य है।' | | यद्येवं ब्रवीतु भवान् कथं पर-मतां गच्छतीति ? तस्मा उ है-तद् वक्ष्यमाणं वच उवाच। किं तत् ? वीति। किं तद् वीत्युच्यते—अन्नं वै वि। अन्ने हि यस्मादिमानि सर्वाणि भूतानि विष्टान्याश्रितान्यतोऽन्नं वीत्युच्यते। | यदि ऐसी बात है तो आप बतलाइये कि किस प्रकार परम-भाव प्राप्त करता है ? तब उसके प्रति उसके पिताने यह आगे कहा जानेवाला वचन कहा। वह वचन क्या था ? वह था 'वि'। वह 'वि' क्या है सो बतलाते हैं—अन्न ही 'वि' है, क्योंकि अन्नमें ही ये समस्त भूत विष्ट--आश्रित हैं, इसलिये अन्न 'वि' इस प्रकार कहा जाता है। |