बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 150, कुल 1402 में से
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| १४४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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प्राणके सामत्वकी उपपत्ति
एष उ एव साम वाग्वै सामैष सा चामश्चेति तत्साम्नः सामत्वम्। यद्वेव समः प्लुषिणा समो मशकेन समो नागेन सम एभिस्त्रिभिर्लोकैः समोऽनेन सर्वेण तस्माद्वेव सामाश्नुते साम्नः सायुज्यँ सलोकतां य एवमेतत्साम वेद ॥ २२ ॥
यह ही साम है। वाक् ही 'सा' है और यह (प्राण) 'अम' है। 'सा' और 'अम' ही साम हैं; यही सामका सामत्व है; क्योंकि यह प्राण मक्खीके समान है, मच्छरके समान है, हाथीके समान है, इस त्रिलोकीके समान है और इस सभीके समान है इसीसे यह साम है। जो इस सामको इस प्रकार जानता है वह सामका सायुज्य और उसकी सलोकता प्राप्त करता है ॥ २२ ॥
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
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| एष उ एव साम। कथम्? इत्याह-<br><br>वाग्वै सा यत्किञ्चित्स्त्रीशब्दाभिधेयं सा वाक्। सर्वस्त्रीशब्दाभिधेयवस्तुविषयो हि सर्वनाम 'सा' शब्दः। तथा अम एष प्राणः। सर्वपुंशब्दाभिधेयवस्तुविषयोऽमः शब्दः। "केन मे पौंस्नानि नामान्याप्नोषीति, प्राणेनेति ब्रूयात्केन मे स्त्रीनामानीति वाचा" (कौषी० | यही साम है। किस प्रकार ?<br>सो बतलाते हैं—वाक् ही 'सा' है। जो कुछ भी स्त्रीशब्दवाच्य है वह वाक् है। 'सा' यह सर्वनाम शब्द समस्त स्त्रीलिङ्ग शब्दोंद्वारा कही जानेवाली वस्तुओंको विषय करता है। तथा 'अम' यह प्राण है। 'अम' शब्द समस्त पुँल्लिङ्ग-शब्दोंद्वारा कही जानेवाली वस्तुओंको विषय करता है। "[यदि कोई पूछे] मेरे पुँल्लिङ्ग नामोंको तू किसके द्वारा प्राप्त करता है ? तो 'प्राणसे' ऐसा कहे और [यदि पूछे कि] स्त्रीलिङ्ग नामोंको किससे प्राप्त करता है तो |