भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1355, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1355
ब्राह्मण ४ ]शाङ्करभाष्यार्थे१३३९

| हितेन सम्बध्यते। वाजपेययाजिनो यावाँल्लोकः प्रसिद्धस्तावन् विदुषो मैथुनकर्मणो लोकः फलमिति स्तूयते। तस्माद् बीभत्सा नो कार्येति। <br><br> य एवं विद्वानधोपहासं चरत्यासां स्त्रीणां सुकृतं वृङ्क्त आवर्जयति। अथ पुनर्येा वाजपेयसम्पत्तिं न जानात्यविद्वान् रेतसो रसतमत्वं चाधोपहासं चरति; अस्य स्त्रियः सुकृतमावृञ्जतेऽविदुषः ॥ ३ ॥ | 'तौ मुष्कौ' इन पदोंके साथ सम्बन्ध है। वाजपेय यज्ञद्वारा यजन करनेवालेको जितना लोक प्राप्त होता है, उतना ही लोक विद्वान्‌के मैथुन कर्मका फल है, ऐसा कहकर यहाँ मैथुनकर्मकी स्तुति की जाती है; अतः इससे घृणा नहीं करनी चाहिये। <br><br> जो इस प्रकार जाननेवाला पुरुष मैथुनकर्म करता है, वह इन स्त्रियोंके पुण्यको अवरुद्ध कर लेता है और जो वाजपेय यज्ञ-सम्पादनकी प्रणालीको नहीं जानता है, रेतस्को रसतम रूपमें नहीं अनुभव करता है, वह यदि मैथुनका सेवन करता है तो उस अज्ञानीके पुण्यको स्त्रियाँ ही अवरुद्ध कर लेती हैं ॥ ३ ॥ |


एतद्ध स्म वै तद् विद्वानुद्दालक आरुणिराहौतद्ध स्म वै तद्विद्वानाको मौद्गल्य आहौतद्ध स्म वै तद्विद्वान् कुमारहारित आह बहवो मर्या ब्राह्मणायाना निरिन्द्रिया विसुकृतोऽस्माल्लोकात् प्रयन्ति य इदमविद्वाँसोऽधोपहासं चरन्तीति बहु वा इदँ सुप्तस्य वा जाग्रतो वा रेतः स्कन्दति ॥ ४ ॥

निश्चय ही इस मैथुनकर्मको वाजपेयसम्पन्न जाननेवाले अरुणनन्दन उद्दालक कहते हैं, इसे उस रूपमें जाननेवाले मुद्गलपुत्र नाक कहते हैं तथा इसे उक्त रूपमें जाननेवाले कुमारहारित मुनि भी कहते हैं कि