भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1251, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1251

ब्राह्मण १४] शाङ्करभाष्यार्थ १२३७


कामो मा समृद्धीति वा न हैवास्मै स कामः समृध्यते यस्मा एवमुपतिष्ठतेऽहमदः प्रापमिति वा ॥ ७ ॥

उस गायत्रीका उपस्थान—हे गायत्रि ! तू [त्रैलोक्यरूप प्रथम पादसे] एकपदी है, [ तीनों वेदरूप द्वितीय पादसे ] द्विपदी है, [ प्राण, अपान और व्यानरूप तीसरे पादसे ] त्रिपदी है और [ तुरीय पादसे ] चतुष्पदी है, [ इन सबसे परे निरुपाधिक स्वरूपसे तू ] अपद है; क्योंकि तू जानी नहीं जाती। अतः व्यवहारके अविषयभूत एवं समस्त लोकोंसे ऊपर विराजमान तेरे दर्शनीय तुरीय पदको नमस्कार है। यह पापरूपी शत्रु इस [ विघ्नाचरणरूप ] कार्यमें सफलता नहीं प्राप्त करे। इस प्रकार यह (विद्वान् ) जिससे द्वेष करता हो 'उसकी कामना पूर्ण न हो' ऐसा कहकर उपस्थान करे। जिसके लिये इस प्रकार उपस्थान किया जाता है, उसकी कामना पूर्ण नहीं होती। अथवा 'मैं इस वस्तुको प्राप्त करूँ' ऐसी कामनासे उपस्थान करे ॥ ७ ॥

संस्कृत भाष्यहिन्दी अनुवाद
तस्या उपस्थानं तस्या गायत्र्या उपस्थानमुपेत्य स्थानं नमस्कारणमनेन मन्त्रेण । कोऽसौ मन्त्रः ? इत्याह—हे गायत्र्यसि भवसि त्रैलोक्यपादेनैकपदी। त्रयीविद्यारूपेण द्वितीयेन द्विपदी। प्राणादिना तृतीयेन त्रिपद्यसि। चतुर्थेन तुरीयेण चतुष्पद्यसि। एवं चतुर्भिः पादैरूपासकैः पद्यसे ज्ञायसे ।<br><br>अतः परं परेण निरुपाधिकेन स्वेनात्मनापदसि । अविद्यमानं पदं यस्यास्तव येन पद्यसे साउस गायत्रीका इस मन्त्रसे उपस्थान—समीप जाकर स्थित होना अर्थात् नमस्कार होता है। वह मन्त्र कौन-सा है ? सो श्रुति बतलाती है—हे गायत्रि ! तू पूर्वोक्त रूपसे तीन लोकरूपी प्रथम पादद्वारा एकपदी है; त्रयीविद्यारूप द्वितीय पादसे द्विपदी है, प्राणादि तृतीय पादसे त्रिपदी है और चतुर्थ—तुरीय पादसे चतुष्पदी है। इस प्रकार चार पादोंसे तू उपासकोंद्वारा जानी जाती है।<br><br>इसके आगे अपने सर्वोत्तम निरुपाधिक स्वरूपसे तू अपद् है। जिस तेरा कोई पद, जिससे कि तेरा ज्ञान