भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1273, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1273

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२५९


इच्चक्षुषा शृण्वन्तः श्रोत्रेण प्रजायमाना रेतसैवमजी- विष्मेति प्रविवेश ह मनः ॥ ११ ॥

मनने उत्क्रमण किया। उसने एक वर्ष बाहर रहकर लौटकर कहा, 'तुम मेरे बिना कैसे जीवित रह सके थे?' वे बोले, 'जिस प्रकार मुग्ध पुरुष मनसे न समझते हुए भी प्राणसे प्राणन करते, वाणीसे बोलते, नेत्रसे देखते, कानसे सुनते और रेतस्‌से प्रजा उत्पन्न करते हुए [ जीवित रहते हैं ], उसी प्रकार हम जीवित रहे।' यह सुनकर मनने शरीरमें प्रवेश किया ॥ ११ ॥

रेतस्‌का उत्क्रमण और परीक्षामें असफल होकर पुनः प्रवेश

रेतो होच्चक्राम तत् संवत्सरं प्रोष्यागत्योवाच कथमशकत मदृते जीवितुमिति ते होचुर्यथा क्लीबा अप्रजायमाना रेतसा प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा पश्यन्तश्चक्षुषा शृण्वन्तः श्रोत्रेण विद्वाꣳसो मनसैवम- जीविष्मेति प्रविवेश ह रेतः ॥ १२ ॥

रेतस्‌ने उत्क्रमण किया। उसने एक वर्ष बाहर रहकर फिर लौटकर कहा, 'तुम मेरे बिना कैसे जीवित रह सके थे?' वे बोले, 'जिस प्रकार नपुंसक लोग रेतस्‌से प्रजा उत्पन्न न करते हुए भी प्राणसे प्राणन करते, वाणीसे बोलते, नेत्रसे देखते, श्रोत्रसे सुनते और मनसे जानते हुए [ जीवित रहते हैं ], उसी प्रकार हम जीवित रहे।' यह सुनकर वीर्यने शरीरमें प्रवेश किया ॥ १२ ॥

| तथा चक्षुर्होच्चक्रामेत्यादि पूर्ववत् । श्रोत्रं मनः प्रजातिरिति ॥ ९—१२ ॥ | इसी प्रकार चक्षुर्होच्चक्राम' इत्यादि मन्त्रोंका अर्थ पूर्ववत् है। अबतक श्रोत्र, मन, प्रजाति [रेतस्] इत्यादिने उत्क्रमण किया ॥ ९—१२ ॥ |