भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 180, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 180
१७४बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

| तथा आलोकविशेषगुणवदगुणवत्त्वेन भेदाः स्युः। | निमित्तोंका समुच्चय होता है तथा प्रकाशविशेषोंके गुणवान् या गुणहीन होनेसे भी निमित्तोंके भेद हो जाते हैं। | | एवमेव आत्मैकत्वज्ञानेऽपि क्वचिज्जन्मान्तरकृतं कर्म निमित्तं भवति, यथा प्रजापतेः। क्वचित्तपो निमित्तम्, “तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व” (तै० उ० ३।२।१) इति श्रुतेः। क्वचित् “आचार्यवान्पुरुषो वेद” (छा० उ० ६।१४।२) “श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानम्” (गीता ४।३९) “तद्विद्धि प्रणिपातेन” (गीता ४।३४) “आचार्याद्वैव” (छा० उ० ४।९।३) “द्रष्टव्यः श्रोतव्यः” (बृ० उ० २।४।५) इत्यादिश्रुतिस्मृतिभ्य एकान्तज्ञानलाभनिमित्तत्वं श्रद्धाप्रभृतीनाम् अधर्मादिनिमित्तवियोगहेतुत्वात्। वेदान्तश्रवणमनननिदिध्यासनानां च साक्षाज्ज्ञेयविषयत्वात्। पापादिप्रतिबन्धक्षये चात्ममनसोर्भूतार्थज्ञाननिमित्तस्वाभाव्यात्। तस्मादहेतुत्वं न जातु ज्ञानस्य श्रद्धाप्रणिपातादीनामिति ॥ २॥ | इसी प्रकार आत्मैकत्वज्ञानमें भी कहीं जन्मान्तरकृत कर्म निमित्त होता है, जैसा कि प्रजापतिका; कहीं तप निमित्त है, जैसा कि “तपसे ब्रह्मको जाननेकी इच्छा करो” इस श्रुतिसे सिद्ध होता है और कहीं “आचार्यवान् पुरुषको ज्ञान होता है”, “श्रद्धावान् पुरुष ज्ञानलाभ करता है”, “उसे प्रणिपात करके जानो”, “आचार्यके द्वारा ही [विद्या स्थिरताको प्राप्त होती है]” एवं “यह आत्मा द्रष्टव्य है, श्रोतव्य है” इत्यादि श्रुति-स्मृतियोंके अनुसार श्रद्धाप्रभृति, अधर्मादिके हेतुओंकी निवृत्तिके कारण होनेसे ज्ञानलाभके नियत निमित्त हैं। वेदान्तके श्रवण, मनन और निदिध्यासन तो साक्षात् ज्ञेय वस्तु (ब्रह्म) को ही विषय करनेवाले हैं तथा पापादि प्रतिबन्धका क्षय होनेपर आत्मा और मनका भी परमार्थज्ञानमें निमित्त होना स्वाभाविक है; इसलिये श्रद्धा और प्रणिपातादिका ज्ञानकी उत्पत्तिमें अहेतुत्व कभी नहीं हो सकता ॥२॥ |

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