भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1309, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1309

ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थे १२९३


| अत्र च यत् पयोद्रव्यमग्निहोत्रकर्माश्रयभूतमिहाहवनीये प्रक्षिप्तमग्निना भक्षितमदृष्टेन सूक्ष्मेण रूपेण विपरिणतं सह कर्त्रा यजमानेनामुं लोकं धूमादिक्रमेणान्तरिक्षमन्तरिक्षाद् द्युलोकमाविशति । ताः सूक्ष्मा आप आहुतिकार्यभूता अग्निहोत्रसमवायिन्यः कर्तृसहिताः श्रद्धाशब्दवाच्याः सोमलोके कर्तुः शरीरान्तरारम्भाय द्युलोकं प्रविशन्त्यो हूयन्त इत्युच्यन्ते । तास्तत्र द्युलोकं प्रविश्य सोममण्डले कर्तुः शरीरमारभन्ते । तदेतदुच्यते देवाः श्रद्धां जुह्वति तस्या आहुत्यै सोमो राजा सम्भवतीति । "श्रद्धा वा आपः" इति श्रुतेः ।<br><br>वेत्थ यतिथ्यामाहुत्यां हुतायामापः पुरुषवाचो भूत्वा समुत्थाय वदन्तीति प्रश्नः, तस्य च निर्णयविषये 'असौ वै लोकोऽग्निः' इति प्रस्तुतम् । तस्मादापः कर्मसम- | इस लोकमें जो अग्निहोत्रकर्मका आश्रयभूत दुग्धरूप द्रव्य आहवनीय अग्निमें डाला गया था, वह अग्निद्वारा भक्षित होकर अदृष्ट सूक्ष्मरूपमें परिणत हो कर्ता यजमानके सहित धूमादि क्रमसे उस अन्तरिक्षलोकमें और फिर अन्तरिक्षसे द्युलोकमें प्रवेश करता है वह आहुतिका कार्यभूत, श्रद्धाशब्दवाच्य, अग्निहोत्रसम्बन्धी सूक्ष्म आप सोमलोकमें कर्ताके शरीरान्तरका आरम्भ करनेके लिये कर्ताके सहित द्युलोकमें प्रवेश करते हुए 'हवन किया जाता है' ऐसा कहा जाता है, वह वहाँ द्युलोकमें प्रवेश कर सोममण्डलमें कर्ताका शरीर आरम्भ करता है। इसीसे यह कहा जाता है कि 'देवगण श्रद्धाको होमते हैं, उस आहुतिसे सोम राजा उत्पन्न होता है।' "श्रद्धा ही आप है" इस श्रुतिसे भी यही सिद्ध होता है।<br><br>'क्या तू जानता है कि कितनी संख्यावाली आहुतिके हवन किये जानेपर आप पुरुषशब्दवाच्य होकर उठकर बोलने लगता है ?' यह प्रश्न है। उसीका निर्णय करनेके प्रसङ्गमें 'यह द्युलोक ही अग्नि है' इस प्रकार आरम्भ किया गया है। अतः यह |