भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 168, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 168
१६२बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

| वेद—अहमस्मि प्राण इन्द्रियविषयासङ्गैरसुरैः पाप्मभिरधर्षणीयो विशुद्धः, वागादिपञ्चकं च मदाश्रयत्वादग्न्याद्यात्मरूपं स्वाभाविकविज्ञानोत्थेन्द्रियविषयासङ्गजनितासुरपाप्मदोषवियुक्तं सर्वभूतेषु च मदाश्रयान्नाद्योपयोगबन्धनम्, आत्मा चाहं सर्वभूतानामाङ्गिरसत्वात्, ऋग्यजुःसामोद्गीथभूतायाश्च वाच आत्मा तद्व्याप्तेस्तन्निर्वर्तकत्वाच्च, मम साम्नो गीतिभावमापद्यमानस्य बाह्यं धनं भूषणं सौस्वर्यं ततोऽप्यन्तरं सौवर्णं लाक्षणिकं सौस्वर्यम्, गीतिभावमापद्यमानस्य मम कण्ठादिस्थानानि प्रतिष्ठा। एवं-गुणोऽहं पुत्तिकादिशरीरेषु कात्स्न्र्येन परिसमाप्तोऽमूर्तत्वात्सर्वगतत्वाच्च—इति आ एवमभिमानाभिव्यक्तेर्वेदोपास्त इत्यर्थः॥ २८ ॥ | जानता है। 'मैं इन्द्रियोंके विषयोंकी आसक्तिरूप आसुर पापोंसे अधर्षणीय विशुद्ध प्राण हूँ। वागादि पाँच प्राण मेरे आश्रित होनेके कारण स्वाभाविक विज्ञानजनित इन्द्रिय-विषयासक्तिसे होनेवाले आसुर पापरूप दोषसे रहित अग्न्यादि देवतास्वरूप और समस्त भूतोंमें मेरे आश्रयसे अन्नाद्यके उपयोगके हेतु हैं। आङ्गिरस होनेके कारण मैं समस्त भूतोंका आत्मा हूँ। ऋक्, यजुः, साम और उद्गीथरूपा वाणीका, उसमें व्याप्त और उसका निर्वर्तक होनेके कारण मैं आत्मा हूँ। गीतिभावको प्राप्त हुए मुझ सामका सुस्वरता बाह्य धन यानी भूषण है और लाक्षणिक सुस्वरतारूप सुवर्णता उसकी अपेक्षा आन्तर धन है। गीतिभावको प्राप्त हुए मेरी कण्ठादि स्थान प्रतिष्ठा हैं। ऐसे गुणोंवाला मैं अमूर्त्त और सर्वगत होनेके कारण पुत्तिकादि शरीरोंमें पूर्णतया व्याप्त हूँ'—इस प्रकारका अभिमान उत्पन्न होनेतक जो प्राणको जानता अर्थात् उसकी उपासना करता है [ उसे उपर्युक्त फल मिलता है ]॥ २८ ॥ |


इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये प्रथमाध्याये
तृतीयमुद्गीथब्राह्मणम् ॥ ३ ॥