बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 190, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| १८४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
|---|
| तदाश्रयाद्वस्वादिलक्षणं विशो नियन्तारं विशं च । तस्मात्कृष्यादिपरो वस्वादिदैवत्यश्च वैश्यः । तथा पूषणं पृथ्वीदैवतं शूद्रं च पद्भ्यां परिचरणक्षममसृजतेति श्रुतिस्मृतिप्रसिद्धेः । | भूत ऊरुओंसे वैश्यजातिके नियन्ता वसु आदिको और वैश्यजातिको उत्पन्न किया । अतः वैश्य कृषि आदि कर्मोंमें संलग्न रहनेवाला और वसु आदि देवताओंसे अनुगृहीत होता है । इसी तरह पृथ्वीदैवत पूषा और परिचर्यापरायण शूद्रजातिको चरणोंसे रचा—ऐसा श्रुति-स्मृति जनित प्रसिद्धिसे सिद्ध होता है । | | तत्र क्षत्रादिदेवतासर्गमिहानुक्तं वक्ष्यमाणमप्युक्तवदुपसंहरति सृष्टिसाकल्यानुकीर्त्यै । यथेयं श्रुतिर्व्यवस्थिता तथा प्रजापतिरेव सर्वे देवा इति निश्चितोऽर्थः ।<br><br>स्रष्टुरनन्यत्वात्सृष्टानाम् । प्रजापतिनैव तु सृष्टत्वाद् देवानाम् । | उनमें क्षत्रियादिके देवताओंकी सृष्टिका यद्यपि यहाँ (मूलमें) उल्लेख नहीं है, और वह आगे कही जानेवाली है तो भी सृष्टिकी सर्वाङ्गताका अनुकीर्तन करनेके लिये श्रुति उसका कहे हुएके समान उपसंहार करती है । जैसी कि इस श्रुतिकी व्यवस्था है उसके अनुसार प्रजापति ही सर्व देवरूप है—यह इसका निश्चित अर्थ है, क्योंकि सृष्ट पदार्थ स्रष्टासे अभिन्न होते हैं और प्रजापतिने ही सब देवोंकी सृष्टि की है । | | अथैवं प्रकरणार्थे व्यवस्थिते तत्स्तुत्यभिप्रायेणाविद्वन्मतान्तरनिन्दोपन्यासः; अन्यनिन्दान्यस्तुतये । तत्तत्र कर्मप्रकरणे केवल- | अब इस प्रकार इस प्रकरणका अर्थ निश्चित होनेपर उसकी स्तुतिके लिये अविद्वान्के मतान्तरकी निन्दाका उपन्यास किया जाता है, क्योंकि एककी निन्दा दूसरेकी स्तुतिके लिये होती है । इसलिये अभिप्राय यह है कि वहाँ कर्मप्रकरणमें केवल |