भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1343, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1343

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३२७

स्तब्ध (निष्कम्प) है, [सबसे अविरोधी होनेके कारण] तू यह जगद्रूप एक सभाके समान है, तू ही [यज्ञके आरम्भमें प्रस्तोताके द्वारा] हिङ्कृत है, तथा [उसी प्रस्तोताद्वारा यज्ञमें] तू ही हिङ्क्रियमाण है, [यज्ञारम्भमें उद्गाताद्वारा] तू ही उच्च स्वरसे गाया जानेवाला उद्गीथ है और [यज्ञके मध्यमें उसके द्वारा] तू ही उद्गीयमान है। तू ही [अध्वर्युद्वारा] श्रावित और [आग्नीध्रद्वारा] प्रत्याश्रावित है; आर्द्र [अर्थात् मेघ] में सम्यक् प्रकारसे दीप्त है, तू विभु (विविध रूप होनेवाला) हे और प्रभु (समर्थ) है, तू [भोक्ता अग्निरूपसे] ज्योति है, [कारणरूपसे] सबका प्रलयस्थान है तथा [सबका संहार करनेवाला होनेसे] संवर्ग है ॥ ४ ॥

| अथैनमभिमृशति भ्रमदसीत्यनेन मन्त्रेण ॥ ४ ॥ | इसके पश्चात् 'भ्रमदसि' इत्यादि मन्त्रसे इसे स्पर्श करता है ॥ ४ ॥ |

मन्थको उठानेका मन्त्र

अथैनमुद्यच्छत्यामँ॒स्यामँ॒हि ते महि स हि राँजे-
शा॒नोऽधिपतिः समाँ॒ राजेशानो॑ऽधिप॑तिं करोत्विति । ५ ।

फिर 'आमंसि आमंहि' इत्यादि मन्त्रसे इसे ऊपर उठाता है। [इस मन्त्रका अर्थ—] 'आमंसि' तू सब जानता है, 'आमंहि ते महि'—मैं तेरी महिमाको अच्छी तरह जानता हूँ। वह प्राण राजा, ईशान और अधिपति है। वह मुझे राजा, ईशान और अधिपति करे ॥ ५ ॥

| अथैनमुद्यच्छति सह पात्रेण हस्ते गृह्णात्यामंस्यामंहि ते महीत्यनेन ॥ ५ ॥ | इसके पश्चात् 'आमंस्यामहि ते महि' इत्यादि मन्त्रसे उसे पात्रके सहित हाथपर ऊपर उठाता है ॥ ५ ॥ |

मन्थभक्षणकी विधि

अथैनमाचामति तत्सवितुर्वरे॑ण्यम् । मधु वाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः। माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः।