भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 158, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 158
१५२बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

| प्रासङ्गिकं विधीयते; साम्नः सौस्वर्येण स्वरवत्त्वप्रत्यये कर्तव्ये इच्छामatreण सौस्वर्यं न भवतीति दन्तधावनतैलपानादि सामर्थ्यात्कर्तव्यमित्यर्थः। तयैवं संस्कृतया वाचा स्वरसम्पन्नयाऽऽर्त्विज्यं कुर्यात्।<br><br>तस्माद्यस्मात्साम्नः स्वभूतः स्वरस्तेन स्वेन भूषितं साम अतो यज्ञे स्वरवन्तमुद्गातारं दिदृक्षन्त एव द्रष्टुमिच्छन्त एव धनिनमिव लौकिकाः। प्रसिद्धं हि लोकेऽथो अपि यस्य स्वं धनं भवति तं धनिनं दिदृक्षन्ते इति सिद्धस्य गुणावज्ञानफलसम्बन्धस्य उपसंहारः क्रियते— भवति हास्य स्वं य एवमेतत्साम्नः स्वं वेदेति ॥ २५ ॥ | चाहिये। यह तो प्रासंगिक विधान किया गया है; सामकी सुस्वरता अर्थात् स्वरवत्त्व-प्रतीति कर्तव्य होनेपर इच्छामात्रसे ही उसकी सुस्वरता नहीं हो जाती। इसलिये तात्पर्य यह है कि दन्तधावन और तैलपानादिके बलसे सुस्वरताका सम्पादन करना चाहिये। इस प्रकार संस्कारयुक्त हुई उस स्वरसम्पन्न वाणीसे ऋत्विक्कर्म करे।<br><br>अतः क्योंकि स्वर सामका धन है, इसलिये उसीसे साम विभूषित होता है। इसीसे लौकिक पुरुष जिस प्रकार धनीको देखना चाहते हैं उसी प्रकार यज्ञमें स्वरसम्पन्न उद्गाताको ही देखनेकी इच्छा करते हैं। लोकमें यह प्रसिद्ध ही है कि जिसके पास स्व—धन होता है, उस धनीको लोग देखना चाहते हैं; इस प्रकार सिद्ध हुए गुणविज्ञानरूप फलके सम्बन्धका 'जो इस प्रकार इस सामके धनको जानता है उसे धन प्राप्त होता है' इस वाक्यद्वारा उपसंहार किया जाता है ॥ २५ ॥ |


सामके सुवर्णको जाननेका फल

अथान्यो गुणः सुवर्णवत्त्वलक्षणो विधीयते। असावपि सौस्वर्यमेव। एतावान्विशेषः—अब सुवर्णवत्तारूप दूसरे गुणका विधान किया जाता है। वह भी सुस्वरता ही है। अन्तर इतना ही