बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 1353, कुल 1402 में से
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ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३३७
| स ह स्रष्टा प्रजापतिरीक्षाञ्चक्रे।<br><br>ईक्षां कृत्वा स स्त्रियं ससृजे।<br><br>तां च सृष्ट्वाध उपास्त मैथुनाख्यं<br><br>कर्माधउपासनं नाम कृतवान्।<br><br>तस्मात् स्त्रियमध उपासीत।<br><br>श्रेष्ठानुश्रयणा हि प्रजाः।<br><br>अत्र वाजपेयसामान्य-<br>क्लृप्तिमाह—स एतं प्राञ्चं प्रकृष्टगतियुक्तमात्मनो ग्रावाणं सोमाभिषवोपलस्थानीयं काठिन्यसामान्यात् प्रजननेन्द्रियमुदपारयदुत्पूरितवान् स्त्रीव्यञ्जनं प्रति तेनैनां स्त्रियमभ्यसृजदभिसंसर्गं कृतवान् ॥ २ ॥ | उस सुप्रसिद्ध सृष्टिकर्ता प्रजापतिने विचार किया। विचार करके उन्होंने स्त्रीकी सृष्टि की। उसकी सृष्टि करके अधोभागकी उपासना की। मैथुन नामक कर्मका ही नाम अधोभागको उपासना है; उसीको सम्पन्न किया। इसलिये स्त्रीके अधोभागकी उपासना (सेवन) करे; क्योंकि सारी प्रजा श्रेष्ठ पुरुषके आचार-व्यवहारका अनुकरण करनेवाली होती है।<br><br>इस मैथुन-कर्ममें वाजपेय यज्ञकी समानताकी कल्पना करते हैं—उन प्रजापतिने इस प्रकृष्ट गतियुक्त लोढ़ेको, सोमरस निकालनेके लिये उपयोगमें लाये जानेवाले प्रस्तर-खण्डके समान अपने शिश्न—जननेन्द्रियको, जो मैथुनकालमें कठोर हो जाता है, उत्पूरित किया—स्त्री-योनिकी ओर प्रेरित किया। उस जननेन्द्रियसे इस स्त्री का संसर्ग किया¹ ॥ २ ॥ |
१. सृष्टि-कार्यमें इस क्रियाकी अत्यन्त आवश्यकता है। भोगबुद्धिसे न होकर यदि केवल उत्तम संतानोत्पादनके लिये यह क्रिया हो तो वह धर्मसम्मत है और आवश्यक है। इस क्रियामें प्राणिमात्रकी स्वाभाविक प्रवृत्ति है। यह प्रवृत्ति संयमित हो, भोगार्थ न होकर केवल संतानोत्पादनार्थ हो, पुरुषोंकी स्वेच्छाचारिता और असंयमका निरोध हो, शुभ एवं श्रेष्ठ संतानोत्पादनके विज्ञानसे लोग परिचित हों; यह मनुष्यका पतन करनेवाली पाशविक क्रियामात्र न रहकर लोक-कल्याणकारी नर-रत्नोंके उत्पादन तथा निर्माणमें सफल साधन हो, इसीके लिये शास्त्रमें इस विषयका स्पष्ट विधान किया गया है। जगत्के प्रातःस्मरणीय महान् पुरुषोंका