बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 1307, कुल 1402 में से
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ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२९१
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| तत्राग्निहोत्राहुती ससाधने एवोत्क्रामतः। यथेह यैः साधनैर्विशिष्टे ये ज्ञायेते आहवनीयाग्निसमिद्धूमपाङ्गारविस्फुलिङ्गाहुतिद्रव्यैस्ते तथैवोत्क्रामतोऽस्माल्लोकादमुं लोकम्। तत्राग्निरग्नित्वेन समित् समित्त्वेन धूमो धूमत्वेनाङ्गारा अङ्गारत्वेन विस्फुलिङ्गा विस्फुलिङ्गत्वेनाहुतिद्रव्यमपि पयआद्याहुतिद्रव्यत्वेनैव सर्गादावव्याकृतावस्थायामपि परेण सूक्ष्मेणात्मना व्यवतिष्ठते। | [ यजमानकी मृत्युके समय ] अग्निहोत्रकी आहुतियां साधनके सहित ही उत्क्रमण करती हैं। इस लोकमें जिस प्रकार वे जिन आहवनीयाग्नि, समिध्, धूम, अङ्गार, विस्फुलिङ्ग और आहुतिद्रव्यरूप साधनोंसे युक्त जानी जाती हैं, उसी प्रकार वे इस लोकसे उस लोकके प्रति उत्क्रमण करती हैं। वहाँ सर्गके आरम्भमें अव्यक्तावस्थामें भी अपने परम सूक्ष्मरूपसे, अग्नि अग्निभावसे, समिध् समिद्भावसे, धूम धूमभावसे, अङ्गार अङ्गारभावसे, विस्फुलिङ्ग विस्फुलिङ्गभावसे और आहुतिद्रव्य भी दुग्धादि आहुतिद्रव्यभावसे ही रहते हैं।^१ |
| तद् विद्यमानमेव ससाधनमग्निहोत्रलक्षणं कर्मापूर्वेणात्मना व्यवस्थितं सत् तत्पुनर्व्याकरणकाले तथैवान्तरिक्षादीनामाहवनीयाद्यग्न्यादिभावं कुर्वद् विपरिणमते। तथैवेदानीमप्यग्निहोत्राख्यं | वह साधनसहित अग्निहोत्ररूप कर्म अपूर्वरूपसे व्यवस्थित होकर विद्यमान रहता हुआ ही जगत्के अभिव्यक्त होनेके समय पुनः उसी प्रकार अन्तरिक्षादिका आहवनीयादि अग्निभाव करता हुआ विपरिणामको प्राप्त हो जाता है। इसी प्रकार इस समय भी अग्निहोत्रसंज्ञक कर्म |
१. अर्थात् प्रलयमें इनका स्थूलरूप न रहनेपर भी ये सब पदार्थ अपनी शक्तियोंके रूपमें रहते हैं। अतः ये सब सामान्यभावको प्राप्त नहीं होते और जब अग्निहोत्रकी आहुतियोंसे उत्पन्न हुए अपूर्वसे पुनः सृष्टि आरम्भ होती है तो वे पुनः व्यक्त जगत्के रूपमें परिणत हो जाते हैं।