बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1330, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| १३१४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ६ |
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| चमसस्थं भक्षणेनापक्षयं च कृत्वा पुनः पुनर्भक्षयन्तीत्यर्थः । एवं देवा अपि सोमलोके लब्धशरीरान् कर्मिण उपकरणभूतान् पुनः पुनर्विश्रामयन्तः कर्मानुरूपं फलं प्रयच्छन्तः, तद्धि तेषामाप्यायनं सोमस्याप्यायनमिवोपभुञ्जत उपकरणभूतान् देवाः । | 'आप्याय आप्याय' भर-भरकर उसका भक्षणके द्वारा अपक्षय करके पुनः-पुनः भक्षण करते हैं। इसी प्रकार जिन्हें चन्द्रलोकमें शरीर प्राप्त हुआ है, उन अपने उपकरणभूत कर्मियोंको देवता भी पुनः-पुनः विश्राम देते हुए—उन्हें कर्मानुरूप फल देते हुए, क्योंकि सोमके आप्यायनके समान यही उनका आप्यायन है—इस प्रकार [ आप्यायन करके ] उन अपने उपकरणभूत कर्मठोंका देवगण उपभोग ( उपयोग ) करते हैं। | | तेषां कर्मिणां यदा यस्मिन् काले तद् यज्ञदानादिलक्षणं सोमलोकप्रापकं कर्म पर्यवैति परिगच्छति परिक्षीयत इत्यर्थः, अथ तदेममेव प्रसिद्धमाकाशमभिनिष्पद्यन्ते । यास्ताः श्रद्धाशब्दवाच्या द्युलोकाग्नौ हुता आपः सोमाकारपरिणता याभिः सोमलोके कर्मिणामुपभोगाय शरीरमारब्धमम्मयं ताः कर्मक्षयाद्धिमपिण्ड इवातपसम्पर्कात् प्रविलीयन्ते । प्रविलीनाः सूक्ष्मा | जब अर्थात् जिस समय उन कर्मियोंका उन्हें सोमलोककी प्राप्ति करानेवाला यज्ञ-दानादिरूप कर्म 'पर्यवैति'—सब ओरसे चला जाता अर्थात् परिक्षीण हो जाता है तो फिर वे इस प्रसिद्ध आकाशको ही अभिनिष्पन्न हो जाते हैं। जो कि वह द्युलोकाग्निमें हवन किया हुआ श्रद्धाशब्दवाच्य आप सोमके आकारमें परिणत हुआ रहता है, जिसके द्वारा सोमलोकमें कर्मियोंका जलमय शरीर आरम्भ किया जाता है, वह आप कर्मोंका क्षय होनेपर, घामके सम्पर्कसे बर्फके डलेके समान, पिघल जाता है। वह पिघलकर सूक्ष्म अर्थात् |